करोड़ों खर्च के बाद भी अपडेट नहीं हुआ डबल एंट्री सिस्टम

  • नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल, अधिकारियों ने साधी चुप्पी
  • डबल एंट्री सिस्टम लागू होने से आय-व्यय का पूरा लेखा-जोखा होगा सभी के सामने

 अंकुश जायसवाल
captureलखनऊ। नगर निगम वर्षों से शहर को विकसित करने के नाम पर तमाम तरह की योजनाओं में करोड़ों रुपये बर्बाद करता आ रहा है। इसलिए आज निगम की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई है। वह ठेकेदारों का करोड़ों रुपये का कर्ज चुकाने और विकास कार्यों के लिए बजट उपलब्ध करवाने में नाकाम साबित हो रहा है। आर्थिक संकट से उबरने की तमाम कोशिशें भी नाकाम हो चुकी हैं। लेकिन नगर निगम के आला अधिकारियों की जुगलबंदी के कारण डबल एंट्री और आनलाइन डाटा समेत कोई भी प्रयास व्यवस्था को सुधारने में सफल नहीं हो पाया। इसलिए चुनाव करीब होने के बावजूद पार्षद अपने क्षेत्रों में विकास कार्य नहीं करवा पा रहे हैं। वहीं जनता अपनी समस्याओं का निदान करवाने के लिए अधिकारियों के कार्यालयों का चक्कर लगाने को मजबूर है।
नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण आज तक विभाग में डबल एंट्री सिस्टम पूरी तरह से लागू नहीं हो सका है। डबल एंट्री सिस्टम लागू करने के लिए नगर निगम, जिस एकाउंटेंट और कार्यदायी संस्था के लोगों पर हर महीने लाखों रुपये उड़ा रहा है। वे पिछले आठ साल से इस व्यवस्था को अपडेट नहीं कर पाये हैं। लेकिन अधिकारियों की मेहरबानी उन पर बरकरार है।

कई बार जांच के लिए आ चुकी हैं टीम

जेएनएनयूआरएम योजना से लेकर उसकी समाप्ति तक दर्जनों बार भारत सरकार की टीमें डबल एंट्री सिस्टम की जांच करने आ चुकी हैं। लेकिन यह व्यवस्था लागू करने के लिए संबंधित अधिकारियों ने रफ्तार नहीं पकड़ी। ऐसे में इस व्यवस्था को लागू न कर पाने में एक नहीं बल्कि पूरा सिस्टम ही सवालों के घेरे में आ रहा है। वहीं विकास के नाम पर जारी होने वाले बजटों का लेखा-जोखा न होने से बजट की बंदरबांट की जा रही है। जो भ्रष्टाचारियों के लिए अच्छी और जनता के लिए बुरी बात है।

सता रहा पारदर्शिता का डर

डबल एंट्री सिस्टम अधिकारियों के गले न उतरने का मुख्य कारण यह है कि देश की सरकार कहीं भी बैठकर नगर निगम की आय-व्यय का लेखा-जोखा ऑनलाइन देख सकती है। चूंकि नगर निगम प्रदेश सरकार के बजट और खुद की आय से करोड़ों रुपये का बजट विकास कार्यों पर खर्च करता है। बजट कहां खर्च हो रहा है, इसके लिए भारत सरकार ने यूपी सरकार के माध्यम से नगर निगम प्रशासन को निर्देश दिए थे कि वह डबल एंट्री सिस्टम लागू करें। सूत्रों के अनुसार प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार को शपथ पत्र दे रखा है कि नगर निगमों में डबल एंट्री की व्यवस्था लागू हो चुकी है। जबकि हकीकत कुछ और ही है।

क्या कहते हैं अधिकारी

डबल एंट्री सिस्टम के सम्बन्ध में अधिकारियों के साथ बैठक की है और 10 दिनों के अन्दर सारा लेखा-जोखा अपडेट करने के निर्देश दिए हैं।
उदयराज सिंह
नगर आयुक्त, नगर निगम

नगर निगम में डबल इंट्री सिस्टम लागू है। लेकिन 2014 तक की बैलेंस सीट नहीं बनी है। जल्द ही बनवायी जायेगी।
राजेंद्र सिंह
मुख्य वित्त, लेखाधिकारी
नगर निगम

क्या है मामला

नगर निगम में जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) योजना के अन्तर्गत डबल एंट्री सिस्टम सुधार का एक प्रयास था। यह प्रणाली लागू करने के लिए भारत सरकार ने अलग से बजट की व्यवस्था की थी, जिसमें कंप्यूटर खरीद से लेकर कर्मचारियों व अधिकारियों की ट्रेनिंग का खर्च भी शामिल था। केंद्र्र सरकार द्वारा इस व्यवस्था पर जोर देने का मकसद निगम के आय-व्यय में पारदर्शिता लाना था, लेकिन विभागीय अधिकारियों को आय-व्यय में पारदर्शिता रास नहीं आ रही। प्रदेश सरकार की नाक के नीचे संचालित नगर निगम की बात करें तो यहां अभी केवल वर्ष 2014 तक का डाटा अपडेट हो पाया है। इसी साल यानी वर्ष 2014 में ही जेएनएनयूआरएम योजना भी समाप्त हो गई थी। इसके बाद नगर निगम का डाटा अपडेट करने में अधिकारी नाकाम रहे हैं, जबकि यह कार्य जेएनएनयूआरएम योजना की समाप्ति से पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वर्ष 2008 से लेकर अब तक करीब आठ साल बीत चुके हैं लेकिन काम पूरा नहीं हो पाया। इसके बावजूद सम्बन्धित कर्मचारी अपनी कछुआ चाल नहीं बढ़ा पाये हैं। नगर निगम के अधिकारी कामचोर कर्मचारियों के खिलाफ कार्यवाही करने की जगह उनकी पीठ थपथपाते फिर रहे हैं। गौरतलब है कि इस सिस्टम के लिए नगर निगम हर महीने लाखों रूपये वेतन पर खर्च करता है, जिसमें से कुछ विभागीय और कुछ कार्यदायी संस्था के लोग हैं।

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