किसानों की स्थिति में सुधार के प्रयास बढ़ाने की जरूरत

 मानवेंद्र कुमार
देश में लगातार किसानों की संख्या में कमी आ रही है। इसकी वजह खेती से आमदनी कम होना है। कृषि से आजीविका कमाने वाले किसानों की संख्या 1991 में ग्यारह करोड़ थी जो 2001 में 10.3 करोड़ रह गई और 2011 आते आते यह आंकड़ा 9.58 करोड़ पर सिमट गया। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो साफ पता चलता है कि रोजाना करीब दो हजार किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। केंद्र सरकार ने कई तरह की योजनाओं की घोषणा की है लेकिन अभी इसका प्रभाव इतनी जल्दी नहीं दिखेगा। आज जिस प्रकार से मॉनसून में बदलाव हो रहा है इससे सीधा प्रभावित किसान वर्ग ही हो रहा है। आज भी देश में कृषि मॉनसून का जुआ है। जहां कृषि पूरी तरह मॉनसून पर निर्भर है वहीं कृषि का सबसे ज्यादा नुकसान तब होता है जब उसके द्वारा किए गए उत्पादन का सही दाम हासिल नहीं हो पाता है।
सरकार ने घोषणा की है कि किसानों के लिए नई मंडिया बनाई जाएंगी। ई मंडिया भी बनाई जा रही हैं। लेकिन यहां ध्यान रखना होगा कि इस मंडी से किसानों को कितना लाभ होगा क्योंकि यहां भी बिचौलिए अपना काम कर लेंगे और किसान को फिर भी कीमत नहीं मिल पाएगी। किसानों की हालत देखने के बाद सबसे पहली जरूरत इस तरह की नीतियां बनाने की है जिनसे खेती से होने वाली आमदनी में इजाफा हो। इसके लिए फसलों की कीमत तय करने, उनका विपणन करने और खाद्यान्न खरीद के मामले में नयी नीतियां तैयार की जा रही हैं ताकि कृषि को बाजार के अनुसार बनाया जा सके। सबसे अहम है कि विपणन नीति को सुधारा जाए, अभी तक कृषि उत्पाद में बिचौलिए की भूमिका अहम है जिसको किसी भी प्रकार से खत्म करने या कम करने की आवश्यकता है। बिचौलिए कम होंगे तभी किसानों को अपनी फसल की पहले से ज्यादा कीमत हासिल होगी। इससे उपभोक्ता को भी किफायती दामों पर उत्पाद हासिल होंगे।
अभी जिस प्रकार से मॉनसून बेरुखी अपनाए हुए है इससे फिर से खाद्य फसलों की कीमतों में इजाफा होना तय है। ऐसे में कृषि विपणन को सुधार कर कीमतों को सरकार कुछ हद तक नियंत्रित कर सकती है। आज विपणन के लिए बुनियादी ढांचा विकास करने की आवश्यकता है। कई मंडियों में तो फसल रखने के लिए उचित प्रकार के फर्श भी मयस्सर नहीं हैं जिससे फसल उत्पाद नष्ट होते हैं। उत्पाद को सुखाने व अलग ग्रेड में रखने के लिए सुविधा तो है ही नहीं। आज के आधुनिक युग में कई तरह के तोल के साधन बाजार में उपलब्ध हैं लेकिन मंडियों में इसकी आज भी कमी दिखाई देती है। देश के कई प्रदेशों में तो उत्पादन काफी होता है लेकिन वहां उन्हें विपणन केंद्र नहीं मिल पाता है जिसकी वजह से उन्हें औने-पौने दाम पर उत्पाद को बेचना पड़ता है।
अब ऐसी मांग उठ रही है कि सरकार भी अपनी जरूरत के मुताबिक अनाज ही बाजार मूल्य पर खरीदे। सरकार हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। इसी न्यूनतम समर्थन मूल्य को आधार मूल्य बनाकर खरीदारी की जाती है। आज अनाज की मांग और आपूर्ति में तालमेल बनाने की आवश्यकता है यह तभी संभव है जब सरकार जरूरत से ज्यादा अनाज का भंडारण नहीं करे। ऐसे में कृषि उत्पादन भी बाजार मांग के मुताबिक होगा और कीमत भी उसी तरह से तय होगी। कृषि उत्पादन, विपणन और कीमतों में गड़बड़ी का कारण गेहूं और चावल की खरीद सीमा का तय नहीं होना है। इससे कुछ फसलें ज्यादा उगायी जा रही हैं जबकि उनका उत्पादन पहले ही मांग से ज्यादा है। सरकार को भी इन उत्पादों को सरकारी गोदामों में एक सीमितता में रखना चाहिए। दरअसल होता यह है कि सरकारी गोदामों में अनाज पहुंच जाता है और बाजार में इसकी कमी रहती है जिससे कीमतों में बढ़ोत्तरी हो जाती है।
निजी क्षेत्र की खाद्यान्न प्रबंधन में कोई हिस्सेदारी नहीं है जिससे काफी नुकसान हो रहा है। आज इनकी भी भागीदारी सुनिश्चित करनी की आवश्यकता है। बहरहाल अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी एजेंसियां जरूरत भर ही अनाज खरीदें ताकि अधिक गोदाम नहीं बनाने पड़ें। कृषि विपणन नीति में आमूल चूल सुधार किया जाए ताकि किसान सीधे उपभोक्ताओँ के करीब पहुंच सकें, बिचौलिए की भूमिका कम हो और दोनों पक्षों को बेहतर प्रतिफल मिले। सरकार ने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं तय है आने वाले दिनों में किसानों की आमदनी बढ़ेगी और इनकी स्थिति में सुधार होगा।

अभी जिस प्रकार से मॉनसून बेरुखी अपनाए हुए है इससे फिर से खाद्य फसलों की कीमतों में इजाफा होना तय है। ऐसे में कृषि विपणन को सुधार कर कीमतों को सरकार कुछ हद तक नियंत्रित कर सकती है।

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