कांग्रेसियों को एक सूत्र से जोड़े रखने में नाकाम साबित हो रहे पीके

  • बेनी प्रसाद वर्मा ने सपा का दामन थाम कर कांग्रेस को दिया बड़ा झटका
  • यूपी में जातीय आधार पर वोट हासिल करने की रणनीति पर असर

Captureप्रभात तिवारी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी समीकरणों में तेजी से फेरबदल होने लगा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यूपी का दौरा करके और यहां की छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन की मुहिम छेडक़र सपा और बसपा की मुश्किलें बढा दी हैं। कांग्रेस और प्रशांत किशोर दोनों अच्छी तरह जान चुके हैं कि यूपी में बिना गठबंधन के सरकार बना पाना मुश्किल है। इसलिए कांग्रेस में अनुभवी नेताओं और युवाओं की टीम के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिशें की जा रही हैं लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी बहुत से लोग नाखुश हैं। इनमें सबसे चर्चित बेनी प्रसाद वर्मा रहे हैं, जिन्होंने कई साल बाद सपा में वापसी की है। उन्होंने कांग्रेसियों पर एक अनुभवी नेता होने के बावजूद उपेक्षित करने का आरोप लगाया है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी मुख्यालय पर पार्टी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने तीन दिन तक लगातार ब्लाक अध्यक्षों और अलग-अलग मण्डल के नेताओं के साथ चुनावी समीकरणों पर गहन मंथन किया। इससे पहले भी लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, गोरखपुर और अलीगढ़ समेत कई जिलों का दौरा कर पार्टी नेताओं और जनता का फीडबैक हासिल करने का काम कर चुके हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि पार्टी की हालिया स्थिति के अनुसार कांग्रेस को आगामी विधानसभा चुनाव में महज 20-25 सीटों पर जीत मिल पायेगी। पार्टी को विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए किसी न किसी पार्टी से गठबंधन करना पड़ेगा। इसके साथ ही पार्टी में अपनी उपेक्षा से नाराज नेताओं और भितरघात की राजनीति करने वाले नेताओं को पहचानना और उसको खुश करने के साथ ही एक सूत्र में जोड़े रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए प्रशांत किशोर की तरफ से तमाम कोशिशें भी की जा रही हैं। इन सबके बावजूद दर्जनों नेता नाराज चल रहे हैं, इन नेताओं का आरोप है कि पार्टी में वर्षों से जुड़े रहने के बावजूद कभी भी कोई महत्वपूर्ण पद और चुनाव लडऩे का मौका नहीं दिया गया। हर बार पार्टी में मठाधीशों को मौका दिया जाता है। इसी वजह से उत्तर प्रदेश में पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जिसे बचाने की कोशिश में जुटीं कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी का कोई भी दाव सफल होता नहीं दिख रहा है।

बेनी के सहारे कुर्मी नेताओं को जोड़ेगी सपा
उत्तर प्रदेश के चुनावों में हमेशा से जातिगत समीकरण हावी रही है। सभी पार्टियों के अपने-अपने वोट बैंक है। इस बार वोट बैंक में सेंधमारी के लिए राजनैतिक दल अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं। आगामी विधासभा चुनाव में भी जातीय समीकरण बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। समाजवादी पार्टी ने जातीय समीकरणों की वजह से कुर्मी वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए बेनी प्रसाद वर्मा को अपनी पार्टी में मिला लिया। अब समाजवादी पार्टी बेनी प्रसाद वर्मा के माध्यम से प्रदेश के सभी जिलों में कुर्मी जाति के नेताओं को अपने साथ जोडऩे और उनका वोट बैंक हासिल करने में जुट गई है। सपा ने यह फैसला जदयू और कांग्रेस पार्टी के नेताओं के बीच बढ़ रही नजदीकियों और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यूपी के चुनाव में सक्रियता को देखकर लिया है। ऐसे में कांग्रेस के सामने बेनी के संपर्क में रहने वाले नेताओं को पार्टी से जोड़े रखने का काम और भी मुश्किल हो जायेगा। इस समस्या से निपटने का प्रशांत किशोर को भी कोई न कोई ठोस हर निकालना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में कांग्रेस में अंदरखाने चल रही फूट का मामला सबके सामने आ जायेगा। जो पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित होगा।

बेनी प्रसाद वर्मा के समाजवादी पार्टी में शामिल होने को कांग्रेस पार्टी ने सामान्य घटना बताया है।

पार्टी प्रवक्ता सत्यदेव त्रिपाठी के मुताबिक हालिया स्थिति में राजनीति पूरी तरह से व्यवसायिकता का पर्याय बनती जा रही है। पार्टियों में सिद्धान्त व विचार वाले लोग कम ही रह गये हैं। जहां तक बेनी प्रसाद वर्मा की बात है, तो वह पूरी तरह से अवसरवादी हैं। उन्होंने सपा मुखिया मुलायम सिंह के खिलाफ घटिया भाषा और गालियों तक का प्रयोग करके सुर्खियां बटोर चुके हैं। इन सबके बावजूद राज्यसभा सीट पाने के लिए मुलायम सिंह का हाथ थामने का कृत्य अवसरवादिता पर मुहर लगाने के लिए काफी है। इससे पहले भी वह समय-समय पर अपने लाभ के लिए कई राजनीतिक पार्टियों का दामन थाम चुके हैं। इसलिए उनके जाने से पार्टी के वोट बैक पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

Pin It