कश्मीरियों के लिए देवदूत बन कर आती रही है सेना

“कश्मीर को करीब तीन बार बर्फीले सुनामी ने हिचकोले दिए थे। सेना के बंकर, पोस्टें, इत्यादि बर्फ के नीचे दफन हो गए। पर कश्मीरियों की मदद करने का जज्बा दफन नहीं हो पाया। तभी तो अनंतनाग के वाल्टेंगुनार में सेना के जवानों ने अपनी जान पर खेल कर हजारों कश्मीरियों को बचाया था। तब कश्मीरियों ने सेना के जवानों के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया था”-‘मसीहा’

सुरेश एस डुग्गर
कन्हैया कुमार शायद खबरों के संसार से दूर हैं। तभी तो उनकी जानकारियां कुएं में रहने वाले मेंढक से अधिक नहीं हैं। अगर ऐसा न होता तो वे कश्मीर में तैनात सैनिकों के बारे में वे शब्द नहीं बोलते जो सच्चाई से कोसों दूर हैं। माना कि कश्मीर में फैले 26 सालों के आतंकवाद के इतिहास में इक्का-दुक्का बलात्कार की घटनाएं होती रही हैं पर ऐसे मामलों में लिप्त लोगों को सजाएं भी साथ-साथ में मिलती रही हैं।
अगर आम कश्मीरियों के शब्दों पर जाएं तो सेना के जवान उनके लिए देवदूत से कम नहीं हैं। रही बात आतंकवाद समर्थकों की, तो उनके लिए तो आम कश्मीरी जनता भी दुश्मन है। आखिर आम जनता दुश्मन क्यों न हो, क्योंकि आतंकवाद समर्थकों की मुखबिरी करने में अब कश्मीरी सबसे आगे हैं जिस कारण आतंकवाद को एक हद तक सुरक्षा बल खत्म करने में कामयाब रहे हैं।
कश्मीरियों के दिलों में अभी भी सितम्बर 2014 की भीषण बाढ़ के जख्म हरे हैं। अक्टूबर 2005 में आए सदी के सबसे भयंकर भूकंप के निशान उनके सीनों पर हैं। कई बार आए बर्फीले सुनामी से हुई तबाही के निशां देख-देख कर वे आज भी फूट-फूट कर रो देते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें अगर उनके लिए कोई देवदूत बन कर आया था तो वे थे भारतीय सेना के जवान।
ज्यादा दूर की बात छोडि़ए, दो दिन पहले ही खराब हुए मौसम में 73 कश्मीरियों को मौत के मुंह से बचाने कन्हैया कुमार नहीं आया था बल्कि सेना के वे जवान आए थे जिन्हें अपने सैंकड़ों साथी कश्मीर में 26 सालों से चल रहे आतंकवाद की बलि बेदी पर कुर्बान कर देने पड़े हैं। यह सच है कि कश्मीर में सैनिकों की कुर्बानियों का आंकड़ा सेना के लिए भी चिंता का कारण है। पर इसके बावजूद सेना ने कश्मीरियों की मदद से अपने हाथ पीछे नहीं खींचे।

वर्ष 2014 के सितम्बर महीने में जब कश्मीर में सदी की भीषणतम बाढ़ आई तो सेना की बादामी बाग छावनी भी पूरी तरह से पानी में डूब गई। उनके हथियार और गोला-बारूद भी पानी में चला गया। ऐसे हालात के बावजूद सेना के जवानों ने दिन-रात जाग कर भूखे प्यासे रह कर एक लाख से अधिक कश्मीरियों को सुरक्षित बाहर निकाला था।

ऐसी ही हालत 8 अक्टूबर 2005 को भी थे। सौ सालों के बाद पहली बार भीषण भूकंप ने कश्मीर को झकझोर कर रख दिया था। आम नागरिक ही नहीं बल्कि सेना को भी भारी क्षति उठानी पड़ी थी। एलओसी से सटे इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान सेना को हुआ था। बीसियों जवान मारे गए थे। लेकिन सैनिकों ने इस पर दुख या विलाप करने की बजाए नागरिकों को बचाने के कार्य को प्राथमिकता दी थी। यही नहीं सप्लाई लाइन बंद हो जाने के बाद सेना ने नागरिकों के लिए रहने और खाने-पीने की व्यवस्था की थी।

ऐसे ही हिचकोले करीब तीन बार बर्फीले सुनामी ने कश्मीर को दिए थे। सेना के बंकर, पोस्टें, इत्यादि बर्फ के नीचे दफन हो गए। पर कश्मीरियों की मदद करने का जज्बा दफन नहीं हो पाया। तभी तो अनंतनाग के वाल्टेंगुनार में सेना के जवानों ने अपनी जान पर खेल कर हजारों कश्मीरियों को बचाया था। तब कश्मीरियों ने सेना के जवानों के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया था: ‘मसीहा’।
यह लेखा-जोखा कुछ बड़ी घटनाओं का था जब सेना के वे जवान कश्मीरियों के लिए देवदूत बन कर आए थे जिन पर कन्हैया कुमार जैसा छुटभैया नेता कश्मीरी महिलाओं से बलात्कार का घिनौना आरोप मढ़ रहे हैं, जबकि आए दिन ऐसी कई घटनाएं जम्मू कश्मीर में होती रहती हैं जब कश्मीरियों के लिए सैनिक ‘मसीहा’ बन कर सामने आते हैं।

सिर्फ प्राकृतिक घटनाएं ही नहीं, आतंकवाद के दौरान पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों के जुल्मों के शिकार कश्मीरियों के लिए भी सेना मसीहा बन कर ही हमेशा सामने आई है। उसने कभी भेदभाव नहीं किया। तभी तो मरीयम बेगम आज भी सेना के जवानों को दुआएं देती हैं जिसके नाक और कान आतंकियों ने मुखबिर होने के आरोप में काट दिए थे और सेना ने उसे नए नाक और कान दिलवाए थे।
इन सबके बीच करगिल की चोटियों पर 1999 के युद्ध में वीर गाथाएं लिखने वाले सैनिकों की दास्तानों को कैसे भुलाया जा सकता है जब उन्होंने विश्व का सबसे खतरनाक और कठिन युद्ध लड़ कर फतह पाई थी और दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन हिमखंड पर तैनात जवानों के जज्बे और हिम्मत को शायद कन्हैया कुमार भी सलामी देने पर मजबूर होगा जो शून्य से 50 डिग्री के नीचे के तापमान में दुश्मन से हमारी रक्षा के लिए खड़े हैं ताकि हिन्दुस्तान में रहने वाले सुख और चैन की नींद सो सकें।

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