उत्तर आधुनिकता और लोकतंत्र

उत्तर आधुनिकता ने जब सामाजिक व्यवहार, सामाजिक सोच और किसी विचार को नये सिरे से सोचने का काम किया है तो हमारी राजनीति व राजनीतिक आचरण व व्यवहार कैसे उत्तर आधुनिकता के विचार प्रभाव से अछूते रह सकते हंै। अत: हमारे देश में राजनीतिक व्यवहार आज उत्तर आधुनिकता के प्रभाव में चल रहे हैं।

 प्रभाकर चौबे
भारतीय ‘लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवहार’ अब उत्तर आधुनिक काल में प्रवेश कर गया है इसलिए अब राजनीतिक व्यवहार उत्तर आधुनिक टूल्स के द्वारा संचालित हो रहे हैं। उत्तर आधुनिक व्यवहार राजनीति को संचालित कर रहा है। उत्तर आधुनिकता जब हमारे समस्त व्यवहारों को परिचालित कर रहा है तो राजनीतिक व्यवहार उसकी पकड़ से बाहर किस तरह रह सकता है। इसलिए आज हमारा राजनीतिक तंत्र उत्तर आधुनिकता के प्रभाव क्षेत्र में है। लोकतंत्र आधुनिक विचार है और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था आधुनिक व्यवस्था है। इसने मनुष्य को अपने होने की पहचान दी। वैसे संत कवियों ने मनुष्य को मनुष्य होने की अनुभूति प्रदान करने का उपक्रम किया लेकिन विभिन्न दबावों के चलते मनुष्य की वह पहचान या उस स्तर की पहचान नहीं मिली जो उसे मिलनी चाहिए थी। यह पहचान आधुनिक लोकतंत्र ने दी है। लेकिन इस बुर्जुआ लोकतंत्र ने आदमी को अपने हित में हमेशा उपयोगी बनाए रखने के लिए बड़ा षडय़ंत्र भी किया और इसी षडय़ंत्र के तहत लोकतंत्र में आदमी को ‘एक वोटर’ में रूपांतरित कर दिया। लोकतंत्र में राजनेता कहते हैं-‘वे हमारे वोटर हैं’, ‘वह एरिया हमारा है’, ‘वह इलाका हमारे वोटर का है।’ इस तरह आधुनिक लोकतंत्र ने आदमी को पहचान तो दी लेकिन ‘गरिमा’ नहीं दी। वह राजनीति के द्वारा पहचान बनाने विवश कर दिया गया है। जिस तरह आधुनिक युग ने कई सुविधाएं दी हैं लेकिन आदमी को उन सुविधाओं का पिछलग्गू बना दिया है या कहें उन सुविधाओं के उपभोग के द्वारा पहचाना जाने विवश कर दिया है। उसी तरह लोकतंत्र में भी इस व्यवस्था ने लोकतंत्र की जरूरत के अनुरूप आदमी की पहचान निर्धारित कर दी है। आज आदमी ‘पहचान पत्र’ के द्वारा पहचाना जाता है और ‘आधार कार्ड’ उसकी जरूरतों का दादा बन रहा है। आज मल्टी फ्लैक्स में रहने वाला कोई व्यक्ति अपने नाम से नहीं बल्कि फ्लैट नम्बर से पहचाना जाता है। जैसे कहो कि नम्बर 316 वाले शर्मा या गार्ड पूछे किन रामदयालजी से मिलना है- ब्लाक नम्बर और फ्लैट नम्बर बताइए। मोहनलाल जी ब्लाक-2 के सेकंड फ्लोर के 104 नम्बर फ्लैट में रहते हैं। आप नाम से उन्हें नहीं खोज सकते वे फ्लैट नम्बर से पहचाने जाएंगे। इस उत्तर आधुनिकता ने अपने मूल्यों में इतनी तब्दीलियां ला दी हैं कि कभी-कभी इस उत्तर आधुनिकता की परिधि से बाहर विचार करने वालों को कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। सबसे बड़ी परेशानी तो यही कि वह उत्तर आधुनिक समाज से बाहर किसी अन्य लोक का प्राणी मान लिया जाने विवश होता है। लोग उसे अब केवल पिछड़ा हुआ ही नहीं मानते वरन् ऐसों के वे आदमी तक मानने से इंकार कर सकते हैं। वह समाज में ‘गैरजरूरी वस्तु’ की तरह पड़े रहने छोड़ दिया जाता है।
उत्तर आधुनिकता ने जब सामाजिक व्यवहार, सामाजिक सोच और किसी विचार को नये सिरे से सोचने का काम किया है तो हमारी राजनीति व राजनीतिक आचरण व व्यवहार कैसे उत्तर आधुनिकता के विचार प्रभाव से अछूते रह सकते हंै। अत: हमारे देश में राजनीतिक व्यवहार आज उत्तर आधुनिकता के प्रभाव में चल रहे हैं। यह सवाल टेढ़ा है और इसका उत्तर किसी एक अखबार के कालम में नहीं समा सकता। इसके लिए बड़े रिसर्च की जरूरत है। बहरहाल मोटे तौर पर लगता यह है कि आज के समय इस लोकतांत्रिक व्यवहार को, राजनीतिक जरूरतों को 40-50 वर्ष पूर्व के नजरिये से नहीं समझा जा सकता और न ही जनता का मतलब उस रूप में समझा जा सकता जिस रूप में लोकतंत्र में उसने प्रारंभिक काल में जनता का अर्थ था। आज उत्तर आधुनिकता ने आदमी को घोर आत्मकेंद्रित उपभोक्तावादी बना दिया है और आज के समय लोकतंत्र में अपना हिस्सा लेने संघर्ष में लगे लोग इस ‘आत्मकेंद्रित उपभोक्तावादी’ का किस तरह उपयोग करें यह जान कर अपनी रणनीतियां तय कर रहे हैं। जो आज भी 40-50 वर्ष पूर्व की समझ को लेकर आज की राजनीति में अपनी रणनीति बना रहे हैं वे समग्रता की उपलब्धि में पीछे ही जा रहे हैं- भले कुछ सीटों का ‘कम-ज्यादा’ रोना चलता रहे और इसी में खुश होते रहें। लेकिन जिस उद्देश्य के लिए वे राजनीति कर रहे हैं- जनता की चेतना के विकास का सपना देख रहे हैं, यह उस पुरानी सोच से कभी पूरा नहीं हो सकता। आज की राजनीतिक लड़ाई पुराने औजार से नहीं लड़ी जा सकती- लडऩे का या संघर्ष जारी है, का गुमान भले पालते रहें। आज पूंजीवाद नेे भी अपना चरित्र ‘उत्तर आधुनिकता’ की जरूरत के अनुरूप बदला है। जब सब बदल रहा है तो राजनीतिक तौर-तरीके भी बदलेंगे। यह अनायास नहीं है कि अब ‘पूंजीवाद मुर्दाबाद’ या ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ के नारे कम होते गए हैं और एक तरह से खत्म भी हो रहे, यह भी कह सकते हैं। यह भी विचार करना चाहिए कि अब ‘वेलफेयर स्टेट’ शब्द किस तरह चलन से बाहर कर दिया गया और उत्तर आधुनिकता में उद्योगों को समाज में अपना दायित्व निभाने के लिए विवश-सा किया गया है जिससे जनता को पूंजीवाद के खिलाफ मन बनाने से रोकने में मदद मिले- अब एक नया शब्द गढ़ा गया है- सीएसआर मतलब इसके तहत एक निश्चित प्रतिशत राशि उद्योग सामाजिक उद्देश्यों के लिए खर्च करे या दे।

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