किसानों की समस्याएं

आखिर विशेषज्ञ समिति की क्या जरूरत है। किसानों की समस्याओं और उनकी दयनीय स्थिति से क्या सरकार अनजान है। यदि सरकार सच में किसानों की समस्याओं से अनजान है तो निश्चित ही यह बहुत ही शर्मनाक है। देश का अन्नदाता खुदकुशी कर रहा है और सरकार विशेषज्ञ समिति गठित करने को कह रही है।

sanjay sharma editor5किसान देश की रीढ़ हैं। देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। पिछले दिनों कई किसानों की आत्महत्याएं अखबारों की सुर्खियां बनीं लेकिन इन सुखिर्यों का सरकार पर कोई असर नहीं हुआ। बेबश और लाचार किसान घास की रोटी खाने को मजबूर हुए और सरकार सियासत करने में लगी रही लेकिन यह अच्छी बात हुई कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएं अदालती संज्ञान का विषय बनी। इस मसले पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा था। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने हलफनामा दायर कर कहा है कि सरकार विशेषज्ञों की समिति गठित करेगी, जो आठ साल पहले किसानों के लिए बनी राष्टï्रीय नीति पर गौर करेगी। यूं तो यह आश्वासन भला मालूम पड़ता है, पर इससे शायद ही कुछ हासिल हो।
यहां सवाल उठता है कि आखिर विशेषज्ञ समिति की क्या जरूरत है। किसानों की समस्याओं और उनकी दयनीय स्थिति से क्या सरकार अनजान है। यदि सरकार सच में किसानों की समस्याओं से अनजान है तो निश्चित ही यह बहुत ही शर्मनाक है। देश का अन्नदाता खुदकुशी कर रहा है और सरकार विशेषज्ञ समिति गठित करने को कह रही है। सरकार ने आठ साल पुरानी जिस नीति पर नए सिरे से गौर करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की बात कही है, वह नीति विख्यात कृषि विशेषज्ञ एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले आयोग की सिफारिशों के बाद बनी थी। आयोग ने बहुत विस्तृत रिपोर्ट दी थी। वह रिपोर्ट किसानों की समस्याओं को ध्यान में रखकर बनायी गयी थी। यदि आयोग की सिफारिशें सैद्धांतिक व व्यावहारिक रूप से स्वीकार की गई होती तो आज यह दिन न देखना पड़ता। देश के किसानों की दुर्दशा पर उच्चतम न्यायालय को सरकार से जवाब तलब करने की जरूरत नहीं महसूस होती। किसानों की खुदकुशी आज नई बात नहीं है। यूपीए के शासनकाल में भी किसानों ने खुदकुशी की थी। मौसम की मार और सरकार की उपेक्षा के चलते किसान खून के आंसू रो रहे हैं। मुआवजे के नाम पर किसानों के साथ भद्ïदा मजाक किया जा रहा है तो जरूरत के समय उनकी मदद नहीं की जा रही है। केंद्र सरकार किसानों से किए अपने वादे को क्यों नहीं पूरा करती? भाजपा ने लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में कहा था कि अगर वह सत्ता में आई तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक यह सुनिश्चित करेगी कि किसानों को उनकी उपज की लागत से डेढ़ गुना ज्यादा दाम मिलेें। पर सत्ता में आते ही अपने इस आश्वासन को भाजपा भूल गई। अब तो केन्द्र सरकार राहत फंड देने में भी सियासत कर रही है।

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