उभरते वैश्विक संकट से लडऩे की रणनीति

मोदी की आंतरिक आर्थिक नीति घातक है। सरकार का दबाव निवेश बढ़ाने पर है, जैसे किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी आटोमेटिक सुलजर लूम लगाकर कपड़े का उत्पादन किया जाए। सही है कि इससे उत्पादित कपड़े का दाम न्यून होगा। उपभोक्ता को सस्ता कपड़ा मिल जायेगा। परन्तु दुकान में टंगा सस्ता कपड़ा किस काम का, जब जेब में पैसा ही न हो?

 डॉ. भरत झुनझुनवाला
पिछले माह में विश्व अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल गई है। पहले ग्रीस का संकट आया। उस देश ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से लिए डेढ़ अरब डॉलर के ऋण का रिपेमेंट नहीं किया। आने वाले समय में लगभग दस अरब डॉलर के ऋण का रिपेमेंट ड्यू होने को है, जिसका पेमेंट भी वह देश नहीं कर पायेगा। फिलहाल ग्रीस तथा यूरोपीय यूनियन के बीच समझौता हो गया है, यह समझौता टिकाऊ नहीं होगा इसमें संशय है। पिछले माह ही चीन के शेयर बाजार में भारी गिरावट आई है। पिछले एक साल में उस देश के शेयर बाजार में ढाई गुना वृद्धि हुई थी। पिछले माह इसमें 30 प्रतिशत की गिरावट आई है। इस गिरावट के बावजूद चीन का शेयर बाजार पिछले वर्ष की तुलना में 75 प्रतिशत ऊंचा है। परन्तु निवेशकों को भय है कि गिरावट का दौर जारी रहेगा। इन दोनों संकट की जड़ में विकसित देशों की शिथिल पड़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं।
विकसित देशों के समूह में अमेरिका, यूरोप तथा जापान शामिल है। इस सम्पूर्ण समूह को देखें तो इनकी अर्थव्यवस्थाएं शिथिल हैं। हां, अमेरिका तथा जर्मनी अभी भी सुदृढ़ हंै। इन दो देशों की इस सुदृढ़ता से भ्रमित नहीं होना चाहिए। हारने वाली टीम में बैट्समैन चमकता है, उसी प्रकार ये दो देश चमक रहे हैं। वर्तमान समय में यह कहना कठिन है कि ग्रीस तथा चीन का उभरता संकट सम्पूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपनी गिरफ्त में ले लेगा अथवा इन दो देशों तक सीमित रह जायेगा। बहरहाल, इतना स्पष्ट है कि विश्व अर्थव्यवस्था में सबकुछ ठीक नहीं है।
विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएं मंदी में चल रही हैं। इन्हीं से आशा की जा रही है कि वे भारत को उबारेंगी जैसे जो खिलाड़ी कैंसर से पीडि़त हो उसी से यह आशा की जाए कि वह टीम को जितायेगा। सरकार की यह नीति पूरी तरह असफल होगी। पिछले छह माह में विदेशी निवेश में वृद्धि नहीं हुई है जबकि निर्यात में गिरावट जारी है। ऐसे में विकसित देशों की बीमार अर्थव्यवस्था के पीछे भागने के स्थान पर मोदी सरकार को अन्तर्मुखी पालिसी लागू करनी चाहिए।
मोदी की आंतरिक आर्थिक नीति घातक है। सरकार का दबाव निवेश बढ़ाने पर है, जैसे किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी आटोमेटिक सुलजर लूम लगाकर कपड़े का उत्पादन किया जाए। सही है कि इससे उत्पादित कपड़े का दाम न्यून होगा। उपभोक्ता को सस्ता कपड़ा मिल जायेगा। परन्तु दुकान में टंगा सस्ता कपड़ा किस काम का, जब जेब में पैसा ही न हो? आटोमेटिक लूम के द्वारा कपड़े का उत्पादन करने से श्रमिकों की जरूरत कम ही पड़ेगी। 20 पावरलूम का काम एक सुलजर लूम कर देता है। पावरलूम में लगे 20 श्रमिक बेरोजगार हो जायेंगे। इनकी क्रय शक्ति घटेगी और बाजार में कपड़े की मांग घटेगी। मंैने कई दुकानदारों से पूछा तो सबने एक ही स्वर में बताया कि पिछले साल की तुलना में बिक्री 20 प्रतिशत कम हो रही है। प्रापर्टी मार्केट का तो ज्यादा ही खस्ता हाल है। दाम 30 प्रतिशत टूट चुके हैं।
इस गिरावट के तीन कारण हैं। पहला कारण निर्यातों में ठहराव है। इसके कारण कम्पनियां माल को घरेलू मार्केट में ठेल रही हैं और दाम टूट रहे हैं। यद्यपि होलसेलर तथा रिटेलर द्वारा बढ़े मार्जिन वसूल करने से दाम भी साथ-साथ बढ़ रहे हैं। दूसरा कारण आम आदमी की क्रयशक्ति का ह्रास है। सरकार बड़ी कम्पनियों के द्वारा आटोमेटिक मशीनों से उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। आम उपभोक्ता के हाथ में पैसा नहीं है कि वह बाजार से माल खरीद सके। तीसरा कारण भ्रष्टाचार में कमी है। यूपीए सरकार के समय में कालाधन प्रचुर मात्रा में फैला हुआ था। यह कालाधन प्रापर्टी में लग रहा था।
मोदी सरकार को अपनी इकोनामिक स्ट्रेटजी में मौलिक परिवर्तन करना चाहिए। देश के आम आदमी की क्रयशक्ति बढ़ानी चाहिए। सरकार को चाहिए कि देश में रोजगार बढ़ाने का कार्यक्रम हाथ में ले। जैसे आटोमेटिक सुलजर लूम को बढ़ावा देने के स्थान पर सभी पावरलूम पर भारी टैक्स लगा दे। तब हाथकरघा चल निकलेगा, तमाम लोग कपड़ा बुनने का काम करेंगे। उनके हाथ में पैसा आयेगा। वे बाजार से माल खरीदेंगे और अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। साथ-साथ निवेश के सभी प्रस्तावों की रोजगार आडिट कराना चाहिए। सुलजर लूम चलाने में 200 लोगों के रोजगार सृजन के साथ यह भी देखना चाहिए कि कितने पावरलूम बन्द हो जायेंगे। निवेश के उन्हीं प्रस्तावों को स्वीकृति देनी चाहिए, जिनका रोजगार पर अप्रत्यक्ष निगेटिव असर न पड़े। दूसरे, बुलेट ट्रेन के स्थान पर झुग्गियों में सडक़, नाली और बिजली, पानी की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे झुग्गियों में बिस्कुट और लिफाफे बनाने वालों को धंधा करने में सहूलियत होगी। उसका माल बाजार में बिकेगा और उनके हाथ में आई क्रय शक्ति से जमीनी स्तर पर मांग में वृद्धि होगी।

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