कटघरे में पत्रकारिता और पत्रकार

ajay kumarउत्तर प्रदेश विधान सभा में गत दिनों तमाम राजनैतिक दलों ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर मीडिया का जमकर विरोध किया। विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने तो वर्तमान मीडिया को ‘पक्षपाती’ तक कह डाला। दरअसल, सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों सें संबंधित एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल पर प्रसारित किये गये ‘स्टिंग आपरेशन’ की जांच रिपोर्ट में एक मीडिया घराने को दोषी पाया गया। इस संबंध में विधान सभा द्वारा गठित जांच समिति ने सदन में जो रिपोर्ट रखी उसमें एक बड़े इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ‘कटघरे’ में खड़ा कर दिया। रिर्पोट में जहां तो मंत्री आजम खां को क्लीन चिट दी गई वहीं मीडिया पर पक्षपात पूर्ण कार्य करने का आरोप लगा। असल में मुजफ्फरनगर दंगों के समय एक इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनल ने आजम खां का एक स्टिंग दिखाया था, जिसमें कुछ पुलिस वाले कहते दिख रहे थे कि ऊपर (सत्तारूढ़ दल) से आये आदेशों के चलते उन्हें एक वर्ग विशेष के कुछ अपराधियों को छोडऩा पड़ गया। उस समय विधान सभा में यह मामला उठने पर भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों ने हंगामा किया था। विपक्ष के हमलों से घिरता देख अध्यक्ष ने स्टिंग ऑपरेशन की जांच के लिये सदन की एक सर्वदलीय समिति गठित कर दी। भाजपा ने इस जांच समिति से बाद में अपने को अलग कर लिया।

जांच समिति ने इसी 16 फरवरी को अपनी रिपोर्ट सदन में रखी। समिति ने पाया कि ‘स्टिंग’ फर्जी था और सरकार को बदनाम करने के लिये किया गया था। मामला मीडिया और सियासतदारों के बीच का था। इसी वजह से हमेशा आपस में लडऩे वाले नेता एकजुट हो गये। भाजपा ने जरूर इससे दूरी बनाये रखी। इसकी वजह भी थी, इस स्टिंग ऑपरेशन के सहारे भाजपा को लोकसभा चुनाव में कामयाबी मिली थी। जांच समिति ने उक्त चैनल के पत्रकारों को अवमानना का दोषी पाया। दोषी करार दिये जाने के बाद भी उक्त चनैल का कोई भी पदाधिकारी सदन में हाजिर नहीं हुआ। वैसे यह सिलसिला पुराना है। इससे पूर्व 1954 में ब्लिट्ज के संपादक आर. के. करंिजया को भी एक समाचार से सदन की अवमानना के मामले में विधान सभा में पेश होना पड़ा था। करजिया सदन में हाजिर हुये और अपनी बात रखी, तब सदन ने कजरिया को माफ कर दिया था। इसी प्रकार माया राज में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को एक विधायक उदयभान करवरिया के संदर्भ में गलत समाचार प्रसारित करने के लिये नोटिस देकर सदन में बुलाया गया था। राजदीप आये और विधान सभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये। भाजपा राज में केशरीनाथ त्रिपाठी ने दूरदर्शन पर रोक लगा दी थी। दूरदर्शन पत्रकार को प्रेस दीर्घा में आने से रोक दिया गया था। वैसे गैर पत्रकारों को भी अक्सर अवमानना के मामलों में सदन में हाजिर होना पड़ता रहा है। इसी तरह से 1990 के दशक में आईएएस अधिकारी शंकर दत्त ओझा को विवादास्पद बयान के चलते सदन के कटघरें में आकर माफी मांगनी पड़ी थी।
बहरहाल, बात मीडिया की ही कि जाये तो मीडिया समाज का दर्पण होता है। उसे दर्पण बनकर ही रहना चाहिए। आजादी की जंग के समय मीडिया देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने में इसी लिये अपना महत्वपूर्ण योगदान दे पाया था क्योंकि उस समय पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी। मिशन देश को आजादी दिलाने का था। आजादी के मिशन को पूरा करने में कई पत्रकारों को जान तक की कुर्बानी देनी पड़ी थी, लेकिन किसी ने कोई गिला-शिकवा नहीं किया। आजादी के बाद से पत्रकार भले ही बढ़ते गये हों लेकिन पत्रकारिता की धार लगातार कुंद होती गई। बड़े-बड़े पंूजीपति