क्या पटेल समाज को आरक्षण मिले?

हम और आप पटेल समुदाय को समृद्ध और कारोबारी समुदाय के रूप में जानते हैं। पटेल देश और विदेशों में गुजरात की समृद्धि के ब्रांड अंबेसडर रहे हैं। आबादी और पैसे के कारण इनकी राजनीतिक ताकत का बोलबाला रहा है। ऐसा समुदाय आरक्षण की मांग करने लगे तो बहुत मेहनत करनी पड़ रही है आंखों के आगे बने मोटे पर्दे को हटाने में।

 रवीश कुमार
राजनीति वो दरिया है जिसकी सतह पर जब धारा शांत लगती है तभी सतह के भीतर की धारा अंगड़ाई ले रही होती है। सबका ध्यान बिहार की चुनावी राजनीति की तरफ है लेकिन गुजरात में एक 22 साल का नौजवान राजनीति की क्षितिज पर उभरता दिखाई दे रहा है।
फिलहाल यह नौजवान न तो किसी दल का समर्थक है न विरोधी। यह अपने समाज के हक और हुकूक की बात करता है। नारा है आरक्षण नहीं तो वोट नहीं। चंद महीनों के भीतर यह गुजरात में लाखों पटेल युवाओं की आवाज़ बन चुका है।
हार्दिक पटेल नाम है। कुंवारे हैं मगर अहमदाबाद से बी. कॉम की पढ़ाई की है। माता-पिता अहमदाबाद के विरंगम तालुका के चंद्रनगर गांव के रहने वाले हैं। पांच सात बीघा ज़मीन है, ट्?यूबवेल का छोटा सा बिजनेस है। हार्दिक के पिता पाटिदार संगठन का सेवादल चलाते थे जिसके कारण कई नेताओं की रैलियों में मंच पर बुलाये जाते रहे हैं। बीजेपी के कार्यकर्ता भी बताये जाते हैं। लेकिन 22 साल के उनके बेटे ने बीजेपी सरकार के लिए ही मुश्किल खड़ी कर दी है।
नौजवानी में यार दोस्तों के बीच आक्रोश और तेवर जताने के लिए लोग बंदूक और रिवॉल्वर के साथ तस्वीरें खींचा लेते हैं, लेकिन हार्दिक को मेरी सलाह है कि ऐसी तस्वीरों से दूर ही रहें। हार्दिक अपने विरंगाम में पाटिदार युवाओं का संगठन चलाते रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे इन नौजवानों को खेती का संकट और बेरोजग़ारी की तस्वीर दिखने लगी उनका आक्रोश एक व्यापक आवाज़ में बदलने लगा। 6 जुलाई को हार्दिक पटेल ने मेहसाणा जि़ले में पाटिदार शिक्षण समिति के बैनर तले रैली की तो पंद्रह से बीस हज़ार लोग आ गए।
उसके बाद सूरत की रैली से पूरे गुजरात के कान खड़े हो गए। सूरत की रैली में लाखों की संख्या में 22 साल के इस नौजवान को सुनने पहुंच गए। इससे पहले अहमदाबाद में रैली निकाली तो 15 से 20 हज़ार बाइक लेकर नौजवान आ गए। अब यह आंदोलन पाटिदार अनामत आंदोलन कमेटी के निर्देशन में ज़ोर पकड़ चुका है। 25 अगस्त की अहमदाबाद में रैली होने वाली है जिसमें लाखों पटेल युवाओं के पहुंचने का दावा किया जा रहा है।
हम और आप पटेल समुदाय को समृद्ध और कारोबारी समुदाय के रूप में जानते हैं। पटेल देश और विदेशों में गुजरात की समृद्धि के ब्रांड अंबेसडर रहे हैं। आबादी और पैसे के कारण इनकी राजनीतिक ताकत का बोलबाला रहा है। ऐसा समुदाय आरक्षण की मांग करने लगे तो बहुत मेहनत करनी पड़ रही है आंखों के आगे बने मोटे पर्दे को हटाने में। हार्दिक पटेल का दावा है कि पिछले पंद्रह साल में खेती ने गांवों के भीतर पटेलों को कमज़ोर किया है। आबादी तीस प्रतीशत होने के बाद भी स्थिति कमजोर ओर नौकरियां नहीं मिल रही हैं। इसलिए एडमिशन और नौकरी में आरक्षण चाहिए। गुजराती में आरक्षण को अनामत कहते हैं। एक समय पटेल नेताओं ने ओबीसी आरक्षण का विरोध किया था अब ओबीसी दर्जा मांग रहे हैं। सामाजिक मंच से ही सही, 22 साल के इस नौजवान का उभार बता रहा है कि राजनीति में अभी कुछ भी अंतिम रूप से नहीं हुआ है। हार्दिक ने गुजरात से बाहर यूपी और मध्य प्रदेश में कुर्मी पटेल सम्मेलनों में भी हिस्सा लिया है। बिहार में कुर्मी, गुजरात में पटेल या पाटिदार, महाराष्ट्र में पाटिल कहते हैं। हार्दिक का उभार सिर्फ पटेल जाति का अपने लिए आरक्षण मांगना ही नहीं बल्कि खेती के संकट को भी सामने ला रहा है जिसे हम समृद्ध गुजरात के प्रचारों से बनी लाल कालीन के नीचे छिपा देते हैं।आरक्षण को लेकर पटेल युवा बड़ी संख्या में हार्दिक पटेल के पीछे आ रहे हैं। गुजरात मे पिछले पंद्रह सालों से लगता रहा है कि बीजेपी और बीजेपी के बाहर नरेंद्र मोदी के सामने कोई दूसरा नेता ही नहीं है। मोदी के आलोचकों ने लिखा कि गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाया जा चुका है। वहां के वोट की एक ही पहचान है हिन्दुत्व लेकिन अब उन्हें भी अपनी किताब फिर से पढऩी चाहिए कि आखिऱ वो क्या बात है कि एक 22 साल के लडक़े के पीछे इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हो जाता है। आरक्षण के लिए पटेलों ने पहले भी मांग की है। गुजरात ही नहीं देश के कई हिस्सों में कई जातियों को ओबीसी में शामिल किया गया है और शामिल किये जाने की मांग होती रही है। हाल के गुर्जर और जाट आरक्षण की मांग के बारे में आपको कुछ कुछ याद होगा ही। यूपीए सरकार ने जाट आरक्षण दिया और एनडीए ने भी स्वीकार किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण के फैसले को रद्द कर दिया।
पटेल युवाओं को विदेशों में भी समर्थन मिल रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इंग्लैंड के पटेल लोगों ने युनाइटेड पाटिदार किंग नाम से एक समूह बना लिया है और वे आरक्षण की मांग का समर्थन कर रहे हैं। अमेरिका के पटेल समुदाय में भी हलचल हो रही है। इससे पहले कि यह मामला ग्लोबल हो जाए लोकल लेवल पर चर्चा हो जानी चाहिए प्राइम टाइम में।

Pin It