एलडीए में हर टेबल पर चढ़ता है चढ़ावा, तब खिसकती हैं फाइलें

  • रिश्वतखोरी के चलते वर्षों से एलडीए में डंप पड़ी हैं फाइलें
  • बाबुओं से लेकर अधिकारी तक का चढ़ावे में होता है हिस्सा

अंकुश जायसवाल
5लखनऊ। लखनऊ विकास प्राधिकरण में भ्रष्टïाचार इस कदर व्याप्त है कि यहां छोटे से लेकर बड़े स्तर तक के काम बिना रिश्वत के नहीं होते हैं। अधिकारियों को चढ़ावा दिए बिना आपकी कोई भी फाइल अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सकती। एलडीए के कर्मचारी और अधिकारी चढावे के इस कदर आदी हो चुके हैं कि उन्हें काम के सिलसिले में आने वाले लोगों से मुंह खोलकर चढ़ावा मांगने में भी शर्म नहीं आती है। ऐसे में यदि आप अपना कोई काम करवाने एलडीए जाएं, तो सबसे पहले बाबुओं और अधिकारियों के चढ़ावे का इंतजाम कर लें।
लखनऊ विकास प्राधिकरण में वर्षों से आवंटियों के साथ रूखा व्यवहार किया जाता है। यहां के कर्मचारी काम के सिलसिले में कार्यालय आने वाले लोगों से बहुत ही रुखे अंदाज में बातें करते हैं। आवंटियों से संबंधित फाइलों के रख-रखाव की जिम्मेदारी उस योजना से संबंधित बाबुओं की होती है। बाबुओं को ही फाइलों को कम्प्लीट कराकर रजिस्ट्री का कार्य कराना होता है। इसलिए आवंटियों को भी रजिस्ट्री के संबंध में बाबुओं से मिलकर फाइलों को तैयार कराने, किश्तों का सारा पैसा जमा करने और रजिस्ट्री कराने का काम करना होता है। लेकिन वर्षों से यहां के कलर्क बिना चढ़ावा के कोई काम नहीं करते हैं। कलर्क आवंटियों की फाइलों को लटकाये रखते हैं, उनकी फाइलों को अलग-अलग टेबल पर पहुंचाने और फाइनल करवाने के नाम पर लूटते रहते हैं। इसके लिए आवंटियों को बार-बार कार्यालय का चक्कर काटना पड़ता है। इन सब के पीछे बाबुओं के साथ-साथ अधिकारियों की भी मिली भगत होती है, जिसे विभाग के सारे उच्चाधिकारी जानते हैं। क्योंकि आवंटियों से मिलने वाले चढ़ावे में हर किसी का हिस्सा बंधा होता है। जबकि बाबू और अधिकारी चाहें तो किसी भी आवंटी की समस्या को जल्द से जल्द निपटाया जा सकता है। लेकिन सबको मालूम है कि किसी आवंटी का काम आसानी से निपट जायेगा, तो आवंटी से मोटी कमाई कर पाना आसान नहीं होगा।

वर्षों से चक्कर लगा रहे आवंटियों ने बताई आपबीती

लखनऊ विकास प्राधिकरण के वर्षों चक्कर काट चुके जानकीपुरम सेक्टर-एच के आवंटी विजय ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि बाबुओं की वजह से हमेशा उन्हें एलडीए में चार से पास घंटे का समय निकालकर आना पड़ता था। हर बार एलडीए आने पर खर्च के नाम पर पैसे लिये जाते थे और बिना खर्च के कोई काम ना होने की दुहाई दी जाती थी। यानि एक अधिकारी की स्वीकृति के लिए जब फाइल जाती थी, तो वह तीन-चार जगह से होकर गुजरती थी और हर जगह चढ़ावा देने के बाद ही फाइल पास होती थी। अगर चढ़ावा नहीं दिया गया तो फाइल वहीं पड़ी रहती थी। आवंटी अपनी फाइल के बारे में ज्यादा पूछताछ करता था, तो उसकी फाइल पर ऑब्जेक्शन लगकर वापस भेज दिया जाता था। इस तरह हर फाइल को एक चक्कर लगाने के लिए जगह-जगह खर्चा करना जरूरी था और बाबुओं की जेब गरम करना भी जरूरी थी। वरना फाइल बाबुओं की अलमारी में ही सालों साल पड़ी रहती। विजय बताते हैं कि एक तो एलडीए में आकर यहां घंटों बैठकर अपना समय बर्बाद करो। ऊपर से खर्चा करने के बावजूद भी सालों साल एलडीए के चक्कर काटो, तब जाकर काम होता है। उनका कहना है कि उन्होंने एक बार इसके लिए शिकायत करने का मन बनाया भी था, लेकिन उच्चाधिकारियों के सवालों को सुनने के बाद उनका सामना करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाये।

बाबुओं की कार्यप्रणाली से धूमिल हो रही एलडीए की छवि

एलडीए बाबुओं की इस तरह कार्य करने की प्रक्रिया से जहां एक तरफ एलडीए की छवि खराब हो रही है। वहीं दूसरी ओर आवंटियों का लखनऊ विकास प्राधिकरण पर से विश्वास उठता जा रहा है। लोगों का मानना है कि एलडीए में कोई काम बिना रिश्वत दिए नहीं होता है। इसके अलावा अपने काम के लिए लोगों को वर्षों यहां चक्कर लगाना पड़ता है। शायद इसीलिए एलडीए के आवासों के लिए पंजीकरण कराने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

क्या कहते हैं अधिकारी

इस तरह गैर जिम्मेदाराना रवैया कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
-डा. अनूप यादव, उपाध्यक्ष, एलडीए

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