कांग्रेस के लिए संजीवनी बन सकता है नेशनल हेराल्ड

हेराल्ड मामले में अदालती फैसले का प्रभाव क्या होगा यह तो भविष्य बताएगा लेकिन जहां तक राजनीतिक प्रभाव की बात है तो यकीनन कांग्रेस इस मामले से अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने में सफल रही। देखा जाए तो मामला सामान्य-सा था। अदालती समन पर कांग्रेस नेताओं को अदालत में पेश होना था लेकिन इसका राजनीतिक लाभ लेने के लिए पहले इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई का स्वरूप प्रदान किया गया।

 नीरज कुमार दुबे
नेशनल हेराल्ड मामले को राजनीतिक नहीं अदालती मामला बताने के प्रयास सभी ने किये लेकिन साथ ही इस पर जमकर राजनीति भी की। कांग्रेस ने जहां इस मुद्दे का इस्तेमाल खुद को राजनीतिक रूप से मजबूत करने में बखूभी किया वहीं भाजपा इस मामले में बैकफुट पर नजर आई और उसके लगभग सभी प्रवक्ता जनता के बीच यह संदेश देने में विफल रहे कि इससे पार्टी का कोई लेना देना नहीं है। सुब्रमण्यम स्वामी ने हालांकि कहा कि इस मामले से भाजपा को कोई वास्ता नहीं है और उनकी इस मुद्दे पर कभी प्रधानमंत्री से चर्चा नहीं हुई लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू का यह कथित बयान पार्टी को उलझा गया जिसमें उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस को याद करना चाहिए कि उसके कार्यकाल में क्या हुआ था। उस समय नरेंद्र मोदी को पूछताछ के लिए पेश होना पड़ा था, अमित शाह को जेल जाना पड़ा था।’
हेराल्ड मामले में अदालती फैसले का प्रभाव क्या होगा यह तो भविष्य बताएगा लेकिन जहां तक राजनीतिक प्रभाव की बात है तो यकीनन कांग्रेस इस मामले से अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने में सफल रही। देखा जाए तो मामला सामान्य-सा था। अदालती समन पर कांग्रेस नेताओं को अदालत में पेश होना था लेकिन इसका राजनीतिक लाभ लेने के लिए पहले इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई का स्वरूप प्रदान किया गया। इस मुद्दे पर संसद के कामकाज को ठप रखा गया। खबरें आईं कि सोनिया-राहुल की पेशी के दौरान कांग्रेस मुख्यमंत्रियों के मार्च करने की योजना बन रही है और कार्यकर्ता सडक़ों पर उतरेंगे लेकिन सोनिया गांधी ने ऐसा करने से पार्टी को मना किया और संदेश दिया कि पार्टी अदालत का सम्मान करती है। पेशी के दिन देश भर में जिस तरह से कांग्रेस कार्यकर्ता केंद्र सरकार के विरोध में सडक़ों पर उतरे, प्रधानमंत्री के पुतले फूंके गये, कई जगह कार्यकर्ताओं ने अपने खून से लिख कर पार्टी आलाकमान के प्रति समर्थन जताया, कांग्रेस मुख्यालय में देश के कई कोनों से आए कार्यकर्ताओं ने जीने मरने की कसमें खाईं उससे पार्टी एकाएक खड़ी होती नजर आई।
कांग्रेस के नेताओं में भी जिस तरह पिछले दिनों जिस तरह का खिंचाव देखने को मिल रहा था, हेराल्ड मामले में वह भी दूर होता दिखा और पूरी पार्टी एकजुटता के साथ गांधी परिवार के साथ खड़ी नजर आई। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित सभी वरिष्ठ नेता गांधी परिवार के साथ अदालत कक्ष में मौजूद थे। मनमोहन सिंह ने बाद में मीडिया से कहा भी कि पूरी पार्टी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ है।
जमानत मिलने के बाद जिस तरह कांग्रेस आलाकमान ने प्रधानमंत्री पर सीधा हमला बोला और कहा कि नरेंद्र मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना पूरा नहीं होगा, से साफ हो चला है कि भले संसद का सत्र समाप्त होने की कगार पर हो पर राजनीतिक टकराव के दृश्य अब शायद संसद के बाहर आम होंगे। कांग्रेस खुद को मिली इस संजीवनी का भरपूर उपयोग करना चाहेगी हालांकि पार्टी को इंदिरा गांधी के जेल जाने के समय से इस मामले की तुलना नहीं करनी चाहिए क्योंकि तब की अपेक्षा इस समय केंद्र में एक मजबूत सरकार है और यह कोई गठबंधन सरकार नहीं बल्कि एक दल की सरकार है। गठबंधन सरकार होती तो संभवत: सहयोगी माहौल बदलता देख रुख पलट सकते थे।
बहरहाल, भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी याचिका के जरिये कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को अदालत आने को जिस तरह से मजबूर कर दिया उससे भारतीय संविधान में आम नागरिक को मिले अधिकार की ताकत का अहसास हुआ साथ ही भारतीय लोकतंत्र में स्वतंत्र न्यायपालिका की ताकत का भी अहसास हुआ जिसके लिए कानून की नजर में हर छोटा-बड़ा व्यक्ति बराबर है। राजनीतिक रूप से एक तसवीर यह भी साफ तौर पर उभर कर आई कि राहुल गांधी कांग्रेस का नेतृत्व करने की स्थिति में आ रहे हैं और जो लोग उनको 2024 के चुनावों की तैयारी करने का सुझाव दे रहे थे, उनको धता बताते हुए राहुल 2016, 2017 और 2019 की तैयारी में लग गये हैं।

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