कार्य प्रणाली हाईटेक पर भाषा है पुरानी नये दारोगा और सिपाही को भी होती हैं दिक्कतें

थानों में मुगल व फारसी शब्दों का होता है प्रयोग समझने में होती है परेशानी

गणेश जी वर्मा
लखनऊ। थानों और कोतवालियों में आज भी वही पुरानी भाषाओं का प्रयोग किया जाता है, जिसे समझना आम आदमी के बस की बात नहीं है। आम आदमी तो छोड़ दीजिए यहां तक कि नये दारोगा और सिपाही भी उन भाषाओं का अर्थ तक नहीं जानते हैं। अपनी तहरीर पर रिपोर्ट लिखवाने गये फरियादी भी उन भाषाओं का अर्थ नहीं समझ पाते हैं। कुल मिलाकर यदि यह कहें कि आज भी थानों और कोतवालियों में मुगल और फारसी भाषाओं का बोलबाला है तो गलत नहीं होगा। ऐसे में सवाल तो यह भी उठ रहा है कि हिन्दी की बात करने वाले राजनेताओं का ध्यान क्या इन शब्दों पर नहीं जाता, जबकि हकीकत यही है कि इन नेताओं का अधिकतर पाला इन शब्दों से पड़ता है।

जूनियर कर्मचारी नहीं दर्ज कर पाते मुकदमा
इन शब्दों का प्रयोग इतना कठिन है कि जूनियर कर्मचारी मुकदमा नहीं दर्ज कर पाते। जहां कई बार पीडि़त व्यक्ति थानों पर बैठकर वरिष्ठ कर्मचारी का इंतजार करता रहते हैं। इतना ही नहीं नये बैच के भर्ती हुए सिपाही और दारोगाओं को भी इन शब्दों का अर्थ ठीक से समझ में नहीं आ पाता है।

इन शब्दों में आया बदलाव
पुलिस विभाग में प्रयोग किए जाने वाले कुछ शब्द वल्द, मजरुब, कायमी और मजमून जैसे शब्दों में बदलाव किया गया है। इनके स्थान पर पुलिस की डायरी में पिता का नाम, घायल अंकित और विवरण दर्ज किया गया है। इन शब्दों का प्रयोग प्रारम्भ हो गया है।

न्यायालय में भी फारसी शब्द
न्यायालय में भी इन फारसी शब्दों का प्रयोग होता है जिसके कारण आम व्यक्ति के कुछ समझ में नहीं आता है। अशिक्षित लोग तो सीधे तौर पर अधिवक्ता को अपना भगवान मानकर उसे अपनी फाइल सौंप देते हैं।

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