ऐसे कभी भी नहीं सुधरेगी लखनऊ में कानून व्यवस्था

एसएसपी साहब छोटे दारोगा पर कार्रवाई और इंस्पेक्टर के नाम पर कंपकंपी

जानकीपुरम इंस्पेक्टर पर कार्रवाई के नाम पर कंपकंपी चढ़ जाती है पुलिस के बड़े अफसरों को
4पीएम की खबर के बाद केवल छोटे पुलिसकर्मियों को किया गया निलंबित, दोषी इंस्पेक्टर अभी भी जमा थाने पर

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। जानकीपुरम थाना क्षेत्र में 11 सितम्बर को डकैतों ने तीन घरों में डकैती डाली और व्यवसायी की हत्या कर दी। 24 घंटे के भीतर फिर काकोरी में डकैतों ने धावा बोलकर लाखों रुपये की सम्पति लूट ली। राजधानी में ताबड़तोड़ इन घटनाओं के बाद हडक़ंप मच गया। माना जा रहा था कि एसएसपी लापरवाही बरतने वाले इंस्पेक्टर के खिलाफ कार्रवाई करेंगे। मगर जब तीन दिन बीतने के बाद भी किसी भी पुलिसकर्मी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो 4पीएम ने इस संबंध में विस्तार से खबर छापी थी। खबर छपने के बाद एसएसपी ने एसआई देवी प्रसाद सिंह, सिपाही सरोज कुमार दीक्षित और रामबदल पाण्डेय को निलंबित कर दिया। एसएसपी के इस कदम से सबको हैरानी हुई और सबने कहना शुरू कह दिया कि एसएसपी की हिम्मत नहीं है कि वह इंस्पेक्टर के खिलाफ कार्रवाई कर पायें। जाहिर है जब एसएसपी की इतनी हैसियत नहीं होगी कि वह डकैती और हत्या के बाद भी इंस्पेक्टर को थाने से हटा सके तो जिले की कानून व्यवस्था का भगवान ही मालिक है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों में लखनऊ में अपराधों की संख्या में खासी बढ़ोत्तरी हुई है। थानों पर सिफारिशी थानेदार तैनात कर दिये गये हैं जो जमीनों के धंधों में और पैसा कमाने में जुटे हुये हैं। इन हालातों में यह आशा करना बेमानी है कि जिले में कानून व्यवस्था कायम हो पायेगी। अपराधों के लगातार बढऩे से आम आदमी दहशत में हैं। साथ ही सरकार की साख पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब राजधानी में अपराधों का यह हाल है तो बाकी जगह क्या होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है।
लखनऊ पुलिस के नाकारापन का एक उदाहरण विभूतिखंड थाना क्षेत्र में हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान के दफ्तर पर हुआ हमला है। नाकारा विभूतिखंड पुलिस आज तक हमले के आरोपी पार्षद को गिरफ्तार नहीं कर सकी है, जबकि वह खुलेआम लखनऊ में घूम रहा है। विभूतिखंड थानाध्यक्ष के कई कारनामे सामने आ चुके हैं। एक मुल्जिम को छोडऩे के एवज में थानाध्यक्ष विभूतिखण्ड विनोद मिश्रा ने एक अपराधी मंसूर से ढाई लाख रुपये लिये। मगर जब इसकी सूचना उच्चाधिकारियों को हो गई तो मंसूर को जेल भेजना पड़ा और थानाध्यक्ष ने रिश्वत की रकम किश्तों में वापस की। जाहिर है जब एसएसपी ऐसे घूसखोर थानाध्यक्षों को तैनात रखेंगे तो चाक चौबंद कानून व्यवस्था की उम्मीद करना भी बेमानी है।

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