कब सुधरेंगे हमारे सांसद…

दुर्भाग्य की बात यह है कि जब कांग्रेस की सरकार थी तब भाजपा के नेता इसी तरह हंगामा काटकर संसद को नहीं चलने देते थे। और अब जब भाजपा की सरकार है तब कांग्रेस वही कर रही है जो भाजपा ने उसके साथ किया था। इन दोनों दलों के नेताओं को इस बात का जरा सा भी अहसास नहीं कि उनके इस कृत्य से इस देश का आम आदमी खुद को ठगा महसूस करता है और मानता है कि उसके साथ धोखा हो गया।

SANJAY SHARMA - EDITOR

संजय शर्मा 

संसद में इस बार भी वैसा ही नजारा दिख रहा है जैसा पहले दिखता आया था। मामूली बात पर हंगामा और हंगामे के बाद संसद का स्थगित हो जाना मानो परंपरा बन गई है। हमारे नाकारा सांसद यह समझने लगे हैं कि संसद में बहस करने से अच्छा हंगामा करना होता है। उनको लगता है कि उनके इलाके के लोग जब उन्हें टीवी पर चिल्लाते हुए देखेंगे तो उन्हें लगेगा कि उनके सांसद बहुत जबरदस्त काम कर रहे हैं। लगता है मानो हकीकत से इन सांसदों का कोई लेना-देना नहीं है। हकीकत यह है कि सांसदों को इस तरह गुंडों की तरह हरकतें करते हुए देखकर न सिर्फ उनके क्षेत्र के लोग बल्कि देश का आम आदमी भी शर्मिन्दा होता है कि उसने लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में ऐसे गुंडों को भेज दिया जिनकी जगह कम से कम संसद में तो कदापि नहीं थी।
संसद की कार्यवाही चलाने में एक दिन में करोड़ों रुपए का खर्चा आता है। जाहिर है यह पैसा वही होता है जो हम और आप टैक्स के रूप में सरकार को देते हैं। हमारे पैसे पर यह सांसद किस तरह अय्याशी करते हैं यह देखकर खून मानो खौल जाता है। संसद लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर कहलाती है। यह वह जगह होती है, जहां देश के लोगों का भाग्य तय होता है। यहां आयोजित चर्चा परिचर्चा में तय होता है कि देश में विकास की कौन सी योजनाएं बनेंगी और उन योजनाओं पर किस तरह काम किया जाएगा। मगर दुर्भाग्य की बात यह है कि जब कांग्रेस की सरकार थी तब भाजपा के नेता इसी तरह हंगामा काटकर संसद को नहीं चलने देते थे। और अब जब भाजपा की सरकार है तब कांग्रेस वही कर रही है जो भाजपा ने उसके साथ किया था। इन दोनों दलों के नेताओं को इस बात का जरा सा भी अहसास नहीं कि उनके इस कृत्य से इस देश का आम आदमी खुद को ठगा महसूस करता है और मानता है कि उसके साथ धोखा हो गया। .
सवाल यह भी है कि यह व्यवस्थाएं आखिर कब तक इसी तरह चलती रहेंगी। हमारे सांसदों को अगर यह होश नहीं आएगा कि वह व्यवस्थाओं में सुधार करें तो आम आदमी क्या करेगा। क्या वह अभिशप्त है इन हालातों को झेलने के लिए। आखिर उसकी सुध कौन लेगा और कौन उनको यह एहसास कराएगा कि टैक्स के रूप में वह जो पैसा दे रहा है, सरकार उसका पूरा उपयोग कर रही है। यह तंत्र नाकारा होता जा रहा है। अब समय आ गया है, जब हम इन नेताओं को समझा दें कि वह शराफत से हमारे पैसे पर अय्याशी करना बंद कर दें।

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