उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन केंद्र का बड़ा राजनीतिक कदम

नीरज कुमार दुबे

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन केंद्र सरकार का एक बड़ा राजनीतिक कदम है। मुख्यमंत्री के बहुमत साबित करने से एक दिन पहले लगाये गये राष्ट्रपति शासन के फैसले ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। केंद्र के इस एक कदम से विपक्षी एकता और मजबूत हो गयी है साथ ही संसद के जारी बजट सत्र के दौरान सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अरुणाचल प्रदेश के बाद यह लगातार दूसरा ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस की सरकार को झटका लगा है। हालांकि यह झटके कांग्रेस को खुद उसके ही विधायकों ने लगाये लेकिन सरकार को अस्थिर करने का आरोप भाजपा पर लगाया जा रहा है। अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन के बाद जो सरकार बनी है उसका नेतृत्व कांग्रेस के ही असंतुष्ट कर रहे हैं जबकि उत्तराखंड में भी इस बात की प्रबल संभावना है कि अरुणाचल की तरह कांग्रेस के असंतुष्टों के नेतृत्व में सरकार बन जाए

कांग्रेस सरकार पर जब संकट के बादल मंडराए तभी यह साफ हो गया था कि हरीश रावत मुख्यमंत्री के रूप में सभी गुटों को साथ लेकर चलने में सफल नहीं रहे हैं। एक समय रावत की वजह से ही विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ा था और कमोबेश वैसी ही स्थिति का सामना रावत को भी करना पड़ा। एक कहावत भी है- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय। उत्तराखंड में पिछले विधानसभा चुनावों के बाद जब कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी तभी मुख्यमंत्री के रूप में पहली पसंद रावत ही माने जा रहे थे लेकिन तब आलाकमान ने बहुगुणा का चयन करके सबको चौंका दिया था। रावत की नाराजगी को दूर करने के लिए उन्हें मनमोहन सरकार में राज्यमंत्री से कैबिनेट मंत्री बनाया गया और उनके एक रिश्तेदार को राज्यसभा में भेजा गया। इससे रावत कुछ समय के लिए शांत तो हुए लेकिन मुख्यमंत्री पद उनकी नजर बराबर बनी रही। केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा के बाद चले राहत कार्यों से सही ढंग से नहीं निपट पाने के कारणों के चलते बहुगुणा को हटाकर रावत को लाया गया लेकिन रावत लोकसभा चुनावों में राज्य से कांग्रेस को एक भी सीट नहीं दिला सके और उनके खिलाफ भी सुगबुगाहट शुरू हो गयी।
दरअसल राज्य में कांग्रेस को बहुत कुछ उसके किये का ही परिणाम भुगतना पड़ा। बहुगुणा ने मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए भाजपा विधायक का इस्तीफा दिलवा कर विपक्ष को कमजोर किया और उनके बाद रावत ने भी ऐसा ही किया। विपक्ष को जब मौका मिला तो उसने कांग्रेस के असंतुष्टों का साथ देने में देरी नहीं की और पहले ही प्रयास में सरकार धराशायी हो गयी। कांग्रेस की एक बड़ी मुश्किल राज्य में गठबंधन सरकार होना भी रही इसी के चलते पार्टी सभी बड़े नेताओं को मंत्री पद नहीं दे पाई और उसके खिलाफ अंदर ही अंदर बगावत के सुर हमेशा उठते रहे। दूसरा एक कारण यह भी रहा कि आलाकमान ने हमेशा मुख्यमंत्री दिल्ली से थोप दिया जबकि राज्य की राजनीति करने वाले नेता इस पद को पाने के लिए मेहनत ही करते रह गये। रावत एनडी तिवारी के बाद राज्य में कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता जरूर थे लेकिन वह कभी भी सबको साथ लेकर चलने वाले नेता नहीं रहे। रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही सतपाल महाराज पार्टी से नाराज चल रहे थे और लोकसभा चुनावों के दौरान वह भाजपा में शामिल हो गये थे और उनकी पत्नी ने राज्य मंत्रिमंडल छोड़ दिया था।
रावत की सरकार पर विपक्ष ही नहीं कांग्रेस के नेता भी आरोप लगा रहे थे कि राज्य में माफिया राज चल रहा है और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। खुद मुख्यमंत्री एक स्टिंग ऑपरेशन में अपनी सरकार बचाने के लिए विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त करते दिखाई दिये। मुख्यमंत्री ने हालांकि सभी आरोपों से इंकार किया लेकिन कौन नहीं जानता कि सरकार के जीवन मरण के दौर के समय विधायकों की खरीद फरोख्त का काम कैसे धड़ल्ले से चलता है। राज्य में राजनीतिक संकट बजट सत्र के दौरान तब सामने आया जब राज्य का बजट पेश करने के बाद सत्तापक्ष के ही कुछ विधायकों ने विरोध प्रकट किया लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने बजट को पारित घोषित कर दिया। कांग्रेस के नौ विधायकों ने बगावत पर उतरते हुए भाजपा के साथ हाथ मिला लिया और राष्ट्रपति से मिलने दिल्ली रवाना हो गये तो कांग्रेस ने विधायकों को मनाने के प्रयास में नाकाम रहने के बाद उनकी सदस्यता समाप्त करने की गुजारिश विधानसभा अध्यक्ष से की। बागी विधायकों ने हालांकि विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस को न्यायालय में चुनौती दी लेकिन वहां से उन्हें निराशा ही हाथ लगी और आखिरकार विधानसभा अध्यक्ष ने नौ विधायकों की सदस्यता समाप्त कर दी। भाजपा ने आरोप लगाया कि विधानसभा अध्यक्ष मुख्यमंत्री के साथ मिल कर अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं और ऐसा इसलिए किया गया है कि सदन की संख्या कम हो जाये जिससे रावत आसानी से बहुमत साबित कर सकें।
जाहिर है, इन सब घटनाक्रमों पर केंद्र की नजर बनी हुई थी और उसे कोई ना कोई कदम उठाना ही था इसलिए मंत्रिमंडल ने विचार विमर्श के बाद राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला किया। केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को सही ठहराते हुए कहा भी है कि अनुच्छेद 356 लागू करने का इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता क्योंकि हरीश रावत सरकार 18 मार्च को विधानसभा में बहुमत ‘हारने’ के बाद से ही ‘असंवैधानिक’ और ‘अनैतिक’ थी।

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