क्या मीडिया के लिए कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए

पत्रकारों की आजादी का वही सवाल अलग-अलग परिस्थितियों में हमारे सामने बार-बार उपस्थित होता है। मैं पाता हूं कि हम पत्रकार उस स्तर का पालन करने में विफल होते जा रहे हैं, जिसकी हमसे अपेक्षा की जाती है। छोटी खबरों को आगे बढ़ाने वाली नई डिजिटल टेक्नोलौजी या रेडियो-टीवी पर आने वाले भाषण के छोटे अंशों से इसमें किसी प्रकार की मदद नहीं मिली है। वास्तव में, चीजें इस हद तक खराब हो गई हैं कि खबरों के कालम खरीदे जा सकते हैं। यह एक खुला सच है कि कई खबरें पेड़ न्यूज (पैसे लेकर छापी गई खबरें) हैं। कुछ बड़े अखबार अपने अखबारों में जगह बेचने में शर्म नहीं महसूस करते हैं चाहे जो भी इसे खरीद ले। उनके लिए यह विशुद्ध रूप से राजस्व का मामला है।

कुलदीप नैयर

जब मैं विदेश में पत्रकारिता के विद्यालय में पढ़ रहा था तो मेरे प्राध्यापक ने कहा था कि पत्रकारिता एक कमीज की तरह है जो इतनी लंबी होनी चाहिए कि किसी विषय को पूरी तरह ढक ले और इतनी छोटा हो कि देखने में आकर्षक लगे। इतने सालों में, खबरों ने ऐसा आकार ले लिया है, जिसमें सनसनी होती है और गैर-जरूरी फैलाव होता है।
जब वरिष्ठ पत्रकार गुजरते जा रहे हैं, हमारे सामने यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि भविष्य की पत्रकारिता किस तरह की होगी। निश्चित तौर पर, मामला सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। पश्चिम और पूरब, सभी ओर के देशों (तानाशाही वाले शासनों को छोड़कर) में इसी तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं कि वह कौन सी लक्ष्मण रेखा हो जिसे पत्रकार पार नहीं करें और आखिरकार क्या कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए।
काफी लोग यह सवाल पूछने लगे हैं कि कि पत्रकार क्यों उनके निजी मामलों में ताक-झांक कर रहे हैं। दूसरी ओर, पत्रकार अपना बचाव यह कह कर करते हैं कि अगर वे जांच नहीं करेंगे तो गलत काम बाहर नहीं आएंगे। सरकार का बना-बनाया जवाब होता है कि कुछ चीजें ऐसी हैं जिसकी जानकारी सार्वजनिक हित में बाहर नहीं की जा सकती है और इस तरीके से बड़े कांडों पर भी पर्दा डाल दिया जाता है।
मुझे याद है कि जब मैंने सुप्रीम कोर्ट के जजों- हेगडे, ग्रोवर और शलाट के बारे में लिखा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मेरी आलोचना की। उनकी दलील थी कि पत्रकारिता का काम जजों को प्रतिबद्धता का उपदेश देने का नहीं है। उन्होंने प्रतिबद्धता की व्याख्या नहीं की। मैं यह तो समझ सकता हूं कि जजों की प्रतिबद्धता संविधान के प्रति हो, लेकिन यह नहीं कि किसी व्यक्ति के प्रति, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो।
श्रीमती इंदिरा गांधी जजों से यह चाहती थीं कि वह उनके सोचने के तरीके का अनुकरण करें। यही वजह है कि उन्होंने तीन जजों की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर सुप्रीम कोर्ट के एक कनिष्ठ जज जस्टिस रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। उन्होंने उन तीनों को इसकी सूचना पहले देने का शिष्टाचार भी नहीं दिखाया। यह खबर उन लोगों ने आल इंडिया रेडियो पर सुनी।
इस तरह का राजनीतिक जोड़-तोड़ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी पारदर्शिता के खिलाफ जाता है। वास्तव में, लोकतांत्रिक अधिकारों के बंटवारे और उसकी मर्यादा के पायों पर खड़ा होता है। उदाहरण के तौर पर, सेना सरकार के मामले में दखल नहीं देती है क्योंकि यह एक नागरिक प्रशासन के तहत काम करने वाला बल है। पाकिस्तान जैसे कुछ देश डूब गए क्योंकि सेना, हालांकि हाल में यह बैरक में वापस गई है, की उपस्थिति अभी भी पूरी तरह बनी हुई है। बांग्लादेश में भी ऐसा ही हैए हालांकि वहां कुछ पत्रकार सशस्त्र सेना की आलोचना करने की हिम्मत अवश्य करते हैं।
लोकतंत्र मांग करता है कि इसके सभी स्तंभ स्वतंत्र रूप से काम करें, लेकिन इस तरह कि सत्ता जनता के पास रहे। यह अलग बात है कि शासक निरंकुश हो जाते हैं और मुगल बादशाहों में से भी सबसे खराब की तरह व्यवहार करते हैं। जज यह सुनिश्चित करने वाले होते हैं कि लोकतंत्र लोगों के हित में काम करता है। उन्हें यहां तक अधिकार होता है कि वे विधायिका की घोषणाओं की जांच करें। यह बहस चलती रहेगी कि क्या न्यायपालिका सबसे ऊपर है या कार्यपालिका।
