केंद्र में दो साल हुए मोदी कैबिनेट को, देश का भरोसा कायम

1984 के बाद 2010 तक किसी भी दल या नेता को अपने दम पर सरकार बनाने का सौभाग्य हासिल नहीं हुआ। 1989, 1991, 1996, 98, 99 और 2004 में हुए आम चुनाव में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। गठबंधन की सरकारें ही बनती और चलती रहीं और आंतरिक बाह्य दबाव के चलते वह सभी सरकारें बिना किसी भय के फैसले लेने में उतनी सक्षम नहीं थी, जितनी मोदी सरकार है।

ओमकार चौधरी
दो साल पहले नरेन्द्र मोदी ने इसी माह में देश की बागडोर संभाली थी। चूंकि उन्हें ऐतिहासिक जनादेश मिला है। इसलिए अपेक्षाएं भी अधिक हैं। जहां इतनी उम्मीदें हों, वहां यह अंदाजा लगाना आसान है कि उनसे पहली सरकार ने देश को काफी निराश किया था। जो वह सरकार नहीं कर सकी, उसकी उम्मीद मोदी सरकार से लगाई जा रही है। हालांकि इसमें कुछ भी गलत नहीं है। चुनाव के दौरान ऐसे बहुत से वादे मोदी ने कर रखे हैं, जिन्हें लोग अब पूरा होते देखना चाहते हैं।
हालांकि उनकी सरकार ने आधा सफर भी तय नहीं किया है परन्तु लोग अब पांच साल तक इंतजार नहीं करते। यह टी-ट्वेंटी का जमाना है, जिसमें तीन घंटे में नतीजा आ जाता है। लोग इस आधार पर सरकारों का आकलन करने लगे हैं कि उसकी जेब में क्या आया है। किसी सरकार के लिए दो साल की अवधि न कम होती है और न बहुत ज्यादा परन्तु इतनी अवधि में उसकी दिशा, नीति, नीयत और नेतृत्व की परख जरूर हो जाती है। पहली सरकार के साथ तुलना करने पर अंतर साफ पता लग जाता है। इन दो सालों में भ्रष्टाचार की एक भी घटना सामने नहीं आई है, जिसके चलते मनमोहन सिंह की सरकार ने लोगों का भरोसा को दिया था।
दो साल पूरे होने पर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। जैसे, सरकार रोजगार सृजन में सफल नहीं रही है। महंगाई पर अंकुश नहीं लगा। सुरक्षा के मोर्चे पर उतनी सफल नहीं रही, जितने दावे किए गए थे। विरोधी दल पठानकोट हमले की विफलता को लेकर नरेन्द्र मोदी सरकार को सवालों के कटघरे में खड़ा करते रहे हैं। काले धन के प्रश्न पर भी जवाब तलबी की जा रही है।
ऐसे बहुत से मुद्दे हैं, जिन्हें किसी राज्य में चुनाव के समय गरमाने की कोशिशें जरूर की जाती हैं ताकि अपने पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके। कुछ विपक्षी नेता संवेदनशील मसलों पर प्रधानमंत्री की खामोशी को मुद्दा बनाने की चेष्टा करते रहे हैं। इस बीच दिल्ली और बिहार में भाजपा की हार को विरोधियों ने नरेन्द्र मोदी की घटती लोकप्रियता का नतीजा करार दे डाला। हालांकि असम में भाजपा की शानदार कामयाबी ने उन्हें बता दिया कि मोदी के प्रति लोगों का भरोसा अब भी बरकरार है। उनकी लोकप्रियता जस की तस है।
1984 के बाद 2010 तक किसी भी दल या नेता को अपने दम पर सरकार बनाने का सौभाग्य हासिल नहीं हुआ। 1989, 1991, 1996, 98, 99 और 2004 में हुए आम चुनाव में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। गठबंधन की सरकारें ही बनती और चलती रहीं और आंतरिक बाह्य दबाव के चलते वह सभी सरकारें बिना किसी भय के फैसले लेने में उतनी सक्षम नहीं थी, जितनी मोदी सरकार है। कहने को यह भी गठबंधन सरकार है परन्तु मजबूरी की नहीं है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने दम पर 282 सीटें हासिल हुई है।
इसके बावजूद नरेन्द्र मोदी अपने गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर चले। उन्हें सरकार का हिस्सा बनाया। यही वजह है कि पंजाब के बाद अब जम्मू-कश्मीर, महाराष्टï्र और असम में भाजपा गठबंधन की सरकारें बनाने और चलाने में सफल रही है। उन राज्यों में भाजपा को अब आसानी से सहयोगी मिल रहे हैं, जहां उसका वैसा जनाधार नहीं रहा है। चाहे केरल हो, पश्चिम बंगाल या फिर तमिलनाडु, इन राज्यों में भी भाजपा का जनाधार बढ़ रहा है, जो कांग्रेस और दूसरे दलों के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है।
विगत दो वर्ष में बतौर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश-विदेश में जो सम्मान अजिर्त किया है, वह बेजोड़ है। अमेरिका हो, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया या जापान, हर जगह उनके भाषण सुनने के लिए भारतीय और विदेशी बड़ी संख्या में न केवल पहुंचे बल्कि उनके विजन और सीधे संवाद स्थापित करने की पहल की मुक्तकंठ की सराहना भी की। उनके विरोधी भले ही विदेश यात्राओं पर सवाल खड़े करें वस्तुस्थिति यह है कि इससे भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है।
सुरक्षा परिषद में दावेदारी पुख्ता हुई है। बहुत से देश पूंजी निवेश के लिए आगे आए हैं। विदेशी निवेश में करीब चालीस प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है। मोदी को ब्रिटिश संसद हाउस ऑफ कामंस को संबोधित करने का सम्मान मिल चुका है। जून के शुरू में वह अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र को भी संबोधित करने जा रहे हैं। उन्होंने भारत की विदेश नीति को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। ऐसे कई पड़ोसी हैं, जहां भारतीय प्रधानमंत्री दशकों से नहीं गए।

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