क्या यूएन में ब्लूचिस्तान का मुद्दा उठाकर हमने की गलती

 ओम थानवी

राष्ट्रसंघ में सुषमा स्वराज अच्छा बोलीं। वे अच्छा बोलती हैं। मोदी भी अच्छा बोलते हैं। पर अहम यह जानना होता है कि बोले, पर कहा क्या? सुषमाजी ने अपनी सरकार के कार्यक्रमों का ब्योरा वहां दिया। लोगों में खुशी इस बात की है कि उन्होंने पाकिस्तान को ’करारा जवाब’ दिया। एक अखबार के मुताबिक बीस मिनट के भाषण में दस मिनट भारत की प्रतिनिधि ने पाकिस्तान और आतंकवाद को दिए, 42 बार उन्होंने पाकिस्तान और आतंकवाद का जिक्र किया, 16 दफा इस्लामाबाद का नाम लिया।3विदेश मंत्री को बोलने के नम्बर हमने दे दिए, लेकिन आगे यह भी सोचना चाहिए कि क्या हम पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की क़वायद में कहीं उसका कद बढ़ा तो नहीं रहे? अपने मुंह से बलूचिस्तान का जिक्र (पहली दफा) लाल किले पर कर अब उसे सीधे (पहली दफा) राष्ट्रसंघ पहुंचा दिया। इससे क्या हम यह संदेश नहीं दे रहे कि कश्मीर और बलूचिस्तान एक ही तराज़ू के पलड़े हैं, जो कि वे नहीं हैं।
बलूचिस्तान पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है, जैसे कश्मीर हमारा। कश्मीर के हादसों पर पाकिस्तान के बयानों को हम उचित ही अपने अंदरूनी मामले में दखल करार देते आए हैं। बलूचिस्तान के मामले में हमारा यह अतिउत्साह किस रूप में देखा जाएगा? यह कहकर कि पाकिस्तान बलूचिस्तान में दमन कर रहा है, कहीं ऐसा पसमंजऱ तो पेश नहीं करेगा कि हम खुद पर लगने वाले दमन के आरोपों को बलूचिस्तान की ओट दे रहे हैं?

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