उत्तराखंड में हाईकोर्ट के फैसले से भाजपा बैकफुट पर

  • हाईकोर्ट ने हटाया राष्टपति शासन
  • हरीश रावत सरकार की बहाली एक ऐतिहासिक फैसला
  • भाजपा की छवि मामले को लेकर हुई तार-तार

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
देहरादून। केंद्र सरकार को झटका देते हुए नैनीताल हाईकोर्ट ने गुरुवार को राज्य में लागू राष्टï्रपति शासन हटा दिया। अपने ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने राज्य में 18 मार्च की यथास्थिति कायम करने का आदेश दिया। मामले में अब भाजपा पूरी तरह से बैकफुट पर जाती दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं इससे पूरी पार्टी में गलत संदेश जा रहा है। उत्तराखंड प्रकरण से यूपी की राजनीति भी प्रभावित होती दिख रही है। जनता की चुनी हुई सरकार को बिना बहुमत साबित करने का मौका दिए बर्खास्त करने का यह मामला लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
हरीश रावत सरकार की बहाली के साथ एक बार फिर कांग्रेस को संजीवनी मिल गई है। सरकार की बहाली के बाद रावत सरकार ने कैबिनेट की बैठक बुलाई और कई फैसलों को मंजूरी दी। इसमें करीब आधा दर्जन निर्णय लिए गए। इस तरह से रावत सरकार ने फिर अपना कार्य भार पूरी तरह संभाल लिया। मामले में आई हाईकोर्ट के न्यायधीशों की टिप्पणी जनता के बीच चर्चा का केंद्र बन गई है। राष्टï्रपति राजा नहीं है उनके फैसले की समीक्षा की जा सकती है यह जनतंत्र की एक बेहतरीन नजीर पेश करती टिप्पणी है।
मामले में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोसफ और जस्टिस वीके बिष्ट की बेंच ने पहले अपना फैसला रिजर्व रखने का निर्णय लिया था लेकिन जब केंद्र सरकार के वकील ये आश्वासन देने को तैयार नहीं हुए कि फैसले से पहले राष्टï्रपति शासन हटाकर नई सरकार बनाने की कोशिशें नहीं होंगी, तो उन्होंने अपना फैसला सुनाया। दरअसल चीफ जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस वीके बिष्ट की बेंच ने फैसले से पहले कहा कि वो केंद्र सरकार की कार्रवाई से आहत हैं। चीफ जस्टिस ने कहा कि उत्तराखंड में राष्टï्रपति शासन के मामले में केंद्र सरकार को निष्पक्ष होना चाहिए लेकिन वो प्राइवेट पार्टी जैसा व्यवहार कर रही है। हम आहत हैं कि केंद्र सरकार ऐसा व्यवहार कर रही है। आप कोर्ट के साथ ऐसा खेल खेलने की कैसे सोच सकते हैं। चीफ जस्टिस ने ये भी कहा कि अगर केंद्र सरकार राष्टï्रपति शासन खत्म कर सरकार बनाने की कोशिश करती है तो ये न्याय का उपहास होगा। न्यायालय की यह टिप्पणी अपने आप में सभी के लिए एक संदेश के तौर पर है। यह पहले की कांग्रेस की सरकार के लिए भी सबक है जिसने कर्नाटक के एस आर बोम्मई की सरकार बर्खास्त किया था। मामले में एस आर बोम्मई अगर सुप्रीम कोर्ट न गए होते तो आज यह फैसला कांग्रेस के काम नहीं आता।
हालांकि 29 अप्रैल को हरीश रावत सरकार अपना बहुमत साबित करेगी। कांग्रेस के 9 बागी विधायकों में 23 अप्रैल को इसकी सुनवाई होगी। अगर ऐसे में 9 विधायकों की सदस्यता बहाल हो गई तो रावत के लिए मुश्किल हो सकती है। लेकिन सियासी उठापटक के बीच जो भाजपा की छवि तार-तार हो गई है उसकी भरपाई करना अब पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में राज्य के राष्टï्रपति शासन से हुआ उठापटक भाजपा को बैकफुट पर ले जा रहा है।

हाईकोर्ट में क्यों गया था ये मामला?
कांग्रेस में बगावत के बाद 18 मार्च को उत्तराखंड असेंबली में बजट का बिल पास कराने के दौरान कॉन्ट्रोवर्सी हुई थी। बागी विधायकों का दावा था कि बिल पास नहीं हो सका है और कांग्रेस बहुमत खो चुकी है। हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने पहले 28 मार्च को फ्लोर टेस्ट कराने को कहा था। लेकिन 27 मार्च को ही केंद्र ने यहां प्रेसिडेंट रूल लगा दिया। कांग्रेस ने फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बेंच ने 31 मार्च को टेस्ट कराने को कहा। लेकिन केंद्र ने इसके खिलाफ अपील कर दी। तब से हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही थी।
कांग्रेस के पास क्या हैं ऑप्शंस?
71 मेंबर्स की असेंबली में कांग्रेस के 36 में से 9 विधायक बागी हो गए थे। उनके डिस्क्वॉलिफिकेशन को हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। बहुमत के लिए अब 62 में से 32 विधायकों की जरूरत होगी। रावत का दावा है कि कांग्रेस के 27 विधायकों समेत 3 निर्दलीय, बीएसपी के 2 और यूकेडी (उत्तराखंड क्रांति दल) का एक विधायक उनकेसाथ है।

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