एक तरफ सरकार तो दूसरी तरफ संस्थाएं

राष्ट्रीय फिल्म एवं टेलीविजन प्रशिक्षण संस्थान, पुणे याने एफटीटीआई के शासी निकाय के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति सत्ता के अहंकार का एक उदाहरण है। यह हमें पता है कि एफटीटीआई जैसे संस्थान में दैनंदिन कामकाज पूर्णकालिक वेतनभोगी निदेशक के जिम्मे होता है जबकि अध्यक्ष का काम मुख्यत: शासी निकाय की बैठक की अध्यक्षता करना एवं समय-समय पर नीतिगत मार्गदर्शन करना होता है।

 ललित सुरजन
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 15 अगस्त 2014 को लालकिले की प्राचीर से पहिले उद्बोधन में अन्य घोषणाओं के बीच दूरगामी परिणामों वाली एक बड़ी घोषणा योजना आयोग को समाप्त करने की थी। इस 15 अगस्त को भी क्या वे ऐसी कोई चौंकाने वाली घोषणा करेंगे? या शायद उसकी आवश्यकता नहीं है? मोदी सरकार ने विगत एक वर्ष के दौरान नेहरू युग अथवा नेहरू परंपरा की अनेक संस्थाओं को जिस तरीके से विसर्जित, खंडित या परिवर्तित किया है, वह देश के सामने है। बीते स्वाधीनता दिवस पर संभवत: प्रधानमंत्री के मन में यह विचार रहा हो कि अपने पहिले संबोधन में उन्हें ऐसी कोई बात कहना चाहिए जिसकी व्यापक स्तर पर चर्चा हो सके। इस दरमियान उनकी मुखरता का स्थान मौन ने ले लिया है। दिल्ली के अनुभव से वे शायद यह जान गए हैं कि हर काम घोषणा करके करना जरूरी नहीं है। जो काम चुपचाप किया जा सकता है, उसमें व्यर्थ प्रचार क्यों किया जाए? इसीलिए योजना आयोग को विघटित करने के अलावा ऐसे कई अन्य निर्णय इस बीच लागू कर दिए गए, जिन पर आम जनता को गौर करने का अवसर ही नहीं मिला।
मैं यह स्वीकार करता हूं कि लोकतंत्र में एक चुनी हुई सरकार को अपनी नीतियों व सिद्धांतों के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार होता है। इसमें यह भी शामिल है कि सरकार अपने अधीनस्थ संस्थाओं का संचालन भी अपनी इच्छा से करे व शीर्ष पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति करे जो उसके अनुकूल हों। लेकिन लोकतंत्र का अर्थ बहुमतवाद नहीं होता, इस सत्य को ध्यान में रखकर सरकार का यह उत्तरदायित्व भी बनता है कि इन संस्थाओं के जो मूल लक्ष्य हैं, उनकी अनदेखी न की जाए तथा संचालन उन व्यक्तियों के हाथों में हो, जो अपनी वैचारिक/सांगठनिक प्रतिबद्धता के बावजूद उस विषय विशेष में निपुण हों।
राष्ट्रीय फिल्म एवं टेलीविजन प्रशिक्षण संस्थान, पुणे याने एफटीटीआई के शासी निकाय के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति सत्ता के अहंकार का एक उदाहरण है। यह हमें पता है कि एफटीटीआई जैसे संस्थान में दैनंदिन कामकाज पूर्णकालिक वेतनभोगी निदेशक के जिम्मे होता है जबकि अध्यक्ष का काम मुख्यत: शासी निकाय की बैठक की अध्यक्षता करना एवं समय-समय पर नीतिगत मार्गदर्शन करना होता है। आज तक इस संस्थान में जो अध्यक्ष हुए, वे सिने जगत के कद्दावर व्यक्ति थे। उन्हें अपने ज्ञान एवं अनुभव के बल पर प्रतिष्ठा हासिल की थी। देश-विदेश में जहां भी मौका हो, उनके नाम से संस्थान की भी प्रतिष्ठा वृद्धि होती थी। आज गजेंद्र चौहान के अध्यक्ष बनने एवं साथ-साथ संघ से जुड़े कुछ गैर-फिल्मी लोगों के सदस्य बनने से आशंका उपजती है कि एक सरकारी सेवक याने निदेशक जो मर्जी आएगी, वैसा काम करेगा व शासी निकाय सम्यक समझ व अनुभव के अभाव में उसके प्रस्तावों की पुष्टि मात्र करने तक सीमित रह जाएगा। जो छात्र इस नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह कहकर डराया जा रहा है कि सरकार संस्थान को ही विघटित कर देगी। यह भूलकर कि संस्था तोडऩा आसान है, संस्था खड़ी करना उतना ही दुष्कर।
एक अन्य प्रसंग जिसमें पुस्तकों में अपनी रुचि के चलते मुझे पीड़ा हुई है, वह है राष्ट्रीय पुस्तक न्यास-याने एनबीटी के अध्यक्ष पद पर हुई नियुक्ति। एनबीटी ने विगत पांच दशकों में पुस्तकों के प्रति आम जनता की रुचि बढ़ाने के लिए यथेष्ट काम किया है। तमाम भारतीय भाषाओं में न्यास पुस्तकें छापता है एवं सस्ते दामों पर बिक्री हेतु उपलब्ध कराता है। उसकी मोबाइल वैन पूरे देश का सफर करती हैं तथा स्थान-स्थान पर बिक्री के लिए स्टॉल लगाती है। अगर आप किसी को पुस्तकें भेंट देना चाहते हैं तो बेहिचक एनबीटी के सुंदर प्रकाशनों का सैट भेंट कर सकते हैं। इसके अध्यक्ष पद पर भी किसी ऐसी शख्सियत की नियुक्ति होना चाहिए थी, जो लेखन-प्रकाशन के बारे में भरपूर जानकारी रखता हो। मोदी सरकार चाहती तो नरेन्द्र कोहली, महीप सिंह, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे किसी ख्यातिनाम लेखक को यह दायित्व दे सकती थी। ऐसा कोई व्यक्ति अध्यक्ष होता तो पुस्तक-प्रेमी समाज में सही संदेश जाता।

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