इतिहास दोहराने की ओर पाक सेना

-रहीस सिंह
आजकल पाकिस्तान के एक विशेष सेक्शन में यह भय उत्पन्न हो रहा है कि कराची में सेना का प्रभाव बढ़ रहा है। सेना विशेष तौर पर मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) का ध्वंस करना चाहती है जिसकी व्यूह रचना आईएसआई द्वारा तैयार की गयी है। वास्तविकता तो यह है कि कराची के सैनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी और एमक्यूएम के सदस्य इस बात से डरे हुए हैं कि आईएसआई के नेतृत्व में कराची में पाकिस्तानी सेना इस बात का संकेत दे रही है कि देश पुन: तख्तापलट की ओर जा रहा है।
क्या पाकिस्तान के अधिकारियों और नागरिकों का भय सही है? ऐसा भी माना जा रहा है कि इस बार सेना की रणनीति सीधे संघीय सरकार को निशाने पर लेने की नहीं है, बल्कि वह वाया कराची इस्लामाबाद जाने की योजना पर कार्य कर रही है। तब क्या यह मान लिया जाए कि आने वाले दिनों में नवाज शरीफ के समक्ष पुन: कोई बड़ा संकट खड़ा हो सकता है?
कराची में पाकिस्तानी सेना जो कर रही है, उसका नेतृत्व पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख रिजवान अख्तर कर रहे हैं और आईएसआई से किसी नेक इरादे की उम्मीद पाकिस्तान के लोग भी नहीं रखते। हालांकि सरकारी तौर पर तो बताया जा रहा है कि इस अभियान का मकसद कराची को हत्याओं और अराजकता के दौर से मुक्त कराना है जो वर्ष 2013 से ही शुरु हो गया था। उस वक्त यह सैन्य अभियान अपराधियों और आतंकियों को खत्म करने पर केंद्रित था लेकिन अब एमक्यूएम और स्थानीय पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी इसके निशाने पर हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि इस अभियान का असली मकसद कुछ और ही था। दरअसल सेना कराची को मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के प्रभाव से मुक्त कराना चाहती है। ऐसा माना जा रहा है कि सेना कराची पर नियंत्रण चाहती है और संभावना इस बात की है कि आने वाले दिनों में किसी भी दल को यहां शासन चलाने की इजाजत नहीं होगी।
सवाल यह उठता है कि आखिर पाकिस्तानी सेना ने कराची की को क्यों निशाना बनाया? दरअसल सिंध प्रांत की राजधानी कराची पाकिस्तान का कामर्शियल हब है जहां जमीन, व्यवसाय और संसाधन भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। देश का लगभग आधा राजस्व कराची से ही आता है। स्वाभाविक है कि यदि पाकिस्तानी सेना कराची पर नियंत्रण स्थापित कर ले जाती है तो राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और न्यायापालिका में नियंत्रण स्थापित करने का रास्ता काफी हद तक आसान हो जाएगा। यानि सेना पहले इकोनॉमिक हब को नियंत्रण में लेगी तत्पश्चात राजनीतिक सत्ता को, उपनिवेशवादियों की तरह। लेकिन यह स्थिति तो नवाज शरीफ के लिए भी बेहतर नहीं होगी। दूसरा सवाल यह है कि क्या एमक्यूएम को खत्म करने की पाकिस्तानी सेना की कोशिश सफल हो जाएगी? या फिर सेना को फिर से वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ेगा जैसा कि बुगती को खत्म करने के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ को करना पड़ा था। दरअसल पाकिस्तान जिस बुनियाद पर खड़ा है उसमें धर्म बेहद महत्वपूर्ण तत्व है। पाकिस्तान को गौर से देखें तो पता चलता है कि समूचे उत्तरी वजीरिस्तान प्रांत में आतंकवादी संगठन अलकायदा, तालिबान इस्लामी राज्य की स्थापना की घोषणा बहुत पहले कर चुके हैं। इनका संजाल पूरे पाकिस्तान में कुछ इस कदर बिखरा हुआ है, जिसकी गिरफ्त में पाकिस्तान के लोग, प्रशासनिक संस्थाएं और यहां तक कि सरकार भी है। पाकिस्तान में लम्बे समय से इस विचारधारा को प्रभावी बनाने की कोशिश हो रही है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता। इससे एक तरफ इस्लामिक कट्टरपंथ मजबूत हो रहा है जो अंतत: आतंकवाद के लिए आवश्यक मानव संसाधनों की आपूर्ति करता है और दूसरी ओर सेना के लिए रास्ता मिल रहा है। यानि कट्टरपंथ और आतंकवाद जितना ताकतवर होता जाएगा, सेना के लिए रास्ता उतना ही सुगम होता जाएगा। फिर सेना आतंकवाद को क्यों खत्म करना चाहेगी? पाकिस्तान में उदारवादियों की गिनती विलुप्त प्रजातियों में की जा रही है। स्वाभाविक