ईपीएफ से सरकार की कर वापसी

पीएफ पर कर लगाना दोहरा कराधान होता, क्योंकि पीएफ वेतन से काटा जाता है। इस तरह कर्मचारी पहले ही कर अदा कर चुका होता है। कर नई आय पर लगता है। लेकिन पीएफ कोई नया आय का स्रोत नहीं है। इस फैसले को लेकर सरकार का विरोध भी तेज रहा। सोशल मीडिया में भी लोगों ने फैसले की आलोचना की।

sanjay sharma editor5वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) की निकासी पर कर लगाने के प्रस्ताव को वापस लेने की घोषणा आखिरकार कर दी। इससे सामान्य तौर पर वेतनभोगी वर्ग को राहत मिली है। इसके संकेत बजट पेश होने के एक-दो दिन बाद से ही मिलने शुरू हो गये थे। अंतत: सरकार ने इस पर पुनर्विचार कर वापस ले ही लिया।
दरअसल वित्तमंत्री के बजट के बाद से ही इस पर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया। कांग्रेस इस मुद्दे से सरकार को घेरने के प्रयास में जुटी रही। सरकार के सहयोगी दल भी इस पर नाखुश थे। शिवसेना ने तो खुल कर अपनी नाराजगी भी जताई थी। इसके अलावा, तमाम श्रमिक संघों ने भी विरोध जताया। कई संघों ने तो आंदोलन की भी चेतावनी दी थी। बजट का आमतौर पर स्वागत हुआ। पर ईपीएफ संबंधी एक प्रावधान के चलते सरकार की चौतरफा आलोचना शुरू हो गई थी। साफ कहें तो भविष्य निधि की निकासी पर कर लगाने का कोई औचित्य नहीं था। पीएफ पर कर लगाना दोहरा कराधान होता, क्योंकि पीएफ वेतन से काटा जाता है। इस तरह कर्मचारी पहले ही कर अदा कर चुका होता है। कर नई आय पर लगता है। लेकिन पीएफ कोई नया आय का स्रोत नहीं है। इस फैसले को लेकर सरकार का विरोध भी तेज रहा। सोशल मीडिया में भी लोगों ने फैसले की आलोचना की। पीएफ की सारी निकासी से लेकर केवल कर्मचारी के अंशदान या केवल अगले वित्तवर्ष से जमा होने वाले अंशदान या उस पर मिलने वाले ब्याज के साठ फीसद पर आय कर लगाने की योजना तक, अनेक धारणाएं बनती-बिगड़ती रहीं। बहुत-से लोगों के लिए यह समझ पाना मुश्किल हो रहा था कि वास्तव में सरकार का इरादा क्या है। गलतफहमी की गुंजाइश सरकार के स्तर से ही शुरू हुई। वित्तमंत्री का बजट भाषण प्रस्ताव कुछ और कहता दिखा तो साल 2016-17 के लिए पेश किया गया वित्त विधेयक कुछ और। भविष्य निधि में कर्मचारी के मूल वेतन (बेसिक सैलरी) और महंगाई भत्ता (डीए) का बारह फीसद अंश जमा होता है और इसी के बराबर अंशदान नियोक्ता की ओर से भी किया जाता है। वित्तमंत्री के बजट भाषण से ऐसा लगता था कि कर्मचारी की कुल पीएफ राशि के साठ फीसद पर कर लगेगा। जबकि प्रस्तावित वित्त विधेयक का एक प्रावधान कहता है कि कर्मचारी के अंशदान के साठ फीसद पर कर देना होगा।
सरकार ने सफाई में यह भी कहा कि अगले वित्तवर्ष से कर्मचारी के अंशदान के ब्याज के साठ फीसद पर कर लगेगा। इस तरह से कई तरह के बयान से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी। पर सवाल यह है कि जब कंपनी का कर घटाया जा रहा हो, बैंकों के बड़े बकाएदारों को ढील दी जा रही हो, कॉरपोरेट जगत को हर साल हजारों करोड़ रुपए की छूट दी जाए, तो क्या पीएफ पर टैक्स सही रहता। ऐसे में यह सही कदम है।

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