एशिया का उभरता महा-संघर्ष

भारत 1947 में आजाद हुआ ही था। एक विश्व-बंधुत्व की भावना वाले प्रधानमंत्री के हाथों में सत्ता जानी थी। जापान के हमले से उबरते हुए चीनी कुओमिंतांग पार्टी अपने नेता चिआंग काई-शेक के नेतृत्व में घरेलू साम्यवादियों से भिड़ी हुई थी। अमेरिका और अन्य देश कुओमिंतांग का ही साथ देते आये थे और कम्युनिस्टों से ये उम्मीद नहीं थी कि वे सत्ता हथियाने में कामयाब होंगे। लेकिन, 1949 में आश्चर्यजनक रूप से सत्ता माओ के हाथों में आ गयी और उन्होंने पीआरसी की स्थापना की। कुओमिंतांग पार्टी के नेता भाग कर ताइवान चले गये। वही ताइवान, जिस पर डोनाल्ड ट्रंप के हालिया ट्वीट ने ‘एक-चीन’ नीति के उल्लंघन के लिए चीनी सरकार को क्रोधित किया है।

पंडित नेहरू का दर्शन शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का था, लेकिन, एक ही दशक में उनके सारे सपने चूर हो गये, जब चीनी कम्युनिस्टों ने न केवल पूरे तिब्बत को हथिया लिया वरन भारत के साथ हिंसक सैन्य झड़प भी हो गयी। तिब्बत अपनी सवा बारह लाख वर्ग किमी की भूमि से सदियों से भारत और चीन के बीच एक सुरक्षित ‘बफर जोन’ था, अचानक चीनी कब्जे में आ गया। वहां पीएलए ने सैन्य बस्तियां बनानी शुरू कर दीं। उसका परिणाम आज भारत की सैन्य रणनीतियों पर दिख रहा है, जिसमें हमें अपने आधुनिक हथियार व सेना को तिब्बत और अरुणाचल के ऊपर से दृश्य खतरे से निपटने हेतु लगाना पड़ रहा है।
आज की हकीकत यह है कि चीन भारत में ही दलाई लामा के कार्यक्रमों पर सीधी आलोचना करता है और सरकार स्पष्टीकरण देती है। ऐसा वह भारत ही नहीं, अमेरिका के साथ भी पिछले दिनों कर चुका है। अमेरिका ने उसे झिडक़ दिया कि ऐसी आलोचना उसे स्वीकार नहीं है। चीन की रणनीति को समग्रता में देखें, तो चीन ही भारत को हानि पहुंचने का माद्दा और मंशा दोनों रखता है। आइए, सबसे पहले, भारत और चीन के बीच बड़े अंतरों को समझें-
पहला अंतर- भारत में कोई भी सरकार दस या पंद्रह वर्ष की कोई नीति (सामरिक, औद्योगिक या अन्य) नहीं बनाती जबकि चीन सीधे बीस, तीस और उससे भी आगे की नीतियां बना कर अमल भी कर रहा है। कह सकते हैं कि हमारे लोकतंत्र और हर पांच वर्षों के चुनावों ने यह बहुत बड़ी ‘सापेक्ष सामरिक कमी’ हमें दी है।
दूसरा अंतर-चूंकि, चीन में न मौलिक अधिकार की अवधारणा है, न संविधान की सर्वोच्चता और न ही कोई ऐसा सुप्रीम कोर्ट, जो वहां की सरकार को टोके या रोके। अत: केवल एक पार्टी की सरकार पूरी अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमताओं को बनाती है और तेजी से अमल में लाती है। ये तीव्र गति भारत में, जहां मंथर गति सर्वव्यापी है, दिवा-स्वप्न जैसी दिखती है!
तीसरा अंतर- 1980 से ही देंग झाओपिंग के नेतृत्ववाले चीन ने समझ लिया था कि आर्थिक उन्नति के बिना कोई भी सामरिक विजय हासिल नहीं हो पायेगी, अत: उसने मैन्युफैक्चरिंग और विज्ञान अनुसंधान में पूरी ताकत झोंक दी। आज स्थिति यह है कि अमेरिकी राष्टï्रपति चुनावों का सबसे बड़ा मुद्दा ही यही रहता है।
