केजीएमयू में मरीजों की जान से खिलवाड़, कुलपति लाचार

प्रशासन के ढीले रवैये के कारण लापरवाह कर्मचारियों के खिलाफ नहीं हो रही कार्रवाई
कुलपति पर व्यस्था दुरुस्त करने में नाकाम होने और भेदभाव करने का लग रहा आरोप

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
captureलखनऊ। केजीएमयू प्रशासन ने सारे नियमों और कायदों को ताक पर रख दिया है। यहां मरीजों के इलाज में लापरवाही का मामला हो, फर्जी तरीके के नियुक्ति का मामला हो या किसी डॉक्टर की लापरवाही से मरीज की मौत का मामला हो, पीडि़त को न्याय मिल पाना मुश्किल हो गया है। इस वजह से केजीएमयू की सुचिता पर लगातार सवालिया निशान खड़े किए जाने लगे हैं। यहां के मुखिया कुलपति प्रो.रविकांत प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त करने के बजाय अपने परिवार यानि केजीएमयू के चिकित्सकों और कर्मचारियों के सामने नतमस्तक हैं। वह चिकित्सकों तथा कर्मचारियों का दोष सिद्घ होने के बाद भी कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। वहीं कुलपति पर अपने चहेतों को बचाने और विरोधियों पर कार्रवाई करने और कार्रवाई का दबाव बनाने के आरोप भी लगते रहे हैं। इसलिए कुलपति के दोहरे मापदण्ड की वजह से केजीएमयू की सुचिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
केजीएमयू के कुलपति प्रो. रविकांत दोहरा मापदण्ड अपना रहे हैं, जिसके चलते यहां इलाज कराने आये मरीजों की जान भी आफत में है। इसका ताजा उदाहरण केजीएमयू के नेत्र रोग विभाग में ऑपरेशन के बाद मरीजों के आंख की रोशनी जाने का मामला है, जिसमें दोषी पाये गये चिकित्सकों पर कुलपति ने कोई कार्रवाई नहीं की है। कुलपति प्रो.रविकांत का कहना है कि चिकित्सकों पर कार्रवाई करने से पूरी व्यवस्था चरमरा जायेगी, जो इलाज चल रहा है,वो भी बंद हो जायेगा। इसलिए दोषी पाये गये चिकित्सकों को कोई दण्ड नहीं दिया जा सकता है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जिन लोगों के आंखों की रोशनी चिकित्सकों की लापरवाही के चलते चली गयी, उन मरीजों को न्याय कैसे मिलेगा। क्या आने वाले समय में मरीजों के साथ इलाज में लापरवाही की घटनाएं और बढ़ेंगी, क्योंकि कुलपति के बयान से तो निश्चित तौर पर लापरवाह चिकित्सकों और कर्मचारियों का मनोबल बढ़ेगा। उनके भीतर गलत काम करने पर किसी भी तरह की कार्रवाई का डर खत्म हो जायेगा। ऐसे में वह जानबूझकर गलतियां करेंगे। मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ करने में भी संकोच नहीं करेंगे। गौरतलब है कि इससे पहले 2009 में 30 लोगों की आंख का ऑपरेशन के बाद आंखों की रोशनी चली गयी थी, उस समय भी लापरवाह चिकित्सकों पर कोई कार्रवाई नहीं हुयी थी। इस घटना के सात साल बाद केजीएमयू के चिकित्सकों ने 2016 में वही कहानी दोहराई। पिछले साल 50 से अधिक लोगों का नेत्ररोग विभाग में आपरेशन किया गया, उसके बाद दो दर्जन लोगों की आंखों की रोशनी चली गयी थी। इस मामले में जांच हुई और आधे दर्जन से ज्यादा मामलों में चिकित्सकों की लापरवाही की बात सामने आयी। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

विभागीय खामियां उजागर करने वालों के खिलाफ कार्रवाई
केजीएमयू में तैनात एक कर्मचारी को एक साल पहले केजीएमयू ऑफिस से कुछ सूचनाएं बाहरी लोगों को देने के आरोप में संस्पेड कर दिया गया था। उसके बाद कर्मचारी को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, तब उसको कोर्ट से राहत मिली और दोबारा नौकरी पर लौटा। इसके अलावा दो साल पहले शिक्षक संघ को प्रेसवार्ता करने के लिए नोटिस दिया गया था। जबकि उसके एक साल बाद सीवीटीएस विभाग के चिकित्सकों द्वारा अपने विभाग की कमियां बताने के लिए प्रेसवार्ता की गयी थी। इस प्रेसवार्ता में खास बात यह रही कि एक तरफ चिकित्सक प्रेसवार्ता कर रहे थे,तो दूसरी तरफ एक मरीज ने इलाज के अभाव में दमतोड़ दिया था।

घोटाला करने वालों को बचाने में जुटे वीसी
केजीएमयू स्थित कन्वेंशन सेंटर में बुकिंग के नाम पर दो बाबुओं ने लाखों रुपयों का घोटाला किया । इन बाबुओं ने कन्वेंशन सेंटर की बुकिंग के नाम पर लोगों से धन तो लिया लेकिन केजीएमयू के खाते में वो धन जमा नहीं किया। जब इस बात का खुलासा हुआ, तो उन पर पुलिसिया कार्रवाई करने के बजाय कुलपति ने दोनों बाबुओं को सस्पेंड कर कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति कर दी। जानकारों की मानें तो कानूनी तौर पर सरकारी धन का घपला करने वालों पर विभागीय कार्रवाई होने के साथ ही एफआईआर करवाने का भी प्रावधान है। लेकिन चूंकि दोनों बाबू वीसी के करीबी थे। इसलिए उन्होंने मामले में पुलिस को इन्वाल्व करने के बजाय खुद ही सुलझा लिया। आज भी केजीएमयू के दोनों घोटालेबाज बाबू आजाद घूम रहे हैं।

चिकित्सक के बदले नर्स को किया सस्पेंड

हाल ही में केजीएमयू के क्वीनमेरी अस्पताल में भर्ती रितेश की नवजात बच्ची इलाज के दौरान वार्मर की चिंगारी से झुलस गई थी। इस मामले में संविदा पर तैनात नर्स को सस्पेंड कर दिया गया लेकिन लापरवाह चिकित्सकों को बचा लिया गया। वहीं बच्ची के पिता रितेश ने लापरवाह चिकित्सकों पर कार्रवाई के लिए कुलपति से लेकर राज्यपाल तक से गुहार लगाई लेकिन अब तक दोषी चिकित्सकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई जबकि इस घटना में केजीएमयू प्रशासन की लापरवाही भी सामने आई, जिसमें नियोनेटल केयर यूनिट में लगे 15 वार्मर में अधिकांश खराब ही रहते हैं। चिकित्सकों की मानें तो अस्पताल में औसतन 50 बच्चों को एनएनयू में रखा जाता है। बच्चों की अपेक्षा वार्मर की संख्या काफी कम है।

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