एलयू में लगेगी शिवाजी की 13.5 फीट ऊंची मूर्ति

पहले से भी हैं विश्वविद्यालय में कई महापुरुषों की मूर्तियां
दबी जुबान में शुरू हो गया है विरोध
27 लाख रुपये की लागत से होगा निर्माण

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ । लखनऊ विश्वविद्यालय में कुलपति एसबी निमसे का कार्यकाल पूरा होने वाला है। कुलपति यहां से जाने से पहले विश्वविद्यालय में अपनी निशानी छोडक़र जाना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने मराठा योद्धा शिवाजी महाराज की 13.5 फीट ऊंची मूर्ति लगवाने का फैसला किया है। इस मूर्ति को अकादमी स्टाफ कॉलेज के पास स्थित ग्राउंड के नजदीक लगाया जाएगा। कुलपति ने इस प्रस्ताव को कुलाधिपति के समक्ष रखा था। इसे उन्होंने भी पास कर दिया है। इस प्रस्ताव को कार्यकारी परिषद के सामने भी रखा गया। जिसने बिना रोक इस प्रस्ताव का खुले मन से स्वागत किया। मूर्ति के लिए 27 लाख रुपये का फंड भी आवंटित कर दिया गया है। शिवाजी की कई मूर्तियां बना चुके मुंबई के रहने वाले उत्तम पचारने को इस मूर्ति को बनाने और तराशने की जिम्मेदारी दी गई है।
विश्वविद्यालय में बनने वाली मूर्ति मुंबई के दहीसर इलाके में लगी शिवाजी की एक मूर्ति की तरह होगी। इस मूर्ति का निर्माण कांसे से किया जाएगा। इसमें शिवाजी घोड़े पर सवार होंगे। पोर्ट ब्लेयर से फोन पर हुई बातचीत में पचारने ने कहा कि जिस मुद्रा में शिवाजी इस मूर्ति में बैठेंगे वह काफी आक्रामक शैली में होगी। जो अपने हाथ में एक तलवार लिये होगी। परचाने खुद जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स से स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। अभी तक अकेले महाराष्ट्र में ही परचाने की बनाई हुई 8 मूर्तियां राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हैं।

विश्वविद्यालय में हैं और भी कई मूर्तियां
विश्वविद्यालय परिसर में पहले से ही कई आकर्षक मूर्तियां लगी हुई हैं, जिसमें महात्मा गांधी की मूर्ति टैगोर पुस्तकालय के पास पार्क में लगी है। इसके अलावा भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद की मूर्तियां हैं। इन मूर्तियों को बनाने के पीछे कोई न कोई कहानी है। वहीं अब विश्वविद्यालय को एक और मूर्ति की सौगात कुलपति देने जा रहे हैं। मालूम हो कि उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक और लखनऊ विश्वविद्यालय के उपकुलपति एसबी निमसे दोनों ही महाराष्टï्र के रहने वाले हैं। सूत्रों की माने तो यह उनके महाराष्टï्र प्रेम का प्रतीक होगा। इस संबंध में कुलपति एसबी निमसे का कहना है कि उनका मराठी मूल का होना विवि में शिवाजी की मूर्ति की स्थापना करने के फैसले के पीछे प्रभावी नहीं है।

चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों ने रखा प्रस्ताव
कुलपति के मुताबिक तृतीय व चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों ने विश्वविद्यालय परिसर में शिवाजी की मूर्ति स्थापित करने का प्रस्ताव दिया। जिसे मैंने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि वे सब मिलकर इस मूर्ति के रूप में विश्वविद्यालय को एक तोहफा देना चाहते हैं और इसके लिए योगदान भी करेंगे। मैंने उनका यह प्रस्ताव राज्यपाल के सामने रखा और उन्होंने अपनी अनुमति दे दी।
जब यह प्रस्ताव कुलाधिपति के समक्ष रखा गया तो हमने यह फैसला किया कि एक छोटी मूर्ति की जगह एक बड़ी मूर्ति लगाना अच्छा होगा। जिसके बाद यह फैसला हुआ कि हम मूर्ति के बनाने में कर्मचारियों से एक भी पैसा नहीं लेंगे। मूर्ति बनने में जितना भी खर्च आएगा वह विश्वविद्यालय से ही किया जाएगा।

दबे लफ्जों में हो रहा विरोध
विश्वविद्यालय में कई ऐसे शिक्षक और संगठन हैं जो खुले तौर पर तो नहीं पर दबी जुबान में इसका विरोध कर रहे हैं। कुछ का कहना है कि ऐसे कई महापुरुष हैं जो लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं उनकी मूर्ति क्यों नहीं लगाई जा रही है। कुछ का कहना है कि अगर शिवाजी का नाम लोगों को याद रखवाना है तो उनके नाम पर कुछ गरीब छात्रों को स्कॉलरशिप दें ताकि की वे भविष्य में कुछ बन जाएं तो वह शिवाजी को ज्यादा अच्छी तरह याद रखेंगे।

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