कौशल विकास से खुलेगा नए रोजगार सृजन का रास्ता

मान लीजिए किसी किसान के या कारीगर के चार बेटे हैं और कोई दूसरा रोजगार न मिल पाने पर वे भी अपने पिता के ही काम में शामिल हो जाते हैं। जो काम एक व्यक्ति करता था, वहीं काम पांच करने लगते हैं। यानी उनमें से कम से कम चार के पास वास्तव में कोई काम नहीं होता है, वे बेरोजगार होते हैं, लेकिन रोजगारशुदा नजर आते हैं। सिर्फ मजदूरों के बच्चे नहीं, दुकानों पर, कपंनियों में और अन्य जगहों पर भी, ऐसे लोग रोजगार में लगे नजर आते हैं।

 ज्ञानेंद्र नाथ बरतरिया
भारत में एक करोड़ 25 लाख नए युवा हर साल रोजगार की तलाश में घर से निकलते हैं। यह संख्या हर साल बढ़ रही है। भारत युवा देश है, और युवा देश होने का एक पहलू यह भी है कि यहां युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना एक चिंता का विषय है। एक पहलू और भी है। मान लीजिए किसी किसान के या कारीगर के चार बेटे हैं और कोई दूसरा रोजगार न मिल पाने पर वे भी अपने पिता के ही काम में शामिल हो जाते हैं। जो काम एक व्यक्ति करता था, वहीं काम पांच करने लगते हैं। यानी उनमें से कम से कम चार के पास वास्तव में कोई काम नहीं होता है, वे बेरोजगार होते हैं, लेकिन रोजगारशुदा नजर आते हैं। सिर्फ मजदूरों के बच्चे नहीं, दुकानों पर, कपंनियों में और अन्य जगहों पर भी, ऐसे लोग रोजगार में लगे नजर आते हैं, जिनके काम से उत्पादकता पर कोई खास असर नहीं पड़ता। यह प्रच्छन्न बेरोजगारी की समस्या है, जो 1 करोड़ 25 हजार लाख के आंकडे को और गंभीर बना देती है। कैसे मिलेगा इन्हें रोजगार? जवाब सिर्फ रोजगार के नए और उत्पादक अवसरों में है। और रोजगार अवसर मुहैया कराने की हमारी क्षमता कैसी है? (तत्कालीन) योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2004-05 से 2009-10 तक, पांच वर्षों में भारत में रोजगार के मात्र 27 लाख नए अवसर पैदा हुए हैं, जबकि आवश्यकता लगभग 6 करोड़ अवसरों की थी। इतना ही नहीं, 2009-10 में 1 करोड़ 57 लाख लोग कृषि क्षेत्र से बेरोजगार हुए, और लगभग 72 लाख लोग विनिर्माण क्षेत्र से। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि हमें रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर सकने की अपनी क्षमता तेजी से बढ़ानी होगी।
कई युवा शिक्षित भी हैं लेकिन उन्होंने जो कुछ पढ़ा-लिखा-सीखा है, उसमें से रोजगार दिलाने लायक कम ही है। और जो रोजगार में हैं, उन्हें अपनी औपचारिक शिक्षा से कोई लाभ बहुत कम होता है। वास्तव में रोजगारशुदा लोगों में से सिर्फ 2.3 प्रतिशत ऐसे हैं, जिन्हें अपने काम की दक्षता किसी शैक्षणिक कार्यक्रम से औपचारिक तौर पर मिली हो। बाकी सब चलते काम में हाथ बंटाने की स्थिति में हैं। इसके विपरीत, दुनिया के विकसित देशों में 75 प्रतिशत से लेकर 96 प्रतिशत तक लोग अपने कार्य के बारे में औपचारिक तौर पर दक्ष हैं। फिर हम दुनिया के सबसे युवा देश भी हैं। आज की स्थिति में भारत की जनसंख्या में पाया जाने वाला सबसे बड़ा आयु वर्ग 27 वर्ष की औसत उम्र के लोगों का है, जो चीनियों से औसत उम्र में 10 साल कम है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार भारत में लगभग 36 करोड़ लोग 10 से 24 वर्ष की बीच की आयु के हैं, जो अमेरिका की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है। 2020 तक भारत की जनसंख्या की औसत आयु 29 वर्ष होगी, जबकि औद्योगिक देशों में यही आयु 40 से 50 वर्ष के बीच होगी। ऐसा नहीं है कि बाजार में नौकरियां नहीं हैं। लेकिन आवश्यकता से कम हैं, प्राय: असंगठित क्षेत्र में हैं, उनमें आमदनी भी मामूली है और उत्पादकता भी मामूली है। कोई होनी-अनहोनी हो जाए, तो वह नौकरी कोई दिलासा देने की स्थिति में भी नहीं होती।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने युवा देश के इस पक्ष का कई बार जिक्र किया है। यहां प्रश्न सिर्फ युवाओं को किसी कार्य की दक्षता देने का नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसा रोजगार दिलाने का है, जो वास्तव में आय का सृजन करता हो। रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए एक ओर तो नए-नए उद्योग-धंधे चाहिए, और दूसरी ओर उनमें काम करने के इच्छुक युवाओं में काम कर सकने की दक्षता चाहिए। तीसरे और थोड़े बारीक स्तर पर, ऐसे लोग भी चाहिए, जो उद्योग शुरू करने में उत्सुक हों, उसकी क्षमता रखते हों। फिर रोजगार को कम से कम इस लायक तो होना ही चाहिए कि वह किसी अनपेक्षित स्थिति में अपने श्रमिकों की, उनके परिवार की कुछ चिंता कर सकता हो।
लिहाजा, इस समस्या से एक साथ कई स्तरों पर निपटा जा रहा है। आशा है कि मेक इन इंडिया का विश्व व्यापी अभियान भारत में नए उद्योग-धंधों की आवश्यकता को एक हद तक पूरा करने में सफल रहेगा। दूसरे स्किल इंडिया अभियान भारत के युवाओं को या इनकी मदद से शुरू होने वाले अन्य उद्योगों में रोजगार दिलाने में सफल रहेगा। स्मार्ट सिटीज का अभियान विशेषकर इन नए उद्योगों और उनमें काम करने वालों की रिहाइश और उनके शहरीकरण की आवश्यकताएं पूरी करेगा। किसी होनी-अनहोनी की स्थिति से निपटने में प्रधानमंत्री की विविध बीमा योजनाएं मददगार रहेंगी। जैसे-जैसे मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी के अभियान गति पकड़ते जाएंगे, प्रधानमंत्री की बीमा और सामाजिक सुरक्षा की अन्य योजनाओं में कुछ ऐसे नए पहलू जुड़ते जाएंगे, जो कई उद्देश्यों को एक साथ पूरा कर रहे होंगे। इस तरह की कई परियोजनाएं एक साथ काम करेंगी, तब युवाओं के रोजगार और उनकी खुशहाली का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा।

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