कहीं आपके बच्चे की जान खतरे में तो नहीं

बच्चों को समय से स्कूल पहुंचाने के लिए ड्राइवर तेज रफ्तार में चलाते हैं वाहन

  • स्कूल प्रशासन को नहीं है सरोकार, सुबह खाली सडक़ों पर ड्राइवर करते हैं मनमानी
  • चिंतित रहते हैं अभिभावक, मानक से ज्यादा बच्चों को बैठाते हैं बसों व अन्य वाहनों में

Captureप्रीति सिंह
लखनऊ। अपने बच्चों की आंख में आंसू देख आप विचलित हो जाते हैं। बच्चे की एक खरोच देख बेचैनी बढ़ जाती है, तो क्या कभी आपने यह सोचने की जरूरत समझी है कि सुबह-सुबह स्कूल छोडऩे के लिए जिस स्कूल वैन या बस में अपने लाडले या लाडली को बिठा कर आए हैं वह आपके जाने के बाद सुरक्षित है या नहीं। बस व वैन की बेलगाम रफ्तार कहीं बच्चों की जान जोखिम में तो नहीं डाल रही है। जी हां! सुबह-सुबह सडक़ों पर स्कूल वाहनों की रफ्तार देखकर तो ऐसा ही लगता है। न बच्चों की जान की फिक्र न ही यातायात के नियमों की चिंता। स्कूल वाहन चालकों का एक लक्ष्य किसी भी कीमत पर समय से स्कूल पहुंचाना है।

राजधानी में अधिकतर स्कूलों का समय सुबह साढ़े सात बजे से शुरू होता है। प्राइवेट स्कूलों के ज्यादातर बच्चे स्कूल वैन व बस से आते-जाते हैं। समय से बच्चों को स्कूल पहुंचाना अभिभावकों के साथ बस व वैन चालकों के लिए भी प्राथमिकता रहती है। जो अभिभावक अपने बच्चों को खुद छोडऩे जाते हैं उन्हें अपने बच्चों की चिंता रहती है इसलिए स्पीड पर ध्यान रखते हैं लेकिन वैन व बस चालकों को इससे कोई लेना-देना नहीं होता। यह यातायात नियमों को दरकिनार करते हुए फर्राटा भरते हैं। रफ्तार पर नियंत्रण नहीं रहता। सारे नियम-कानून ताक पर रख गाड़ी चलाते हैं। चालकों का एक मात्र उद्देश्य रहता है कि बच्चे समय से स्कूल के गेट पर पहुंच जाएं। जबकि सुप्रीम कोर्ट का मानक है कि स्कूल वैन व बस की रफ्तार 40 से ज्यादा नहीं होनी चाहिए लेकिन राजधानी के स्कूल ड्राइवर सुबह के समय इस नियम का पालन नहीं करते। ऐसा नहीं है कि अभिभावकों को इसकी जानकारी नहीं है। अभिभावक, ड्राइवर व स्कूल प्रशासन से शिकायत करते हैं पर उनकी सुनवाई नहीं होती। उन्हें सीधा जवाब दे दिया जाता है कि अगर ऐसा है तो अपने बच्चों को खुद ही स्कूल ले आया कीजिये। अभिभावक मजबूरी बस आंख बंद कर लेते हैं। वहीं ड्राइवरों का अपना तर्क है। उनका कहना है कि सुबह कई जगह से बच्चों को लेना रहता है। इस कॉलोनी से उस कॉलोनी जाओ, समय लगता है। धीरे-धीरे बस या वैन चलाएंगे तो समय से स्कूल कैसे पहुंचेंगे। समय से नहीं पहुंचते तो अभिभावक ही हम लोगों को 50 बात सुनाने लगाते हैं। कभी-कभी तो हम लोगों को ही बच्चों का इंतजार करना पड़ता है। यह भी देर होने का एक बड़ा कारण है। स्कूल वाले अलग से हमारी क्लास लगाने लगते हैं। तेज गाड़ी चलाना हमारी मजबूरी है। यहां सवाल यह उठता है कि क्या मजबूरी में बच्चों की जान जोखिम में डाली जाएगी। क्या स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है कि इस दिशा में ध्यान दे। क्या जब कोई बड़ी दुर्घटना घट जाएगी तब शासन-प्रशासन के साथ स्कूल प्रशासन इस दिशा में ध्यान देगा?

