उच्च न्यायालय की फटकार के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू

  • जिम्मेदारों के मौन से मरीजों की मौत, रेजीडेंट डाक्टरों का भविष्य अधर में

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। केजीएमयू में पिछले दिनों हड़ताल के दौरान मरीजों की मौत के मामले का हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया और मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने का आदेश दिया। लेकिन जिन मरीजों को केजीएमयू से भगाया गया और उन्होंने इलाज के अभाव में अन्य अस्पतालों में दम तोडा़, उनके परिजन न्याय की गुहार लगा रहे हैं। इनके साथ-साथ रेजीडेंट डॉक्टर और पीएमएस के डॉक्टर भी चिकित्सा शिक्षा विभाग की लापरवाही का नतीजा भुगत रहे हैं।
दरअसल रेजीडेंट डॉक्टरों की हड़ताल खत्म के बाद से आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। जानकारों का कहना है कि केजीएमयू प्रशासन ने रेजीडेंट डॉक्टरों को समय रहते कुछ नहीं बताया। उन्हें मिसगाइड किया गया। प्रशासन के गलत रवैये की वजह से ही वह लोग हड़ताल पर गए। वहीं पीएमएस डॉक्टरों का कहना है कि उनका सत्र देर से शुरू होने से उन्हें सेलरी नहीं मिलेगी। इसके लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा विभाग एमसीआई और अदालत के नियमों का खुला उल्लंघन कर रहा है। उधर रेजीडेंट डॉक्टर अपने भविष्य को लेकर अधर में है तो वहीं पीएमएस डॉक्टर सत्र देर से शुरू होने की वजह से। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि इन लोगों को सही रास्ता क्यों नहीं दिखाया गया? जानकारों की मानें तो केजीएमयू प्रशासन का मौन हड़ताली डॉक्टरों पर भारी पड़ रहा है। पहले से ही सही रास्ता दिखा कर हड़ताल पर जाने से इन डॉक्टरों को रोका जा सकता था, जिससे आज रेजीडेंट डॉक्टरों के कॅरियर पर जो सवाल उठ खड़ा हुआ है, उससे निजात मिल जाती साथ ही मरीजों की जान न जाती।
दरअसल यूपीपीजीएमई की दोबारा काउंसिलिंग मरीजों की जान पर भारी पड़ गयी थी। हड़ताली डॉक्टरों ने खुद के भविष्य के लिए मरीजों की जान दांव पर लगा दी थी। हड़ताल में जहां केजीएमयू में कई मरीजों ने वार्डों व ट्रामा सेंटर में दम तोड़, वहीं कई ने भर्ती न होने से ट्रामा के गेट व इलाज के लिए गए विभिन्न सरकारी अस्पतालों में दम तोड़ दिया था।

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