क्या माफी से गुनाह धुल जाएंगे?

 जाहिद खान
इराक युद्ध के बारह साल बाद ही सही ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने सार्वजनिक तौर पर इस जंग के लिए इराक और दुनिया से माफी मांगी है। माफी मांगने के साथ ही उन्होंने यह बात भी मंजूर की, कि चरमपंथी इस्लामिक संगठन आईएसआईएस के जन्म के लिए कुछ हद तक उन पर इल्जाम लगाए जा सकते हैं। यदि इराक युद्ध नहीं होता, तो आज आईएसआईएस जैसा आतंकी संगठन पूरी दुनिया में हिंसा और आतंक नहीं फैला रहा होता। उनका कहना था कि वे सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद पैदा होने वाली स्थिति का सही आकलन न कर पाए। जिसका खामियाजा आज भी इराक और सारी दुनिया भुगत रही है। ब्लेयर ने युद्ध के बाद की रणनीति में हुई खुफिया गल्तियों के लिए भी माफी मांगी। अलबत्ता लड़ाई शुरू करने के अपने फैसले पर उन्हें आज भी कोई अफसोस नहीं है। इस बारे में उनका कहना है कि तत्कालीन इराकी शासक सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए माफी मांगना मुश्किल है। यदि ऐसा न होता, तो इराक आज का सीरिया बन जाता। अमेरिकी न्यूज चैनल सीएनएन को हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में टोनी ब्लेयर ने कहा, ‘‘मेरा खयाल है कि इसमें कुछ सच्चाई है। अगर इराक पर हमला नहीं किया जाता, तो वहां गृह युद्ध छिडऩे का खतरा था।’’
गौरतलब है कि इराक में सामूहिक जनसंहार करने वाले रासायनिक हथियार होने के शक की बुनियाद पर आज से 12 साल पहले अमरीका और ब्रिटेन के नेतृत्व वाले एक गठबंधन की सेना ने ‘इराक की आजादी’ नामक सैन्य कार्रवाई करते हुए इराक पर हमला किया था। 19 मार्च 2003 से शुरू हुआ यह युद्ध 1 मई 2003 तक चला। इस दौरान अमेरिकी नौ सेना की क्रूज मिसाइलों ने इराक की राजधानी बगदाद समेत कई शहरों पर बम बरसाए। सिर्फ 21 दिनों में बगदाद और इराक के कई बड़े शहर अमेरिका के शिकंजे में आ गए। इस युद्ध ने इराक में बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी थी। इराक जंग से उबरा, तो सुन्नी चरमपंथी समूह आईएसआईएस के कब्जे में आ गया। आईएस के जन्म के पीछे भी जंग के बाद बने हालात थे, जिससे खाद-पानी लेकर आज उसने पूरे इराक के साथ-साथ सीरिया के भी एक बड़े हिस्से को अपने खौफनाक शिकंजे में ले लिया है। अलकायदा से भी ज्यादा मजबूत और खतरनाक इस संगठन ने इराक और सीरिया में क्रूरता के ऐसे-एसे कारनामे अंजाम दिए हैं, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। आईएस और उसके समर्थक समूहों ने पहले तो इराक के अंदर अपने से असहमत लोगों को अपना निशाना बनाया और उसके बाद उनके आतंक से कोई नहीं बच पाया। हत्या, जबरन धर्म परिवर्तन, दासता, यौन हिंसा और समुदाय के समुदायों को उन्होंने बंधक बना लिया है। इराक और सीरिया में आईएस की हिंसा और आतंक का ही नतीजा है कि वहां के स्थानीय लोग अपने ही देश से बड़े पैमाने पर पलायन करने के लिए मजबूर हैं। दुनिया भर में आज जिन इलाकों से सबसे ज्यादा शरणार्थी निकल रहे हैं, उनमें इराक और सीरिया अव्वल हैं। आईएस की बर्बर हरकतों के चलते जहां इराक के 50 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं, तो वहीं सीरिया के हालात उससे भी खराब हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वहां विस्थापन शुरू होने के बाद से, 40 लाख से ज्यादा शरणार्थी दर्ज किए हैं। जबकि अपने ही देश में 70 लाख लोग आंतरिक विस्थापित के रूप में रह रहे हैं। इस तरह साल 2011 के बाद से सीरिया की आधी से भी ज्यादा आबादी अपने घरों से विस्थापित हो चुकी है। जाहिर है इराक जंग में हुई तबाही और जंग के बाद आईएस की हिंसा और आतंक के लिए यदि कोई जिम्मेदार है, तो वह अमेरिका और ब्रिटेन है। युद्ध में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश और ब्रिटिश प्रधानमंत्री टॉनी ब्लेयर दोनों की भूमिका की दुनिया भर में तीखी आलोचना हुई है। जिनकी वजह से लाखों लोगों की जिंदगी तबाह हो गई। बहरहाल जिन इल्जामों को लगाकर इराक पर अमरीका और ब्रिटेन ने सैन्य कार्यवाही की, वे सभी इल्जाम बाद में झूठे साबित हुए। जंग के बाद इराक में एक भी स्थान पर रासायनिक हथियार नहीं मिले। ब्रिटिश प्रधानमंत्री टॉनी ब्लेयर ही नहीं, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश भी इराक जंग के लिए अब अपनी गलती मान चुके हैं। अपनी किताब ‘डिसीजन पॉइंट्स’ में जॉर्ज बुश ने इस बात का साफ जिक्र किया है कि इराक युद्ध में उनसे कई भारी गलतियां हुईं। किताब में वे एक जगह लिखते हैं, ‘‘कार्यकाल के आखिरी दिनों में मैंने खुद को एक डूबते जहाज के कप्तान जैसा महसूस किया।’’
इराक जंग मामले में अमेरिका और ब्रिटेन दोनों भले ही अपने-अपने देशवासियों और दुनिया भर को गुमराह करते रहे हों, लेकिन इस जंग की असली वजह सब जानते हैं। तेल व अन्य ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण की हवस में तथा क्षेत्रीय वर्चस्व हासिल करने की अपनी वृहत्तर मुहिम की योजना के तौर पर अमेरिका और ब्रिटेन ने उस वक्त के खाड़ी के धनवान देश इराक के ऊपर सैन्य कार्यवाही की थी।
इराक में जंग शुरू हुई तब से लेकर आज तक वहां की सरजमीं स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय सत्ता संघर्ष का केंद्र बनी हुई है। जहां न तो सुरक्षा है और न ही आर्थिक स्थिरता। यही वजह है कि यहां के लोग अब अपने देश को, आईएस के लिए छोडक़र भाग रहे हैं। यदि युद्ध नहीं होता, तो आज इराक में ऐसे हालात नहीं होते। एक युद्ध ने पूरे देश को ही तबाह करके रख दिया। युद्ध का खामियाजा वहां की पीढिय़ा दर पीढिय़ा भुगत रही हैं। क्या अमेरिका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी देशों को, संयुक्त राष्ट्र संघ की मंशा और आईएईए की रिपोर्ट के खिलाफ जंग शुरू करने के लिए युद्ध अपराधी नहीं मानना चाहिए?

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