उपचुनाव परिणामों पर कांग्रेस को करना चाहिए आत्मचिंतन

उपचुनाव किसी सरकार के क्रिया कलापों पर जनमत संग्रह नहीं होते, न ही इनके आधार पर निर्णायक निष्कर्ष निकाले जाते हैं। यह भी देखा गया कि प्राय: प्रदेश में सत्तारूढ़ दल उपचुनाव में बाजी मारते हैं, किन्तु अभी संपन्न हुए बारह क्षेत्रों के उपचुनाव सामान्य स्थिति में नहीं हुए थे। देश में पहली बार कालेधन के खिलाफ इतना बड़ा अभियान चलाया गया था। विपक्षी पार्टियों का यह कहना सही था कि सरकार ने देश को लाइन में लगवा दिया। विपक्ष का केन्द्र सरकार विरोधी अभियान चरम पर था। वह आमजन की परेशानी पर पूरी ताकत से सरकार पर हमला बोल रहा था। ऐसी परिस्थितियों में हुए उपचुनावों का विश्लेषण अवश्य किया जा सकता है। जहां भाजपा के अभी पैर नहीं जमे हैं, जहां परंपरागत रूप में वह मुख्य मुकाबले से बाहर रहती है, वहां के संदेश एकमात्र राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लिए चिन्ताजनक हैं। जहां भाजपा मुख्य मुकाबले में रहती है, वहां विपक्ष के नोटबन्दी विरोधी अभियान का आमजन पर असर नहीं पड़ा उसने परेशानी सहने के बावजूद भाजपा का समर्थन किया। कांग्रेस को सभी जगह निराशा मिली। उसे मात्र एक सीट पर संतोष करना पड़ा।
पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में भाजपा मुख्य मुकाबले से बाहर थी। यह कोई नई बात नहीं थी। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस व वामपंथी विकल्प पेश करने के दावेदार रहे हैं, लेकिन तृणमूल जैसी क्षेत्रीय पार्टी के पदचिन्हों पर चलना कांग्रेस व वामपंथी दलों को भारी पड़ा। अनेक मसलों पर ये विपक्षी पार्टियां तृणमूल से अलग रूख अपनाने का साहस नहीं दिखा सकतीं। मालदा में एक वर्ग के लोगों ने खुलेआम हिंसा फैलाई। सरकार इन्हें रोकने में नाकाम रही। कांग्रेस और वामपंथियों के लिए यह सरकार पर हमला बोलने का अवसर था लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते वह ऐसा नहीं कर सके। इस प्रकार यह विपक्षी खेमा सत्तारूढ़ तृणमूल की बी टीम बनकर रह गया। इसके बाद एक जुलूस की वजह से प्रदेश सरकार ने कुछ स्थानों पर दुर्गा पूजा पर रोक लगा दी थी। गैर भाजपा विपक्षी पार्टियां खामोश रहीं। वोट बैंक की राजनीति में वह तृणमूल के पीछे दिखाई दीं। इसका खामियाजा कांग्रेस व वामपंथी दोनों पार्टियों को उठाना था। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री व तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने दिल्ली पहुंचकर नोटबन्दी विरोधी मोर्चा की कमान संभालने का प्रयास किया। राष्ट्रपति को ज्ञापन देते समय कांग्रेस ने उनसे किनारा कर लिया, लेकिन धरने के समय कांग्रेस दौड़ पड़ी। यहां ममता बनर्जी की ज्यादा चर्चा हुई। कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े पिछड़ गए। विपक्षी राष्ट्रीय पार्टी कहां जा रही हैं, यह साफ दिखाई दे रहा है।
भाजपा के लिए संतोष का विषय यह है कि पश्चिम बंगाल में हुए उपचुनावों में उसके वोट पहले के मुकाबले बढ़े हैं। तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक का जादू चला। यह पार्टी नोट बंदी पर विपक्षी अभियान में शामिल नहीं है। कांग्रेस को यहां भी निराशा मिली। मध्य प्रदेश का परिणाम तो कांग्रेस के लिए आत्मचिंतन का विषय होना चाहिए। चुनाव प्रचार में उसने नोटबंदी को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। आमजन की तकलीफ पर अपनी संवेदना उड़ेल दी। जब कांग्रेस का अभियान चरम पर था, राहुल गांधी लाइन में लग कर चार हजार रुपये निकलवा रहे थे। मध्य प्रदेश के चुनाव वाले क्षेत्रों में इस दृश्य का प्रचार हो रहा था। दिग्विजय सिंह भी मध्य प्रदेश के हैं। इसके ठीक पहले कांग्रेस ने भोपाल मुठभेड़ पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था। इसमें आठ आतंकी मार गिराए गए थे। कांग्रेस को लग रहा था कि आतंकी मुठभेड़ व नोटबंदी के मुद्दे उसे उपचुनाव में बढ़त दिला देंगे, जबकि यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में था लेकिन उसे निराशा मिली। मतलब साफ है- जहां भाजपा से कांग्रेस का सीधा मुकाबला था, वहां उसे शिकस्त मिली। कांग्रेस के मुद्दे यहां नहीं चले। जहां भाजपा नहीं थी, वहां कांग्रेस विपक्षी पार्टी की भूमिका निभाने में विफल है। वोट बैंक की राजनीति में वह उलझ कर रह गयी है। अलग राह तलाशना उसके लिए मुश्किल हो रहा है। खासतौर पर ममता बनर्जी के लिए यह बड़ी राहत की बात है। वह कांग्रेस और वामपंथी दोनों को लेकर निश्चित है। ममता बनर्जी जो करती हैं, ये विपक्षी पार्टियां उसके पीछे-पीछे चल देती हैं।
उपचुनावों का यह बड़ा निष्कर्ष है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस जिस दिशा में बढ़ रही है, उसका खामियाजा सामने आ रहा है। एक समय था जब अरूणाचल जैसे पूर्वोत्तर के प्रदेश भाजपा की पहुंच से बाहर माने जाते थे। यहां कांग्रेस का प्रभाव हुआ करता था, लेकिन अभी हुए एक विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में यहां भाजपा ने जीत दर्ज कराई है। कांग्रेस पुडुचेरी की नल्लीथोप्पे सीट जीत कर ही संतोष कर सकती है। शेष जगह वह ठीक प्रदर्शन नहीं कर सकी। भाजपा जहां पराजित हुई, वहां भी वह संतोष व्यक्त कर सकती है। पश्चिम बंगाल में कुछ समय पहले उसका खास अस्तित्व ही नहीं था। कूचबिहार में भाजपा को बीस वार्डों में बढ़त मिली। नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में वह सबसे आगे थी। इस लोकसभा क्षेत्र में तृणमूल जीती। इस बार बारह क्षेत्रों के उपचुनाव विश्लेषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। पूरे देश में नोटबंदी की धूम थी। उपचुनाव अप्रत्याशित माहौल में हुए। नोटबंदी के ग्यारह दिन बाद वोट पड़े थे। कांग्रेस को इतने हंगामे के बाद क्या हासिल हुआ, इस पर उसे विचार करना चाहिए। वह राष्ट्रीय दल भाजपा का मुकाबला नहीं कर पा रही है। वह क्षेत्रीय दलों के पीछे चलती दिखाई दे रही है लेकिन लगता नहीं कि कांग्रेस इस पर आत्मचिंतन करेगी।

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