इरोम शर्मिला ने 16 साल बाद खत्म की भूख हड़ताल

  • 28 साल की उम्र में शुरू की थी भूख हड़ताल

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
शिलॉन्ग। मणिपुर की एक्टिविस्ट इरोम शर्मिला ने 16 साल बाद अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी है। इसके साथ ही उन्होंने सक्रिय राजनीति में उतरने और चुनाव लडऩे का भी फैसला किया है। इससे सियासी गलियारे में भी इरोम को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाने की कोशिशें तेज हो गई हैं।
इरोम शर्मिला ने 28 साल की उम्र में भूख हड़ताल शुरू की थी। वह 44 साल की हो गई हैंं। इस दौरान उन्होंने मुंह से अन्न का एक भी दाना ग्रहण नहीं किया। हालांकि उनकी भूख हड़ताल तोड़वाने की कोशिशें कई बार की गईं लेकिन कामयाबी नहीं मिली। दरअसल इरोम ने 4 नवंबर 2000 को असम राइफल्स के जवानों की तरफ से कथित तौर पर 10 लोगों को मारने की घटना के खिलाफ भूख हड़ताल तब शुरू की थी। इरोम का आरोप है कि ये इसलिए हुआ क्योंकि राज्य में आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट यानी अफ्सपा 1958 से है। इस कानून के तहत सिक्युरिटी फोर्सेज को गिरफ्तारी या बल प्रयोग की खास ताकतें हासिल रहती हैं। इरोम 16 साल से इसी कानून को हटाने की मांग पर अड़ी हुई हैं। उन्होंने ये वक्त ज्यादातर हॉस्पिटल्स में पुलिस की निगरानी में ही काटा है। इरोम के फैसले को लेकर कुछ लोग नाराज तो कुछ खुश हैं। एक वर्ग ऐसा है जो मानता है कि भूख हड़ताल का मकसद एक कठोर कानून को खत्म कराना था। इसलिए इसे खत्म नहीं करना चाहिए। दूसरा वर्ग, इसे उनका निजी मामला बताते हुए खुश है। फिलहाल कुछ लोगों का मानना है कि इरोम अपनी 94 साल की मां सखी देवी के साथ रहेंगी, जो अपने बेटे और इरोम के भाई के घर में रहती हैं। नौ भाई-बहनों में इरोम सबसे छोटी हैं। इरोम के फैसले पर उनकी मां न तो खुश हैं और न दुखी। सखी ने कहा है कि वो कोई भी फैसला लेने से पहले मेरा आर्शीवाद लेने आती है। वहीं इरोम के भाई और एनजीओ संचालक सिंघाजीत का कहना है कि इरोम के पास रहने के सात ऑप्शन हैं। ये सभी उनके रिश्तेदार ही हैं। इरोम के पुश्तैनी घर में आठ कमरे हैं। सिंघाजीत का छह कमरों वाला मकान अलग है। बाकी मकान छोटे हैं। जबकि इरोम के साथियों के मुताबिक वो कहां रहेंगी, ये उनका अपना फैसला होगा। हालांकि एक मेकशिफ्ट कैंप भी उनका ठिकाना बन सकता है।

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