अगर इसकी आलेाचना होती है कि जज क्या करते हैं और विधायिका किस तरह काम कर रही है तो पत्रकारों की ओर से होती है। ऐसा करना पत्रकारों का कत्र्तव्य है। अगर उन्हें वह करने में भय होता है जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है, तो यह व्यवस्था के लिए दुर्भाग्य की बात है। मैंने इसका अनुभव किया है कि किस तरह आपातकाल, जिसने इस सप्ताह 26 जून को 41 साल पूरा किया, में पूरे प्रेस ने हथियार डाल दिया। शुरूआत में, विरोध हुए और बड़ी संख्या में पत्रकार (संपादक समेत) दिल्ली के प्रेस क्लब में यह प्रस्ताव पारित करने के लिए जमा हुए कि सेंसरशिप, जो आपातकाल का अभिन्न हिस्सा था, उन्हें मंजूर नहीं है। लेकिन दिन बीतने के साथ-साथ उन पर भय छा गया और वे व्यवस्था के हिस्सा बन गए, यहां तक कि श्रीमती गांधी के बेटे संजय गांधी, जो संविधान से बाहर की एक शक्ति थे, से आदेश भी लेने लगे।
मुझे याद है कि प्रेस कौंसिल के सदस्य के रूप में, मैं इसके अध्यक्ष जस्टिस अय्यर के पास यह दरखास्त करने गया था कि सर्वोच्च संस्था होने की वजह से इसकी बैठक बुलाई जाए। मुझे यह नहीं मालूम था कि भय ने उन्हें आज्ञा का पालन करने वाला बना दिया था। उन्होंने कहा कि प्रेस कौंसिल की बैठक बुलाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इसकी कार्यवाही के बारे में कहीं छपेगा नहीं। मेरा तर्क था कि अगर कोई विरोध नहीं हुआ तो सालों बाद जब इस शर्मनाक अध्याय का दस्तावेज बाहर आएगा तो इसमें पत्रकारों की प्रेस कौंसिल से किसी विरोध का रिकार्ड नहीं होगा। मेरी बात सुनने के बाद झिझक के साथ प्रेस कौंसिल के सदस्यों की एक मीटिंग उन्होंने बुलाई। आपातकाल खत्म होने के बाद जारी श्वेत पत्र में यह देख कर मैं स्तब्ध रह गया कि उन्होंने तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला को लिखा था कि किस तरह उन्होंने (जस्टिस अय्यर) प्रेस कौंसिल की बैठक बुलाने की कुलदीप नैय्यर की कोशिश को रोक दिया था।
पत्रकारों की आजादी का वही सवाल अलग-अलग परिस्थितियों में हमारे सामने बार-बार उपस्थित होता है। मैं पाता हूं कि हम पत्रकार उस स्तर का पालन करने में विफल होते जा रहे हैं, जिसकी हमसे अपेक्षा की जाती है। छोटी खबरों को आगे बढ़ाने वाली नई डिजिटल टेक्नोलौजी या रेडियो-टीवी पर आने वाले भाषण के छोटे अंशों से इसमें किसी प्रकार की मदद नहीं मिली है। वास्तव में, चीजें इस हद तक खराब हो गई हैं कि खबरों के कालम खरीदे जा सकते हैं। यह एक खुला सच है कि कई खबरें पेड़ न्यूज (पैसे लेकर छापी गई खबरें) हैं। कुछ बड़े अखबार अपने अखबारों में जगह बेचने में शर्म नहीं महसूस करते हैं चाहे जो भी इसे खरीद ले। उनके लिए यह विशुद्ध रूप से राजस्व का मामला है।
हम उस स्तर से कितना नीचे गिर गए हैं जहां हम कभी थेघ् एक समय था जब हम तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णाचारी के समय हुए मूंधड़ा बीमा घोटाले को लोगों के सामने लाने में सफल हुए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें कैबिनेट से इस्तीफा देने पर मजबूर किया। बाद में जब टीटीके से मैं मिला तो वह यह महसूस करते दिखाई नहीं दिए कि उन्होंने शासन व्यवस्था का कितना नुकसान किया था। भारत व्यक्तियों के अभाव के बारे में बेपरवाह है। इसके विपरीत, अतीत में ब्रिटेन का मीडिया समाज के विभिन्न क्षेत्रों के पीड़ित लोगों के पक्ष में उतरने को तैयार रहता था। संडे टाइम्स, जिसके लिए मैं स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से काम करता था, को लोग प्यार और कृतज्ञता से उस काम के लिए याद करते हैं जो इसने उन माता-पिताओं की तरफ से किया जिनके बच्चे मरीजों को थैलिडोमाइड नाम की दवा देने के कारण विकलांग पैदा हुए। जनता के दबाव ने थैलिडोमाइड बनाने वाली कंपनी को जरूरी मआवजा देने के लिए बाध्य किया। क्या हम इन उदाहरणों का अनुसरण कर सकते हैं, जब पत्रकार के रूप में हमारी ईमानदरी पर ही सवाल उठ रहे हैं, इस ऊंचे स्तर की बात ही छोड़ दीजिए जिसका पालन हम एक समय करते थे।

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