चौथा अंतर- एक दिशा, एक लक्ष्य और केवल एक निशाना लेकर चलनेवाला चीन हर सामरिक आपत्ति को या तो संसाधनों से या बलपूर्वक समाप्त कर देता है। अकूत विदेशी मुद्रा भंडार और विशाल आर्थिक शक्ति, उसे यह तात्कालिक लाभ देते हैं।
पांचवा अंतर- चीन पूरे एशिया पर एकछत्र दबदबा चाहता है। पिछले दस वर्षों में चीन ने भारत के हर हित के विरुद्ध खुला और अपमानजनक बर्ताव दिखाया है। 21वीं सदी चीन खुद की बनाना चाहता है, भारत के साथ साझा करने का उसका कोई इरादा नहीं है।
इतने स्पष्ट संकेत अब जमीनी हकीकत में तब्दील हो रहे हैं और हमारी अपनी भूमि में हो रहे हैं। अवैध रूप से हथियाये पाक-कश्मीर में, चीन ने अपना आर्थिक गलियारा बेहद तेजी से पिछले दो सालों में बना कर, सीधे हिंद महासागर में घुसने की तैयारी कर ली है। यही उसका अंतिम लक्ष्य भी होगा, भारत के सबसे सामरिक हिंद महासागर क्षेत्र के प्रभुत्व को कम करना। भारत के करीब रहे देशों (जैसे- बांग्लादेश) को सैन्य उपकरण जैसे- पनडुब्बियां, दी जा रही हैं। पाकिस्तान को मिल रही हिम्मत और ताकत कई गुना बढ़ गयी है- भले ही बलूचिस्तान के आंदोलनकारी चिल्लाते रहें। पाकिस्तान द्वारा 2017 में किया गया बाबर-3 मिसाइल परीक्षण इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए। अब बात केवल पाकिस्तान की ही नहीं रही है, अब पूरे एशिया पर प्रभुत्व की लड़ाई में चीन लगातार आगे निवेश करता जा रहा है, जिससे भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं। लडख़ड़ाते रूस को बड़ी खरीदों का लालच देकर और तालिबान को बीच के रास्ते मनवा कर, चीन नये समीकरण बनाता जा रहा है, जिसका पूरा अंतिम परिणाम शायद कोई न समझता हो।
तो भारत क्या करे? हम पांच बातों पर ध्यान दे सकते हैं।
पहला- जितने मित्र देशों के साथ एक साझा मोर्चा खड़ा किया जा सके, हमें करना होगा। वियतनाम और जापान के साथ हो रही सैन्य और सामरिक निकटता इसी सोच से की जा रही है।
दूसरा- आतंरिक शक्ति – शिक्षा व्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता और अर्थव्यवस्था को बेहद मजबूत करना होगा। इसी से हम पचास वर्षों तक ऐसी शक्तियों के आगे टिक पायेंगे।
तीसरा- जिस राजनैतिक व्यवस्था और लोकतंत्र पर हमें गर्व है, और जिसने हमें चीनी साम्यवादी शक्ति के आगे धीमा किया हुआ है, उसे पूरी तरह से स्वच्छ करना ही होगा- अर्थात क्रांतिकारी चुनाव सुधार।
चौथा – एक सुर में बोलना- जब बात राष्टï्रहित की हो, तो आपसी विरोध और कटुता ठीक नहीं है।
पांचवा – भविष्य के लिए तैयार रहना – यह भी हो सकता है कि चीनी सरकार का वर्तमान मॉडल (कोई लोकतांत्रिक चुनाव नहीं) किसी दिन अपनी निरंकुशता के चलते लडख़ड़ाने लगे और गिर जाये। तब चीन का सामरिक दृष्टिकोण बदल भी सकता है। इक्कीसवी सदी जितनी तेजी से नये रूप दिखा रही है। भारत को अपने हित और अपनी जनता की समृद्धि हेतु जो करना पड़े, राष्टï्रीय सहमति बनाकर करना चाहिए।

Pin It