कश्मीर लक्षण है, रोग नहीं, रोग तो अविश्वास है

कुलदीप नैयर
पुरस्कार लौटाए जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी की चुप्पी पर मैं अचंभित हूं। लगता है संकीर्ण राजनीति में जुटे ये लोग साहित्य, विज्ञान या दूसरे क्षेत्र के पुरस्कार का मतलब नहीं समझते। ऊंचाई को मापना आसान नहीं है। पुरस्कार पाने वाले निश्चित तौर पर अपने गंतव्य पर पहुंचने की दिशा में एक मील आगे बढ़ गए हैं। उनका आरोप है कि असहिष्णुता का माहौल बना हुआ है। मोदी झटपट बोलने के आदी हैं, लेकिन इस मसले पर उनकी चुप्पी साफ दिख रही है।
असहिष्णुता का आरोप किसी व्यक्ति विशेष ने नहीं लगाया है। देश भर के कोई 500 प्रमुख विद्वानों, वैज्ञानिकों एवं कलाकारों ने अपना पुरस्कार लौटाया है। उन लोगों ने एक दूसरे से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया है, लेकिन असहिष्णुता के माहौल में समान तरीके से घुटन महसूस की। जब उन सबों ने महसूस किया कि वे खुल कर खुद को अभिव्यक्त नहीं कर सकते, तो मोदी सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए आखिर ऐसी सोच क्यों उपजी।
इसके कई कारण हो सकते हैं। एक कारण केंद्र सरकार के मामलों में अतिवादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बढ़ता दखल है। असहिष्णुता महसूस किए जाने को ‘विनिर्मित प्रतिक्रिया’ करार देना, जैसा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली कहा है, वास्तविकता से आंखें बंद करना है। अब तक भाजपा को एहसास हो जाना चाहिए था कि उसके द्वारा हिंदुओं एवं मुसलमानों के बीच धार्मिक अंतर पर जोर दिए जाने से संकीर्णता एवं असहिष्णुता को बढ़ावा मिला है और दोनों समुदाय को एक दूसरे से दूर किया है।
पुरस्कार लौटाने वाले एक लेखक ने अकादमी को लिखे अपने पत्र में कहा है कि असहमति की आवाज, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुंद करने की मौजूदा प्रवृति ने उन्हें ऐसा कदम उठाने को बाध्य किया है। उन्होंने अपने लेखन के कारण मारे गए नरेंद्र डाभोलकर, गोविंद पनसारे एवं एमएम कुलबर्गी जैसे बुद्धिजीवियों का उदाहरण पेश किया है।
मुझे विश्वास है कि पुरस्कृत लोग अपना विरोध प्रदर्शित करने के लिए 26 जनवरी को दिल्ली की सडक़ों पर मार्च करेंगे। सहिष्णु राष्ट्र के साथ क्या हो गया, यह मेरी समझ से परे है। इसने अंग्रेजों के खिलाफ भीषण लड़ाई लड़ी थी। आजादी की लड़ाई में, हिंदु और मुसलमान, दोनों ही शामिल थे। उनमें मुस्लिम समुदाय के मौलाना अबुल कलाम आजाद एवं सीमांत गांधी खान, अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेता शामिल थे। उस वक्त भारतीय जनता पार्टी का जन्म भी नहीं हुआ था। जिन लोगों का आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था, उनका सत्ता में आना दुखद है।
आज जो कुछ भी हो रहा है, वह और भी खराब है। सांप्रदायिक गोलबंदी, नफरत, अपराध, असुरक्षा और हिंसा का माहौल घना हो रहा है। संवैधानिक पदों पर बैठ कर लोग नफरत के अभियान को बढ़ावा या संरक्षण दे रहे हैं। कोई भी देख सकता है कि सरकार स्वतंत्र तरीके से काम नहीं कर रही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रभारी है। स्थिति इस हद तक पहुंच चुकी है कि सरकार की आकाशवाणी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के विचारों को प्रसारित किया। उन्होंने आपत्तिजनक कोई बात नहीं कही। लेकिन देश इस बात को जानता है कि हिंदुत्व को लेकर उनका कितना कट्टर विचार है। साफ है कि हिंदुओं के अतिवादी खेमे ने सरकार पर कब्जा पर लिया है। उसने मान लिया है कि वह जो कहती या करती है, वही लोगों की इच्छा है। जज और मुद्दई मिलकर एक हो गए हैं।
हिंदुओं के बीच के उदारवादियों को छोड़ दें, जमात-ए-इस्लामी भी उदारवादी नहीं बनना चाहेगा। क्योंकि, उसे आकाशवाणी से अपनी बात प्रसारित करने की इजाजत कभी नहीं मिलेगी। अगर उसे कभी यह मौका मिलेगा, तो वह भी संघ प्रमुख भागवत जैसा ही अतिवादी होगा। इसके बावजूद हम अभी भी बहुलवाद की बात करते हैं। अगर इसके कोई मायने हैं तो अल्पसंख्यकों को समान अधिकार मिलना चाहिए। संविधान ऐसा कहता है। लेकिन यह लागू नहीं हो रहा क्योंकि जो लोग सत्ता में हैं उनका अपना संकीर्ण एजेंडा है।
देश में 80 प्रतिशत हिंदुओं के साथ हम हिंदु राष्ट्र बन सकते थे, जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लक्ष्य है। फिर भी विभाजन के साथ जन्मे भारत के हम लोगों ने धर्मनिरपेक्षता को तरजीह दी और देश के साथ धर्म को नहीं मिलाया। सही है कि पाकिस्तान इस्लामिक राष्ट्र बन गया। लेकिन यह इसके संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के समर्थन के बगैर हुआ। ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप पाकिस्तान बनने पर उन्होंने कहा था कि हम लोग या तो भारतीय हैं या पाकिस्तानी, मुस्लिम या हिंदु नहीं। लेकिन पाकिस्तान पर मौलवियों का कब्जा हो गया। लंबे समय के बाद बहुत मुश्किल से वहां की जनता थोड़ी उदारता लायी है। जबकि भारत में हम हिंदु समर्थक भावनाओं में बह गए हैं। हिंदु समर्थक भावना मोदी सरकार के बनने से बलवती हुई है। इसका मतलब धर्मनिरपेक्षता को नकारना है, जो हमारे संविधन की प्रस्तावना में लिखा हुआ है।

Pin It