और कितना जानवर होंगे हम…

अभी तक यही होता भी आया है। चुनाव पास आते ही धर्म और जाति का घिनौना खेल खेलना शुरू हो जाता है। आम आदमी का ध्यान वास्तविक मुद्ïदों से हट जाता है। उसको भावनात्मक रूप से इतना भडक़ा दिया जाता है कि वह भूल जाता है कि उसके जीवन में आखिर बड़ी परेशानियां हैं क्या?

sanjay sharma editor5इन राजनेताओं के बयान को देखकर आपको शर्मिंदगी आती है या गुस्सा। एक बेजुबान जानवर के मारे जाने की खबर के बाद हमारे राजनेताओं ने जानवरों से भी गया-गुजरा व्यवहार करना शुरू कर दिया है। कभी-कभी तो बहुत हैरानी होती है किआखिर हम इन जैसे नाकारा लोगों को अपना नेतृत्व कैसे सौंप देते हैं। चुनाव पास आते ही ये मर्यादा की सभी सीमायें लांघ जाते हैं और पशुओं से भी गया-गुजरा व्यवहार शुरू कर देते हैं। ये ऐसा इसलिये करते हैं क्योंकि इनको लगता है कि हमारे और आपके सोचने की क्षमतायें बहुत कम हैं और ये जैसा चाहेंंगे वैसा हमको गुमराह करते रहेंगे।
अभी तक यही होता भी आया है। चुनाव पास आते ही धर्म और जाति का घिनौना खेल खेलना शुरू हो जाता है। आम आदमी का ध्यान वास्तविक मुद्ïदों से हट जाता है। उसको भावनात्मक रूप से इतना भडक़ा दिया जाता है कि वह भूल जाता है कि उसके जीवन में आखिर बड़ी परेशानियां हैं क्या? जाति और धर्म के मुद्ïदों को इतना बड़ा कर दिया जाता है कि सबकुछ उसमें खो जाता है।
मैंने अपने इसी कॉलम में लगभग दो महीने पहले लिखा था कि बिहार चुनाव से पहले किसी न किसी बहाने फिर सांप्रदायिकता का नंगा नाच किया जायेगा। दादरी के एक गांव में गाय के काटे जाने की खबर इक्कसवीं सदी में जा रहे डिजिटल इंडिया को इतना भडक़ा देती है कि हमारे कर्णधार सारी बातें भूलकर इसी पर चर्चा करना शुरू कर देते हैं। उनको लगता है कि देश के सामने इससे बड़ा मुद्ïदा और कोई नहीं है।
इन राजनेताओं की बेशर्मी की पराकाष्ठïा देखिये कि किसी व्यक्ति की मौत का ये कितना बड़ा तमाशा खड़ा कर देते हैं। पढ़े लिखे नौजवान भी इससे भ्रमित हो रहे हैं। उनको लग रहा है कि इस देश में गाय से बड़ा मुद्ïदा कोई दूसरा नहीं है। यह पहला मौका नहीं है जब इस देश के कई स्वयंभू कर्णधार यह तय करने की कोशिश में जुट गये हों कि किसको क्या खाना चाहिये और किसको क्या पहनना चाहिये।
बिहार के चुनाव में जिस तरह जातियों की गोलबंदी हो रही थी उसको तोडऩे के लिये सिर्फ एक ही विकल्प था कि धर्म का यह घिनौना कार्ड खेला जाये। हमारे राजनेताओं का यह प्रिय विषय है और इस खेल को खेलने में वे पारंगत हैं। उनके इस खेल से इस देश की भावना और आपसी भाईचारा खंडित हो रहा है। मगर उन्हें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है। उनका काम चल रहा है। लोग भूल रहे हैं कि हमारे राजनेता हमारे लिये, हमारी मूलभूत आवश्यकतायें पूरी नहीं कर पा रहे। राजनेता भी आराम से इसे पूरी करने की जगह जानवरों जैसा व्यवहार करके जानवर को ही मुद्ïदा बना रहे हैं।

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