एक संघर्ष भाषा के भीतर

पहली कविता लिखती स्त्री कौन थी? वह पहली मां रही होगी, जो अपने शिशु को दुलारने-सुलाने के लिए कुछ-कुछ गाने लगी होगी। त्योहार मनाते, अपने दैनंदिन काम करते वह गाती रही, गुनगुनाती रही और चिडिय़ा को चुगने के लिए डाले दानों की तरह कुछ गीत बच गये, कुछ बिखर गये, कुछ उड़ के कहीं और जा गिरे। उधर एक बाहर की दुनिया थी। खेती, व्यापार, विज्ञान, युद्ध भी था, जिसमें और उन सबके लिए भाषा रही। साहित्य भी। निरंतर विकसित हुई वह भाषा और दो रंग हो गये भाषा के।
लिपियां भी तो बनीं- ब्राह्मी, खरोष्ठी, देवनागिरी… उधर संस्कृत आम जन के भावों के करीब आयी तो विद्वानों ने कह दिया- बिगड़ गयी भाषा, यह अपभ्रंश है। फारसी सैन्य शिविरों मे उर्दू बन कर घर लौटी, तो जनता ने उसमें अवधी-भोजपुरी-पंजाबी और जाने कितने रंग भर दिये।
विद्वानों की त्यौरियां तननी ही थीं। पर फिक्र किसे थी? जनता ने अपने लिये अपनी भाषा बनायी और समूचे उत्तर भारत में हमारी हिंदी ऐसे ही विकसित हुई। जितना करीब आयी वह आम जन के, उतना ही फली-फूली। जितना बिगड़ी उतना खुली और खिली। जो करीब आया उसके गुण लिए, कुछ पराया न रहा, सबको आत्मसात किया, संस्कृत हो, उर्दू हो, अंगरेजी हो, अवधी हो, बुंदेली हो, ब्रज हो, मारवाड़ी हो… हिंदी ने सबसे लिया और दिया भी सभी को।
फिर हम लिखने बैठे इतिहास- भाषा और उसके साहित्य का। हिंदी का। मालूम हुआ कि खूब लिखा गया। सारे वीर काव्य, रासो काव्य, अमीर खुसरो, कबीर की साखियां, तुलसी का रामचरितमानस, दादू, रैदास, जायसी का सूफियाना इश्क, सूरदास के सरस पदों से लेकर शृंगारकाल और एक भारतीय नवजागरण काल का प्रचुर लेखन हिंदी साहित्य इतिहास के वृहद आकार में समा गया।
लेकिन, मालूम हुआ कि भाषा ने उतना अन्याय नहीं किया था स्त्री के साथ, जितना इतिहास ने किया। स्त्री का कहा सुना सब यहां नहीं दर्ज हुआ। मौखिक को इतिहास से बाहर कर दिया गया था। इतिहासकार का टॉर्च जहां-जहां नहीं पड़ा, उसने उन जगहों के अस्तित्व को ही नहीं माना। तो क्या जो भाषा के इतिहास में नहीं थी, वह भाषा में भी नहीं थी स्त्री? थी, बराबर मौजूद। सुमन राजे ने ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ लिख कर उन सबको खोज निकाला और डिजिटल हिंदी के युग में महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान की थाती संभाले भाषा, तकनीक और रचनात्मकता से लैस एक पूरी की पूरी नयी पीढ़ी उभर आयी।
सबसे बड़ी मुश्किल की बात थी कि जिस भाषा के भीतर हमारा सारा अस्मिता का संघर्ष है और जो भाषा इस संघर्ष में हथियार है वह भी हिंदी ही है। हम हिंदी के भीतर हिंदी होने के लिए संघर्षरत हैं। सर्वहारा वर्ग को छोड़ भी दें, तो अंगरेजी की बढ़ती हुई व्याप्ति के बावजूद मध्य और निम्न मध्य वर्ग की महिलाओं के लिए अब भी हिंदी ही अपनी भाषा है।
