क्या ‘इंडिया ऑन सेल’ की तरफ बढ़ रहा देश?

अफसोसजनक यह है कि जिस कांग्रेसी ‘बुत और मौनपरस्ती’ के माहौल से ऊब कर जनता ने बदलाव और अपनापे की बात करने वाले ‘स्वदेशियों’ पर भरोसा किया था, आज वे ही कांग्रेसियों से भी दस गुना आगे बढ़ कर ‘विदेशी- व्यापारी और कंपनियां ही सही’ के लिए पलक पांवड़े बिछा रहे हैं। ऐसा किन शर्तों पर, किन कीमतों पर, और किनकी मांग पर हो रहा है, के बारे में न तो सरकार किसी को कुछ बता रही है, न ही कोई जानने को लालायित दिख रहा है।

जय प्रकाश पांडेय
चाणक्य ने कभी कहा था, ‘जिस देश का राजा व्यापारी हो, उस देश की प्रजा भिखारी होगी’। तब बात चाहे जिन संदर्भ में कही गई हो, पर पिछले पंद्रह-बीस सालों में इस देश में विकास, उदारवाद और निवेश के नाम पर जिस तरह की ‘पूंजीपरस्त’ नीतियां बनाई जा रही हैं, और लोक-लुभावन नारे देकर तथाकथित तरक्की का इंद्रजाल खड़ा किया जा रहा है, वह इतना खतरनाक है कि अगर इस पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो एक बार फिर देश गुलामी की राह पर कदम बढ़ा देगा, यह और बात है कि पूंजीपति-व्यापारियों और मौकापरस्त राजनीतिकों को यह गुलामी सीधे-सीधे दिखेगी नहीं।
अफसोसजनक यह है कि जिस कांग्रेसी ‘बुत और मौनपरस्ती’ के माहौल से ऊब कर जनता ने बदलाव और अपनापे की बात करने वाले ‘स्वदेशियों’ पर भरोसा किया था, आज वे ही कांग्रेसियों से भी दस गुना आगे बढ़ कर ‘विदेशी’- व्यापारी और कंपनियां ही सही, के लिए पलक पांवड़े बिछा रहे हैं। ऐसा किन शर्तों पर, किन कीमतों पर, और किनकी मांग पर हो रहा है, के बारे में न तो सरकार किसी को कुछ बता रही है, न ही कोई जानने को लालायित दिख रहा है। जिस फेसबुक के कार्यालय में जाकर अपने प्रधानमंत्री संवेदना के आंसू बहाकर आए हैं, उन्हें महंगाई की मार से दम तोड़ता मध्यवर्ग और अपनी पूंजी और श्रम से जिंदा रहने की कोशिश में दिन-रात खटता इस देश का कामकाजी वर्ग नहीं दिखता।
लोगों को नारों, वादों और धार्मिक कट्टरता के उन्माद में उलझाया जा रहा है, और देश का कारोबार केवल अमीरों, चाहे वे देशी हों या विदेशी के जिम्मे छोड़ दिया गया है। आलम यह है कि सरकार की इन नीतियों से जनता तो जनता, न्यायालय तक खुश नहीं हैं। जिस तरह से फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग के लिए सरकारी विभागों की तिजोरी खोल दी गई है, उसे लेकर अक्टूबर के पहले हफ्ते में भाजपा के थिंक टैंक रहे केएन गोविंदाचार्य की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली के उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार नाराजगी जाहिर करते हुए उसे नोटिस देकर पूछा है कि सरकार बताए कि फेसबुक जैसी कंपनियों से उसने किस तरह के और कैसे करार किए हैं। दरअसल केंद्र की नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा सरकार कर्ज और घूस आधारित व्यवस्था को स्थायी रूप देने की दिशा में जिस तरह से आगे बढ़ रही है, और ‘इन्वेस्टमेंट’ के लिए उपयोगी माहौल बता कर जिस तरह से उसकी मार्केटिंग कर रही है, उसमें देश के लाभ वाले हर क्षेत्र, चाहे वह जमीन हो, तकनीक हो, आसमान हो, व्यापार हो, उत्पाद हो, उपज हो, यहां तक कि भावनाओं तक के बिक या बेच दिए जाने, और हर एक व्यक्ति के ‘प्रॉडक्ट’ बन जाने का खतरा पैदा हो गया है। अमेरिका शुरू से ही भाजपा के एजेंडे का हिस्सा रहा है, अमेरिका में सबसे ज्यादा मोटल गुजराती भाइयों के हैं। व्यापार में गुजरात आगे है ही। पर जिस अमेरिका को हम आर्थिक आधार पर विकसित देश मानते हैं, उसकी सामाजिक और माली स्थिति कितनी खराब है, इसका अंदाज वाशिंगटन, न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया या लॉस एंजेलिस की बड़ी बिल्डिंगों को देख कर नहीं लगाया जा सकता। अमेरिका की समूची पूंजी का 99 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास है। यानी केवल एक प्रतिशत वाला प्रभु वर्ग अपनी पूंजी से समूचे अमेरिका और 99 प्रतिशत अमेरिकियों पर कब्जा जमाए बैठा है।
वहां का बौद्धिक जागरूक तबका जाने कब से एक प्रतिशत बनाम 99 प्रतिशत की जंग छेड़े हुए है। उसी ‘एक प्रतिशत’ में शुमार होने वाले पूंजीपति वर्ग की निगाहें अब कांग्रेसी राज में एक बड़े बाजार के रूप में तब्दील हो चुके भारत पर टिकी हैं। अमेरिका में चाहे रिपब्लिकन हों, या डेमोक्रेट, दोनों ही दल केवल उस एक प्रतिशत वाले प्रभु वर्ग की सेवा में लगे रहते हैं। सच यह है कि अमेरिका की जिस 19 प्रतिशत कामकाजी आबादी के शौर्य, श्रम और काबिलियत पर अमेरिका इतराता है, वह वर्ग भी, चाहे वह सरकार, सेना, कंपनियों में हो या निजी हलके में, केवल इस प्रभु वर्ग की सुविधा और पूंजी बढ़ाने के खेल में जाने-अनजाने लगा है। शेष 80 प्रतिशत अमेरिकियों का कोई पुरसाहाल नहीं। उनके लिए वही रोजमर्रा के जीवनयापन का संकट बना हुआ है।

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