कैबिनेट के बयानबाज सदस्य हैं कि मानते ही नहीं

पूर्व सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह ने फरीदाबाद में दलित परिवार के घर आगजनी के मुद्दे पर मीडिया से बातचीत करते हुए कुछ ऐसा कह दिया जिससे लगा कि उन्होंने तुलना कुत्ते से कर दी है।

 नीरज कुमार दुबे
पिछले कुछ समय से अपने ही मंत्रियों, नेताओं के विवादित बयानों से विपक्ष के निशाने पर लगातार रह रही मोदी सरकार की परेशानी इस बार उसके एक और ‘बयानवीर’ मंत्री वी.के. सिंह ने बढ़ाई है। पूर्व सेनाध्यक्ष सिंह ने फरीदाबाद में दलित परिवार के घर आगजनी के मुद्दे पर मीडिया से बातचीत करते हुए कुछ ऐसा कह दिया जिससे लगा कि उन्होंने तुलना कुत्ते से कर दी है। हालांकि विवाद बढऩे पर सिंह ने सफाई भी पेश की और एक बार फिर अपने बयान पर विवाद को मीडिया की गलती बताने से गुरेज नहीं किया। वी.के सिंह ने इससे पहले जब मीडिया के लिए वेश्या शब्द का इस्तेमाल किया था तब भी खूब विवाद हुआ था। यही नहीं पाकिस्तानी उच्चायोग जाने को ड्यूटी की मजबूरी बताकर वह सरकार को पहले भी शर्मसार कर चुके हैं और पिछले दिनों साहित्यकारों को शराब से जोडऩे पर भी घिर चुके हैं।
दलितों की राजनीति करने वाली बसपा के अलावा कांग्रेस और अन्य सभी विपक्षी दलों ने सिंह की बर्खास्तगी की मांग की है और उनके खिलाफ पुलिस थाने में भी शिकायत दी है। जहां तक सिंह को मंत्रिमंडल से हटाने की मांग है उसके संबंध में भाजपा जानती है कि सिंह भले ही विवादित बयान देकर सरकार के लिए मुश्किलें पैदा करते रहेंगे लेकिन वह पार्टी के लिए जरूरी भी हैं। पार्टी यह भी जानती है कि सरकार से बाहर जाने के बाद सिंह संभवत: ज्यादा बड़ा सिरदर्द बन सकते हैं, इसलिए उनके बयानों को पार्टी की ओर से अकसर निजी बताया जाता है लेकिन सिंह का पूरी तरह साथ दिया जाता है। हालिया विवादित बयान पर भाजपा आलाकमान संभवत: ज्यादा कड़ाई से इसलिए पेश आया क्योंकि पार्टी बिहार की सत्ता हासिल करने के लिए जीतोड़ प्रयास में लगी हुई है, दलित वोटों पर पडऩे वाले संभावित असर को देखकर ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को बयान देते समय सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि सिर्फ मीडिया की गलती बताकर हम बच नहीं सकते।
हालांकि सिंह ने फरीदाबाद की घटना के संबंध में जो कुछ कहा था उसमें पहली नजर में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था लेकिन उन्होंने ऐसा जरूर कह दिया था जिसके अपने-अपने हिसाब से मायने निकाले जा सकते हैं। जब चुनावों का दौर हो तो नेताओं को वाकई संभल कर बोलना चाहिए क्योंकि किसी के बयान की क्या व्याख्या हो जाए और उसे कितना तूल दे दिया जाए इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। सिंह राजनीति में आने के बाद से विवादास्पद बयान देने लगे हों ऐसा नहीं है, सेना में रहते हुए भी वह कई बार विवादों के घेरे में आए तब उन पर हमले इस कारण भी नहीं होते थे कि वह सेनाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर थे लेकिन पहले जन लोकपाल आंदोलन से जुडऩे और फिर लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा में शामिल होने के बाद से वह लगातार विवादों में रहे। पिछले मंत्रिमंडल फेरबदल के समय जब उनसे उत्तर-पूर्व के मामलों का प्रभार वापस लिया गया तो माना गया कि प्रधानमंत्री ने उन्हें एक तरह से अपनी नाराजगी से अवगत कराया है।
सिंह केवल विवादों में रहे हों ऐसा नहीं है। अभी कुछ समय पहले युद्धग्रस्त यमन में फंसे भारतीयों को सकुशल निकालने के लिए चलाये गये अभियान का उन्होंने नेतृत्व किया और यमन में ही कैंप कर जो भारतीय स्वदेश लौटना चाहते थे उन्हें वहां से निकालने में हर तरह की मदद मुहैया कराई। यही नहीं इस भारतीय अभियान के तहत अन्य देशों के फंसे लोगों को भी निकाला गया। प्रधानमंत्री ने इसके लिए सिंह की तारीफ भी की थी।
बहरहाल, भाजपा नेताओं, मंत्रियों के विवादित बोलों से नाखुश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अभी हाल ही में ‘बयानवीर’ नेताओं को जो हिदायत जारी की थी, लगता है उसका असर शायद हुआ नहीं है। तभी तो वी.के. सिंह के साथ ही किरण रिजीजू भी पार्टी के लिए सिरदर्द बने। रिजीजू ने दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना के उस बयान से सहमति जताई कि उत्तर भारतीयों को कानून तोडऩे में मजा आता है। जाहिर है बिहार में इन दोनों बयानों ने पार्टी को नुकसान पहुंचाने का काम किया है। सरकार को मंत्रियों को कड़ा निर्देश जारी करना चाहिए क्योंकि उनका कोई भी विवादित बयान संसद के आगामी शीतकालीन सत्र को बाधित कर सकता है जिससे पहले से ही अटके पड़े विधेयकों का भविष्य फिर अधर में लटक जाएगा।

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