इज्जत की जिंदगी के लिए मोहताज हो रहे हैं बुजुर्ग

बाल मुकुन्द ओझा
एक अक्टूबर को पूरी दुनिया में अंतराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाया गया। अब यह दिवस रस्मी हो गया है। लकीर पीटने के अलावा इसका कोई मतलब नहीं रह गया है। स्वयंसेवी संस्थाएं और सरकारी विभाग गोष्ठियों के माध्यम से बुजुर्गों की स्थिति पर भाषण का आयोजन करते हैं। फिर अगले साल का इंतजार करते हैं। बुजुर्गों की वास्तविक समस्याएं क्या हैं और उनका निराकरण कैसे किया जाये इस पर गहनता से मंथन की जरूरत है। बुजुर्ग सिर्फ इज्जत से जीना चाहते हैं। विश्व में बुजुर्गों की संख्या लगभग 60 करोड़ है।
संयुक्त राष्टï्र जनसंख्या कोष की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रत्येक पांच में से एक बुजुर्ग अकेले या अपनी पत्नी के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है, यानी वह परिवार नामक संस्था से अलग रहने को विवश है। ऐसे बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। अशिक्षित बुजुर्गों की हालत और भी ज्यादा दयनीय है। अधिकतर बुजुर्ग डिप्रेशन, आर्थराइटिस, डायबिटीज एवं आंख संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं और महीने में औसतन 11 दिन बीमार रहते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उन बुजुर्गों को होती है, जिनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है। हेल्पेज इंडिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट बताती है कि देश के लगभग 10 करोड़ बुजुर्गों में से पांच करोड़ से भी ज्यादा बुजुर्ग आए दिन भूखे पेट सोते हैं। देश की कुल आबादी का आठ फीसदी हिस्सा अपने जीवन की अंतिम वेला में सिर्फ भूख नहीं, बल्कि कई तरह की समस्याओं का शिकार है। रिपोर्ट बताती है कि बुजुर्गों को राज्य सरकारों की ओर से जो पेंशन दी जा रही है, वह इतनी नाकाफी है कि उससे महीना भर तो क्या, चार दिन भी बसर हो सकना असंभव है। बुजुर्गों का सम्मान करने और सेवा करने की हमारी समाज की एक समृद्ध परंपरा रही है। समाचार पत्रों में इन दिनों बुजुर्गों के सम्बन्ध में प्रकाशित होने वाले समाचार निश्चय ही दिल दहला देने वाले हैं। राम राज्य का सपना देखने वाला हमारा देश आज किस दिशा में जा रहा है, यह बेहत चिंतनीय है। भारत में बुजुर्गों का मान-सम्मान तेजी से घटा है। यह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का अवमूल्यन है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। हमारे देश में बुजुर्ग को परिवार के मुखिया की मान्यता हासिल है। आज भी हर शुभ कार्य में बुजुर्ग को याद किया जाता है और उनके आशीर्वाद एवं इजाजत से ही शुभ कार्य को आगे बढ़ाया जाता है। श्रवण कुमार का उदाहरण हमारे सामने है। जिसने अपने माता-पिता की सेवा करते-करते ही अपनी जान गंवा दी।
मगर समय पलटा। श्रवण कुमार का आदर्श कागजों तक सीमित होकर रह गया। एक समय था जब परिवार में हंसी-खुशी बच्चे का नाम श्रवण कुमार रखा जाता था, मगर आज श्रवण कुमार का नाम देखे नहीं मिलता। अभिनेता अमिताभ बच्चन की बहुचर्चित फिल्म ‘बागवान’ में हमारे आधुनिक परिवार का जो खाका खींचा गया है, कमोबेश आज वही स्थिति वृद्ध माता-पिता की हो गई है। यह घर-घर की कहानी है। वे घर-समाज पर बोझ बनकर रह गये हैं। युवा वर्ग में बुजुर्गों के प्रति आदर की भावना नहीं रही है। आज का युवा कल का बुजुर्ग होगा, यह जानते-पहचानते हुए भी हम पतन की गहरी खाई में गिरते चले जा रहे हैं। हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक मर्यादा तार-तार होकर रह गई है। इस बेरहम स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?
भारत में 60 साल से अधिक आयु के व्यक्ति को बुजुर्ग अथवा वरिष्ठ नागरिक का दर्जा हासिल है। इस आयु के व्यक्ति को बेहद सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। अस्सी साल का बुजुर्ग असहाय की श्रेणी में आ जाता है। विश्व में वर्तमान में 80 साल से अधिक उम्र के करीब 16 फीसदी लोग हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में बुजुर्गों की संख्या लगभग दस करोड़ है। बुजुर्गों की देखभाल के लिए वर्ष 2007 में मेन्टीनेंस एण्ड वेलफेयर ऑफ पेरेन्ट्स एवं सीनियर सिटीजन कानून का निर्माण हुआ था। इस कानून के अनुसार वृद्ध माता-पिता को यह अधिकार है कि वे अपने भरण-पोषण के लिए अपनी सन्तान से गुजारा भत्ता हासिल कर सकते हैं। गुजारा खर्चा नहीं देने वाली सन्तानों पर जुर्माना एवं कारावास की सजा का प्रावधान है। बुजुर्गों को हालांकि इस कानून की कोई जानकारी नहीं है। यदि कुछ लोगों को जानकारी है तो सामाजिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए वे कोई कार्यवाही नहीं करते। सामाजिक मूल्यों के अवमूल्यन के कारण बुजुर्गों का मान-सम्मान घटा है और वे एक अंधेरी कोठरी का शिकार होकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। यदि बुजुर्ग माता-पिता बीमार हो गये हैं तो अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं है। अनेक बुजुर्गों को एक पुत्र से दूसरे पुत्र के पास ठोकरे खाते देखा जाता है। अनेक को घरों से निकालने के समाचार मीडिया में सुर्खियों में प्रकाशित हो रहे हैं। आज भी ऐसे अनेक बुजुर्ग मिल जायेंगे जो अपनी संतान और परिवार की उपेक्षा व प्रताडऩा के शिकार हैं। बुजुर्गों की देखभाल और उनके सम्मान की बहाली के लिए समाज में चेतना का अलख जगाने की जरूरत है। सद्व्यवहार से हम इनका दिल जीत सकते हैं।

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