‘हिंदी दिवस’ सरकारी हिंदी दिवस ही हो सकता है, राजकीय हिंदी का शोक, जिसका मनाया जाना अक्सर भाषा प्रेमियों को एक असहायता के बोध से भर देता है। अंगरेजी को दर-बदर कर भी दें, तो शासकीय हिंदी भाषा से आम जन की दूरी उतनी ही बनी रहेगी। समाज की वंचित और उपेक्षित अस्मिताओं के लिए हिंदी का संकट ठीक से एक ऑफिशियल लैंग्वेज न बन पाने के संकट से अलहदा एक अस्तित्व का संकट है। यह संकट उस भाषा में अपने होने की गवाहियां तलाशना और दर्ज करना है, जिसमें उसे गढ़ा गया है और जिसे वह गढऩा चाहती है।
यह संकट पुरुषों द्वारा, पुरुषों के लिए विकसित पुरुषों की उस भाषा के बरक्स, जिसके बारे मे एंड्रिया ड्वार्किन कहती हैं कि ‘भाषा में पुरुष वर्चस्व को घुला मिला दिया गया है’, उन्हीं शब्दों-संज्ञाओं-सर्वनाओं-क्रियाओं से पुरुष वर्चस्व से मुक्त अपनी भाषा के निर्माण का है। सत्ता जिस तरह से पुरुष के साथ नत्थी रही है, उसने स्त्री की निम्नावस्था को इस प्रकार भाषा में गूंथ दिया कि कोमल और कमजोर सब दमित अस्मिताओं के साथ जुड़ गया और समानता की बात ही असंगत प्रतीत होने लगी। ‘मर्दाना’ स्त्री का विशेषण हो सकता है, गर्व की बात, लेकिन ‘जनाना’ में नकारात्मकता और अपमान ही क्यों व्यंजित होता है? क्यों हमारी भाषा में स्त्री केंद्रित गालियों की भरमार है।
सत्तर के दशक में विकसित हुई स्त्रीवाद की दूसरी धारा ने जेंडर पूर्वाग्रहों और वर्चस्व से रहित जिस स्त्री भाषा का सवाल उठाया था, हिंदी के संदर्भ में उस पर काम किया जाना अभी बाकी है। टेलीविजन पर ‘सिया के राम’ जैसा धारावाहिक देखते हुए कोई बच्ची पूछ ले कि सीता राम को स्वामी क्यों कहती हैं, तो कोई पढ़ी-लिखी नौकरीशुदा मां शर्मिंदा ही हो सकती है अपनी भाषा पर। भाषा में अपनी स्थिति पर। पति भी मालिक ही है। ऐसे में जब बोली जाने वाली भाषा अपने ही अस्तित्व के नकार में खड़ी हो, तो स्त्री-लेखन की चुनौती और भी बढ़ जाती है।
तकनीक हिंदी के साथ मिल कर स्त्री के लिए बहुत मददगार साबित हुई। हिंदी यूनीकोड हुई, तो ब्लॉगिंग में बहार आ गयी। चि_ा लिखनेवाली स्त्रियां न सिर्फ यह तय करने लगीं कि क्या लिखेंगी, बल्कि क्यों लिखती हैं इसका भी विचार करने लगीं। यहां न तो एक खास तरह की भाषा और शिल्प के अभ्यस्त संपादक का रौब था, न ही साहित्य में अमर हो जाने की कोई दुर्दमनीय आकांक्षा। यहां एक जिद थी- सदियों से रोकी हुई भावनाओं की अभिव्यक्ति की, जैसी थीं वे वैसी ही अनगढ़, कच्ची और उद्दाम। यह सवर्ण पुरुषों की बनायी मुख्यधारा से अलग थी, तो जाहिर है इसे शुरुआत में उपेक्षा ही मिली।
लेकिन, वे न डरीं न डिगीं और अंतत: सकुचाते-सकुचाते उन्हें मान्यता देनी ही पड़ी मुख्यधारा को। भाषा का जेंडर पक्ष अब तकनीक के उल्लेख के बिना नहीं लिखा जा सकेगा।
दिये गये शब्द भंडार में से स्त्री के लिए अपनी भाषा गढऩे की राह आसान नहीं। सदियों के भाषाई प्रशिक्षण के बाद भाषा को जेंडर-न्यूट्रल बना पाना भी आसान नहीं। लेकिन, सच यह है कि वंचना के खिलाफ एक लड़ाई भाषा के भीतर भी होती है, और वह लड़े और जीते बिना न यह हिंदी हमारी हो सकती है, न हिंदी दिवस।

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