है कि लोकतंत्र की सामथ्र्य घटेगी। यद्यपि कराची में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान खासा प्रभाव रखता है लेकिन असल में इसकी सहानुभूति इमरान खान और नवाज शरीफ के प्रति है न कि एमक्यूएम के प्रति। इस कार्य-कारण के जरिए भी यह जाना जा सकता है कि पाकिस्तानी सेना आतंकवाद के खिलाफ कितनी कार्रवाई करेगी और एमक्यूएम के खिलाफ कितनी। लेकिन सेना यह भूल रही है कि एमक्यूएम का सिंध में एक मजबूत आधार है। भले नेशनल असेम्बली चुनाव में उसका मत प्रतिशत 2008 के मुकाबले कम हुआ हो लेकिन उसकी सीटों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा है। सिंध प्रांत में भी उसे 34 सीटें प्राप्त हुयी हैं। उसकी यह स्थिति तब है जब चुनाव के दौरान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने उसके प्रत्याशियों और दफ्तरों को निशाना बनाया था। ऐसा में सेना का रास्ता आसान तो नहीं होगा। शायद इसीलिए उसने यह राग अलापना शुरू कर दिया है कि भारत की खुफिया एजेंसी रॉ उपद्रवियों/ अलगाववादियों को मदद कर रही है। अभी तो इस बात की भी संभावना है कि मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट जो पहले मुहाजिर कौमी मूवमेंट था, फिर से मुहाजिर एजेंडे को आगे बढ़ाना शुरु करे जिससे उसे मिलने वाला बाहरी समर्थन बढ़ जाएगा। एक सवाल और भी है। वह यह कि क्या पाकिस्तानी सेना को पाकिस्तान से बाहर किसी अन्य देश से कोई ताकत अथवा प्रोत्साहन तो नहीं मिल रहा है जिसके चलते वह कराची में तख्तापलट जैसी स्थिति का निर्माण करने की कोशिश कर रही है?
सीधे तौर पर कहा जाए तो कहीं पाकिस्तानी सेना के इस मूवमेंट के पीछे चीन का षडय़ंत्र तो नहीं है? जिस तरह से अमेरिका को पाकिस्तान के लोकतांत्रिक शासकों की अपेक्षा जनरल अधिक पसंद आते रहे, उसी तरह से चीन को भी लोकतांत्रिक नेताओं की अपेक्षा पाकिस्तानी जनरल अपेक्षाकृत ज्यादा पसंद हो सकते हैं। चीनी सेना को ग्वादर से कराची तक और उधर बलूचिस्तान शांत और अनुशासित चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो चीन काश्गर से ग्वादर तक के कॉरिडोर को वह आकार नहीं दे पाएगा जैसा कि वह चाहता है और न ही वैसे लाभ हासिल कर पाएगा जो वह करना चाहता है। दूसरी तरफ ग्वादर से लेकर वह होर्मुज जलडमरूमध्य तक के समुद्री रूट पर अपना आधिपत्य चाहता है जिससे होकर भारत अपनी आवश्यकता के 80 प्रतिशत पेट्रोलियम पदार्थों को आयात करता है। चीन ग्वादर को मारओ और हम्मनटोटा से जोडऩा चाहता है जो उसकी ‘स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स’ का एक हिस्सा है। इसके जरिए चीन एक साथ कई उद्देश्य पूरा कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव हो पाएगा जब पाकिस्तान के इस क्षेत्र की कानून और व्यवस्था सेना के अधीन हो। चूंकि सेना ऐसा ही कर रही है इसलिए इस गतिविधि के तार इस्लामाबाद की बजाय बीजिंग तक जाते दिखते हैं। यदि वास्तव में कराची में हो रही सैन्य कार्रवाई इसी या इस प्रकार के ‘ग्रेट गेम’ का हिस्सा है तो यह मान लेना चाहिए कि पाकिस्तान की जम्हूरियत की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है, लेकिन इसके प्रभाव भारत तक भी दिखेंगे।
फिलहाल पाकिस्तान फिर से इतिहास की ओर लौटता दिख रहा है। इससे पाकिस्तान एक अनिश्चित राष्ट्र के रूप में कुछ कदम और आगे बढ़ जाएगा। लेकिन इस तरह की अनिश्चितता पाकिस्तानी लोकतंत्र और पाकिस्तानी अवाम के साथ-साथ भारत के लिए भी खतरनाक साबित होगी। कभी टेस्ट ट्यूब बेबी ऑफ जिया कहे जाने वाले नवाज शरीफ इसी तरह की गतिविधियों के परिणामों को भुगत चुके हैैं। अभी भी वे इस सिंड्रोम से बाहर नहीं आ पाए हैं, इसलिए बहुत अच्छे परिणामों की उम्मीद नहीं दिखती। लेकिन इन स्थितियों पर भारत को विशेष रूप से ध्यान रखना होगा। एक तो इसलिए क्योंकि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई अलगाववादियों के पीछे असली ताकत भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ को मान रही है और दूसरी यह कि वह कराची से आतंकवादियों को भारत की तरफ विस्थापित करने की रणनीति पर कार्य अवश्य करेगी।

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