यह तो हो गई बस व वैन की स्पीड की बात। इसके अलावा भी बहुत सारी समस्याएं हैं। सुप्रीम कोर्ट का जो मानक है उसका पालन नहीं किया जाता। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी प्रशासन को नहीं है, पर इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं होती। बच्चों की सुरक्षा के साथ भयानक खिलवाड़ किया जा रहा है। बच्चों का भविष्य संवारने के चक्कर में उनकी जिदंगी दांव पर लगायी जा रही है। इस दिशा में न अभिभावक सचेत हो रहे हैं और न ही शासन-प्रशासन।

स्कूल बसों व वैन के लिये सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश
1. स्कूल वाहन की स्पीड 40 से अधिक नहीं होनी चाहिए।
2. अगर 12 साल से कम उम्र के बच्चे हैं तो वैन में जितनी सीटें है उसके डेढ़ गुना अनुपात में बच्चों को बिठाया जा सकता है और 12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को जितनी सीट है उसके हिसाब से बिठाया जाए।
3. प्राथमिक उपचार की व्यवस्था होनी चाहिए।
4. बसों के पीछे और आगे की तरफ स्कूल बस लिखना अनिवार्य है।
5. बसों में अग्निशमन यंत्र होना चाहिए।
6. बस ड्राइवर के पास बच्चों से सम्बंधित एक लिस्ट होनी चाहिए।
7. बस ड्राइवर व अटन्डेंट पढ़े-लिखे होने चाहिए।
8.ड्राइवर के पास लाइसेंस होना चाहिए।
9. बसों की खिडक़ी पर आड़े-तिरछे ग्रिल लगे होने चाहिए।
10. ड्राइवर को यूनिफार्म में होना चाहिये।
11. स्कूल वैन व बस पीले रंग से पेंट होना चाहिए।
12.बच्चों का बैग रखने के लिए सीट के नीचे जगह होनी चाहिए।

चलाया जायेगा अभियान: एएसपी यातायात

इस संदर्भ में एएसपी यातायात बृजेश कुमार मिश्र ने कहा कि सुबह के समय जल्दी जाने के चक्कर में स्कूली वैन और बस के चालक अधिक स्पीड में वाहन चलाते हैं। ऐसे वाहनों को पकडऩे के बाद चालान किया जाता है। श्री मिश्र ने कहा कि अभी तक इन वाहनों पर नकेल कसने के लिये कोई अभियान नहीं चलाया गया और न ही कोई योजना बनाई गई। इनके खिलाफ अभियान चलाया जायेगा और योजना भी बनाई जायेगी। इतना ही नहीं सुबह के समय आकस्मिक चेकिंग भी की जाएगा। इस अव्यवस्था को रोकने के लिये भरसक प्रयास किये जायेंगे

बोले अभिभावक

मेरा बेटा वैन से जाता है। पति-पत्नी दोनों वर्किंग हैं। मजबूरी है वैन से भेजना। हम लोग ड्राइवर को हमेशा गाड़ी धीरे चलाने को बोलते हैं। अब कहां तक निगरानी करेंगे। शासन-प्रसासन को भी अपनी जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए।
-प्रगति चतुर्वेदी

सुबह तो सडक़ों पर स्कूल वैन व बस की स्पीड देख कर डर लगता है। ड्राइवर को सोचना चाहिए कि कहीं लापरवाही हुई तो इसका हश्र कितना भयानक होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। दुर्घटना से तो देर ही सही है। बच्चे स्कूल लेट हो जाएंगे तो क्या हुआ। स्कूल को इस दिशा में सोचना चाहिए।
-सरिता श्रीवास्तव

स्कूल के लिए बच्चों की पढ़ाई जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही सुरक्षा भी होनी चाहिए। समय से स्कूल पहुंचाने के लिए बच्चों की जान जोखिम में डाली जाती है। स्कूल वाहन चालकों की निगरानी होनी चाहिए कि वो बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रख रहे हैं या नहीं।
-अभिषेक रंजन द्विवेदी

पहले हुई इस तरह की दुर्घटनाओं से भी शासन-प्रशासन व स्कूल सबक नहीं लेते। स्कूल वाहन के ड्राइवर अपनी नौकरी बचाने के लिए बच्चों की नहीं सोचते, लेकिन इस दिशा में जिम्मेदारों को सोचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के नियम का पालन होना चाहिए। तभी इस दिशा में कुछ सुधार हो सकता है।
-अरविंद त्रिपाठी

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