कश्मीरी पंडितों की कहानी आज भी उतनी ही कारुणिक

मुखर्जी इंदिरा गांधी के वफादार पदाधिकारी थे। लेकिन वह मीडिया को कैसे दोष दे सकते हैं? उन्हें पता है कि मीडिया क्या, भारत में किसी को भी इस घोटाले की गंध तक नहीं थी। राजीव गांधी ने जानबूझकर बोफोर्स तोप चुना था ताकि वह घूस इटली में अपने ससुराल वालों की ओर सीधे भेज सकें। उनके ससुराल वाले रातों-रात अमीर बन गए यह सभी को पता है।

कुलदीप नैयर
किसी भी संस्थान के मुखिया की आलोचना नहीं की जाती है। इसके पीछे की सोच यह है कि लोकतांत्रिक शासन को टिकाए रखने के लिए जरूरी संस्थानों की आलोचनाओं से नुकसान होता है। इसलिए राष्ट्रपति को उस समय भी छोड़ दिया जाता है जब वह अपने पद की सीमा को लांघ जाते हैं। इसी वजह से प्रणव मुखर्जी निंदा से बच गए जबकि उनके बराबर के ही ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति को सलीब पर चढ़ाया जा चुका है। लेकिन यह उन्हें किसी तरह का लाइसेंस नहीं देता है। उन्हें विशेषाधिकार का लाभ नहीं उठाना चाहिए जो वह करते हैं।
उन्होंने अपनी आत्मकथा, जिसे उन्होंने जान-बूझकर उच्च पद पर रहते हुए प्रकाशित किया है, में आपातकाल का समर्थन किया है। किसी भी तरह के विश्लेषण, संवैधानिक, कानूनी और नैतिकता से उनका यह काम गलत ठहरता है। आपातकाल में एक लाख लोगों को बिना किसी सुनवाई के हिरासत में रखा गया था। प्रेस को जंजीर पहना दी गई थी और सभी मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए थे। इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी जो संविधान से बाहर की शक्ति थे, सरकार चला रहे थे।
इसके बावजूद आलोचकों ने उन्हें इस वजह से बच निकल जाने दिया कि वह जिस पद पर बैठे हैं वह सम्मान का भाव पैदा करता है। लेकिन उनका हाल का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। वह कहते हैं कि बोफोर्स तोप घोटाला मीडिया की कल्पना की उपज है। इस घोटाले की सारी जानकारी होते हुए भी प्रणव मुखर्जी ऐसा गैर-जिम्मेदाराना बयान कैसे दे सकते हैं?
यह सभी को पता है कि मुखर्जी इंदिरा गांधी के वफादार पदाधिकारी थे। लेकिन वह मीडिया को कैसे दोष दे सकते हैं? उन्हें पता है कि मीडिया क्या, भारत में किसी को भी इस घोटाले की गंध तक नहीं थी। राजीव गांधी ने जानबूझकर बोफोर्स तोप चुना था ताकि वह घूस इटली में अपने ससुराल वालों की ओर सीधे भेज सकें। उनके ससुराल वाले रातों-रात अमीर बन गए यह सभी को पता है। राजीव गांधी ने इस सीधे सौदे की बात कैबिनेट के किसी व्यक्ति के कान में भी नहीं डाली थी। किसी को कुछ अंदाजा नहीं था।
सबसे पहले स्वीडन के एक रेडियो के यह खबर दी। खबर का स्रोत सूचना देने वाला कोई गुमनाम आदमी था जिसका नाम आज तक नहीं बताया गया है। उसने यह जानकारी पत्रकार चित्रा सु्ब्रमणियम को दी जो उस समय इंडियन एक्सप्रेस के लिए काम करती थीं। सूचना देने वाला अंदर का आदमी था और घूस से डर गया। घूस पहले तो 64 करोड़ रुपया आंकी गई थी, लेकिन यह 300 करोड़ रुपया के आसपास का घोटाला निकला।
बेशक राजनीति प्रणब मुखर्जी के लिए जाना-पहचाना क्षेत्र है लेकिन उन्होंने इसे उसी समय छोड़ दिया जब वह राष्ट्रपति चुन लिए गए। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी शिकायत शायद सही हों। लेकिन यह उन दोनों का आपसी मामला है। राष्ट्र को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि एक राजनीतिक पार्टी के भीतर क्या चलता है।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिए गए भाषण में राष्ट्रपति मुखर्जी ने जो कहा शायद वह आमतौर पर सही हो। उदाहरण तौर पर उनकी टिप्पणी सही है कि सस्ती लोकप्रियता वाली राजनीति सुशासन की जगह नहीं ले सकती या सार्वजनिक जीवन में दोहरापन की प्रवृत्ति बढ़ गई है। लेकिन वह यह भूल गए कि वह सिर्फ एक संवैधानिक मुखिया हैं और उन्हें शिष्टाचार का पालन करना चाहिए जिसकी अपेक्षा इस कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से संसद और विधान सभाएं करती हैं। राष्ट्रपति पद की संस्था का रूप बिगडऩे नहीं देना चाहिए।
मेरा अनुभव है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रपति की ओर बहुत कम ध्यान देते हैं। संविधान निर्माताओं, जिन्होंने राष्ट्रपति प्रणाली सरकार की जगह संसदीय लोकतंत्र की प्राथमिकता दी, ने यह निश्चित किया है कि राष्ट्रपति क्या कर सकता है। लेकिन इतने सालों में यह बेमतलब हो गया है क्योंकि राजनीतिक पार्टियां राष्ट्रपति की इच्छाओं को किसी गंभीरता से नहीं लेतीं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के गद्दी में होने की वजह से बदलाव दिखाई देने लगा है। मुखर्जी की आपातकाल पर टिप्पणी दशकों पुरानी है और वर्तमान को लेकर उन्होंने दूर-दूर तक चर्चा नहीं की है। जब कभी वह यह करेंगे मोदी की क्या प्रतिक्रिया होती है यह देखने लायक होगा।

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