मीडिया में सिर्फ इसी लिये पैसा लगाते हैं जिससे की वह मोटी कमाई कर सकें और इसकी आड़ में अपने अन्य धंधों को भी आगे बढ़ाया जा सके। आज शायद ही कोई मीडिया समूह ऐसा होगा, जो पत्रकारिता के अलावा अन्य तरह के करोबार से न जुड़ा हो। सबके अपने-अपने हित हैं। पत्रकारिता के माध्यम से कोई अपना धंधा चमकाना चाहता है तो किसी को इस बात की चिंता रहती है कि कैसे सरकार या राजनैतिक दलों पर दबाव बनाकर सांसदी हासिल की जाये या बड़े-बड़े पदों पर अपने चाहने वालों को बैठाया जाये। आज के परिदृश्य में पत्रकारिता का स्तर क्या है। यह कहां खड़ा है, इस बात को जब जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि करीब-करीब सभी मीडिया घराने किसी न किसी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। कहीं किसी नेता का कोई न्यूज चैनल चल रहा है या फिर अखबार प्रकाशित हो रहा है तो कहीं उद्योगपति मीडिया के धंधे में पौबारह कर रहे हैं। इसी लिये अक्सर समाचारों में विरोधाभास देखने को मिलता है। अगर बात इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनलों की कि जाये तो एबीपी न्यूज चैनल (यानी आनंद बाजार पत्रिका) वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगा है। मोदी सरकार को घेरने का कोई भी मौका यह चैनल नहीं छोड़ता है। ‘न्यूज ‘24’ चैनल कांग्रेस के एक सांसद और पत्रकार का है। यहां भी भाजपा को घेरने का उपक्रम चलता रहता है। ‘इंडिया न्यूज’ चैनल के मालिक भी कभी कांग्रेसी नेता थे, आज वह बीजेपी में है। एनडी टीवी बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले राय साहब का है। राय साहब को वृंदा करात के पति की बहन ब्याही है। यही हाल कमोवेश अन्य इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ओर प्रिंट मीडिया घरानों का भी है।
आज देश में जो माहौल बना हुए है, उसके बारे में निसंकोच कहा जा सकता है सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है तो इसके लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। देश की सियासत गरमाई हुई है। मु_ी भर नेताओं और चंद मीडिया समूहों द्वारा देश पर थोपा गया ‘तनाव’ देश की सवा सौ करोड़ शांति प्रिय जनता पर भारी पड़ रहा है। पूरे हिन्दुस्तान में माहौल ऐसा तैयार किया जा रहा है, मानो जेएनयू कांड, दलित छात्र राहुल बेमुला की आत्महत्या, दादरी कांड़, बीफ मुद्दा, आरएसएस का आरक्षण पर बयान, कुछ साहित्यकारों का पुरस्कार लौटाना, एक-दो नेताओं पर स्याही फेंकने की घटनाएं, गरबा डांस कार्यक्रम पर हंगामा, शिवसैनिकों के उदंडता, प्रधानमंत्री पर अनाप-शनाप बयानबाजी करने वाले नेताओं को लाइमलाइट में लाने जैसी खबरों के अलावा मीडिया के पास दिखाने को कुछ बचा ही नहीं है। खबर के नाम पर मीडिया में वह सब दिखाया जा रहा है जिससे देश को नुकसान हो सकता है। जनता से जुड़ी तमाम समस्याएं मीडिया की सुर्खियां बनना तो दूर खबरों में जगह तक नहीं बना पाती हैं। इतना ही नहीं जहरीली जुबा से विवादों को राशन-पानी देने वाले नेता, तथाकथित साधू-संत, मुल्ला-मौलवी मीडिया की पहली पंसद बन जाते है। ऐसे नेताओं को स्टूडियों में बुलाकर और अधिक जहर उगलने का मौका दिया जाता है, जिससे भले ही देश का माहौल खराब होता हो, लेकिन इनकी टीआपी तो बढ़ ही जाती है। टीआरपी बढऩे का मतलब विज्ञापन के रेट बढऩा, जिससे मोटी कमाई होती है। यह हास्यास्पद है कि तमाम दलों के नेता और सरकारें एक-दूसरे को नीचा दिखाने और गलत साबित करने में अपना पूरा समय खपा रहे हैं। ऐसे लोगों को मीडिया, उसमें भी खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया फलने-फूलने का पूरा मौका दे रहा है। कुपोषण से जुझते और मरते बच्चों, किसानों की समस्याओं, गांव की चौपाल से शहर तक में व्याप्त भ्रष्टाचार, बिजली चोरी जैसी सामाजिक