कैसा हो संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों का आचरण

 साकेन्द्र प्रताप वर्मा
भारत का लोकतंत्र सभी को अपने बात कहने का अधिकार देता है, परन्तु हर एक की अपनी मर्यादा रेखा भी है। जब उस मर्यादा रेखा का अतिक्रमण होता है, तब लेखकों की लेखनी भी कुछ प्रश्नों का उत्तर तलाशने लगती है। अभी कुछ दिन पूर्व भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने मुसलमानों के विकास के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार से अपेक्षा की कि वह इस पर विशेष ध्यान दें। यह संदेश उन्होंने उस सरकार को दिया है जिसका मुखिया ‘सबका साथ-सबका विकास’ को अपनी कार्य संस्कृति का आदर्श मानता है, जिसकी आंखों में हर समय सवा सौ करोड़ भारतवासी बसते हैं। जो देश के नागरिकों को वोट के चश्मे से नहीं देखता। सबको प्यार देना, सबका प्यार लेना, सबका समान रूप से विकास करना और देश को आगे बढ़ाना, जिसके राजनैतिक जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, उनकी सरकार को एक मजहब मात्र के विकास के लिए प्रेरित करना लोकतंत्र की मर्यादा का उल्लंघन है।
विचार करने की जरूरत है कि कश्मीर में आई बाढ़ के समय प्रधानमंत्री ने तुरंत सहायता भेजी, क्यों? वहां तो अधिकांश मुसलमान ही थे। उनकी सेवा के लिए उसी सेना के जवानों को क्यों मोर्चे पर लगाया, जिन पर वहां के कुछ नागरिक पत्थर फेंकते थे? इराक संकट के समय केरल की जिन नर्सों को भारत सरकार सुरक्षित वापस लायी वे कौन थी? यमन में आईएसआईएम के आतंक से जिन 48 देशों के लोगों सुरक्षित वापस लाने का काम मोदी सरकार ने किया वे कौन थे? नेपाल भूकम्प के समय जिन 50 देशों के लोगों को नेपाल से बिना वीजा देखे मानवता के नाम पर बाहर निकाला वे कौन थे? क्या इन सब कामों के लिए सरकार को ये ढिंढोरा पीटना चाहिए कि इतनी संख्या में मुसलमानों का कल्याण मैंने किया है। किसी की मदद करना और मदद के बदले नोट तलाशना मोदी की कार्य संस्कृति में नहीं है।
मैं एक बार अहमदाबाद गया, तब नरेन्द्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे। मुझे वहां से टैक्सी द्वारा सरदार सरोवर बांध जाना था। संयोग से उस टैक्सी का चालक मुसलमान था। रास्ते में अधिक दूरी में स्वाभाविक चर्चा के दौरान उससे पूछा कि यहां तुम लोगों का काम धंधा कैसा है, नरेन्द्र मोदी तो हिंदुओं को अधिक सुविधायें देते होंगे, मुसलमानों को कम। उस मुस्लिम चालक ने तपाक से उत्तर दिया कि हमारे गुजरात में हम लोग खुश हैं, बड़ा सुकून है, रोजगार और आमदनी भी अच्छी है। गुजरात को बदनाम तो नेता लोग करते हैं। उपराष्ट्रपति को चाहिए कि मजहबी चश्मा उतारें, आम जनता की आवाज को सुनें और समझें। तब बोलें।
वैसे भी देश के संवैधानिक पदों पर विराजमान लोगों की बातचीत, व्यवहार और कार्य संस्कृति पद की गरिमा के अनुरूप होनी चाहिए। इस देश में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के एक-एक शब्द की कीमत होती है। इस कीमत को किसी गुट या मजहब के पास गिरवी रखने का अधिकार इनमें से किसी के पास नहीं है। ये पद किसी राजनैतिक प्रतिद्वन्दिता अथवा चुनावी महासमर के आरोपों-प्रत्यारोपों से प्राप्त नहीं होते हैं। इन पदों की अपनी गरिमापूर्ण मर्यादा है। इन पदों पर बैठे यदि किसी व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में आये दिन राजनैतिक या मजहबी कीड़ा काटता रहता है, तो उन्हें अपनी पसंद के राजनैतिक दल या मजहबी संगठन में ही काम करने के लिए अपने को स्वतंत्र कर लेना चाहिए। प्रधानमंत्री का पद जिस राजनैतिक तरीके से मिलता है उसमें आरोप प्रत्यारोप चलते हैं, पक्ष-विपक्ष चलता है, परन्तु मर्यादा वहां भी है। कभी-कभी वहां भी मर्यादाहीनता की अवस्था आ जाती है। देश ने देखा है कि 17 दिसम्बर 2006 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कह दिया कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। गरीब, कमजोर, बेसहारा, अपंग उन्हें दिखाई नहीं दिया।
देश के प्रथम कांग्रेसी प्रधानमंत्री, जवाहर लाल नेहरू ने 26 मई 1949 को संविधान सभा में कहा था कि पार्थक्य की बात से हमारे देश का जबर्दस्त अहित हुआ है। सरदार पटेल ने तो यहां तक कहा था जिन अल्पसंख्यकों ने जबर्दस्ती देश का विभाजन करवा दिया उन्हें आप अल्पसंख्यक कहते हो। फिर भी कांग्रेस के बलबूते उपराष्ट्रपति की कुर्सी पर विराजित होने वाले उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने 20 जनवरी 2009 को अल्पसंख्यक आयोगों के वार्षिक सम्मेलन में अल्पसंख्यकों के और अधिक संरक्षण की वकालत की थी। इतना ही नहीं अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम 1989 की भांति अल्पसंख्यक अधिनियम बनाने तथा राज्य अल्पसंख्यक आयोगों को मानवाधिकार आयोग जैसे अधिकार देने की भी पैरवी की थी। तब शायद कांग्रेस को अंसारी के स्वर पसंद आये होंगे क्योंकि लोकसभा का चुनाव सिर पर था। अब जब बिहार का चुनाव सामने है तो फिर से अंसारी का मुस्लिम प्रेम छलक रहा है, मुसलमानों के विकास का एजेंडा देश को दिखाया जा रहा है जिससे बिहार में रश्मि रथी का घोड़ा रोका जा सके। संवैधानिक पदों पर बैठे लोग मर्यादा की सीमा रेखा इस प्रकार तोड़ेंगे ऐसा तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा जिन्होंने इन संवैधानिक पदों का सृजन किया होगा।

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