बुराइयों, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में तमाम सरकारों की नाकामी को अनदेखा करके मीडिया नेताओं के साथ मिलकर उन मुद्दों पर चर्चा करने में लगा रहता है, जिससे नेताओं और मीडिया के अलावा किसी का भला नहीं होता है। इतना ही नहीं नेताओं के सीधे-साधे बयान को तोड-मरोड़ कर विवादित रूप में पेश करने की पीत पत्रकारिता भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लगता है, अब समय आ गया है कि कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों के क्रियाकलापों की भी जांच कराई जाये ताकि पता चल सके कि यह लोग विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गये हैं। नहीं भूलना चाहिए कि विदेशी ताकतें देश में काम करने वाले कथित नेताओं, पत्रकारों आदि का अपने लिये इस्तेमाल करती रही हैं। तमाम विदेशी ताकतें समाज सेवी संगठनों (एनजीओ) के माध्यम से लम्बे समय से हिन्दुस्तान को तोडऩे में लगी हुई हैं। इस बात के प्रमाण भी सामने आते रहते हैं। यह देख कर आश्चर्य होता है कि स्याही फेंकने की छोटी सी घटना पर तो मीडिया हाहाकार मचा देता है, लेकिन उन लोगों की तरफ से मुंह मोड़े रहता है, जिनकी वजह से देश की सवा सौ करोड़ जनता त्राहिमाम करने को मजबूर है। बड़े-बड़े औद्योगिक और मीडिया नेताओं की मिलीभगत से फल फूल रहे हैं। देशभर में मिलावखोरों, कालाबाजारियों, नशे का धंधा करने वालों का नेटवर्क फैला हुआ है, लेकिन इनके खिलाफ न तो कोई सरकार कदम उठाती है, न मीडिया मुंह खोलता है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दुस्तान में नेताओं की दो तरफ की जमात मिलती हैं। एक वह जिनमें नेतृत्व का गुण होता है और अपनी काबलियत के बल पर सियासत में अपना स्थान बनाते हैं। आजकल सुर्खियों में रहने वाले नेताओं नरेन्द्र मोदी, लालू यादव, नितीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, मायावती, ममता बनर्जी, जैसे तमाम नेता इसी श्रेणी में आते है। दूसरे टाइप के वह नेता होता है जो ताल- तिकड़म, जातिवाद और परिवारवाद के सहारे नेता बन जाते हैं। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, आजम खान, लालू के दोनों बेटों आदि कुछ नेताओं की गिनती दूसरे टाइप के नेताओं में की जा सकती है, जिनको नेतृत्व का गुण न होते हुए भी देश पर चाहे-अनचाहे थोप दिया गया है। आजादी के बाद से देश की सियासत में दोनों ही प्रकार के नेताओं का दबदबा देखने को मिलता रहा है। दोनों श्रेणी के नेताओं में काफी फर्क देखने को मिलता है। टाइप वन नेताओं का अपना जनाधार और सोच होती है, वह इसी के सहारे आगे बढ़ाते हैं जबकि टाइप टू के नेतागण जनाधार जुटाने के लिये कोई सार्थक क्रियाकलाप करने की बजाये टाइप वन के नेताओं की टांग खिंचाई करके अपनी सियासत चमकाने में लगे रहते हैं। टाइप टू के नेताओं की सबसे बड़ी काबलियत यह है कि उन्हें इस बात का अच्छी तरह से अहसास रहता है कि बिना कुछ किये मीडिया में कैसे सुर्खिंयां बटोरी जा सकती हैं। शायद इसी लिये पीएम मोदी को सबसे अधिक टाइप टू के ही नेता कोसने-काटने में लगे रहते हैं। जिनको देश की जनता ठुकरा देती है उसे मीडिया के अपनाने का चलन न होता तो शायद इन नेताओं को कोई पूछता भी नहीं लेकिन देश का यह दुर्भाग्य है कि वर्षों से मीडिया का एक वर्ग और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया ऐसे नेताओं को आगे करके देश का बढ़ा नुकसान करने में लगा हैं। इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया तो देश के गर्दिश में जाने की दिन थमने वाले नहीं है। मीडिया का कर्तव्य देशहित है। किसी व्यक्ति विशेष, समूह या विचारधारा को आगे बढ़ाने के बजाये मीडिया को सिर्फ समाज और राष्ट्रवाद के लिये पत्रकारिता करनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

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