इंसेफेलाइटिस से मौत पर राजधानी में कोहराम

केजीएमयू में एक बच्चे की मौत, प्रशासन की लापरवाही उजागर
उपकरणों की खरीद में बरती गई लापरवाही के कारण मरीजों को नहीं मिल पा रहा उचित इलाज

 4Captureपीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। गोरखपुर सहित पूरे पूर्वांचल में कहर बरपा रहे इंसेफेलाइटिस ने राजधानी सहित आस-पास के जिलों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। बीती 30 अगस्त को केजीएमयू के बाल रोग विभाग में दिमागी बुखार (जापानी इंसेफेलाइटिस) से एक बच्चे की मौत हो गई। जिससे केजीएमयू प्रशासन में हडक़ंप मच गया है। इस साल लखनऊ में जापानी इंसेफेलाइटिस की वजह से होने वाली यह पहली मौत है।
अमेठी के रहने वाले शिवम ओझा (11)को कई दिन बुखार आने के बाद परिजनों ने 28 अगस्त को केजीएमयू के बाल रोग विभाग में भर्ती कराया था। जहां पर डॉक्टरों ने शिवम को दिमागी बुखार होने की पुष्टिï की। जिसके बाद शिवम का इलाज शुरू किया गया। बीती 30 अगस्त को इलाज के दौरान शिवम की मौत हो गई।
गौरतलब है कि जापानी इंसेफेलाइटिस ने गोरखपुर सहित पूरे पूर्वांचल में कोहराम मचाया हुआ है। पिछले दो-तीन दिनों में इस बीमारी से करीब 9 लेागों की मौत हो चुकी है, वहीं इस साल जापानी इंसेफेलाइटिस से मौत का आंकड़ा 250 पहुंच चुका है। इसके आलावा गोरखपुर के अस्पतालों में इस बीमारी से पीडि़त सैकड़ों लोग भर्ती हैं। जाहिर है कि मौतों का आंकड़ा और भी बढ़ सकता है।
चिकित्सकों के मुताबिक यह बीमारी भी समय के अनुसार अपना रूप बदल रही है। अभी तक यह बीमारी एक विशेष मौसम बरसात में और खास क्षेत्र में पायी जाती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। इंसेफेलाइटिस मच्छर से फैलती थी अब यह दूषित जलापूर्ति की वजह से फैल रही है। जानलेवा जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में कहर बरपा रही है। अगर बीते सालों में यहां दिमागी बुखार से पीडि़त बच्चों के मृत्यु दर के सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो 2005 से 2012 के बीच में अभी तक करीब 4225 बच्चे काल के गाल में समा चुके हैं लेकिन गैर सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो रूह कंपाने वाली स्थिति है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा नामित जेई (जापानीज इंसेफेलाइटिस) के एक्सपर्ट डॉ. बृजेश कुमार ने बताया कि कि समय के साथ इस बीमारी में परिवर्तन आया है। इन्सेफेलाइटिस मच्छर जनित बीमारी के अलावा दूषित जलापूर्ति के कारण भी फैलती है। लोगों को चाहिये कि वह अपने आसपास के स्थानों पर साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें तो इस बीमारी का प्रकोप कम किया जा सकता है। इंसेफ्लाइटिस गोरखपुर से चलकर राजधानी लखनऊ तक पहुँच चुका है। क्योंकि लखनऊ में भी एक केस सामने आया है। डा. बृजेश कुमार ने बताया कि जानवर से यह वायरस आता है और हवा द्वारा इसके वायरस एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाते हैं।

-मशीन की खरीद के लिए टेंडर निकाले जा चुके हैं। जल्दी ही मशीन को खरीदने का कार्य पूरा कर लिया जायेगा और इंसेफ्लाइटिस से ग्रस्त मरीजों को लाभ मिलेगा।
-डॉ. वेद प्रकाश
डिप्टी सीएमएस, केजीएमयू

नहीं खरीदी गई मशीन, बजट हो चुका है जारी

जापानी इंसेफ्लाइटिस ने एक बार फि र पूरे पूर्वांचल में कहर बरपा रही है। इस बीमारी से ग्रसित सैकड़ो लेाग असपतालों में भर्ती हैं। केजीएमयू में भी इस बीमारी से एक बच्चे की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद केजीएमयू प्रशाासन इंसेफ्लाइटिस जैसी असाध्य बीमारी के रोगियों के इलाज के लिए मशीनेें नहीं खरीद रहा है। जबकि इन मशीनों को खरीदने के लिए एनएचएम की ओर से केजीएमयू प्रशासन को 5 करोड़ रुपये का बजट पहले ही जारी किया जा चुका है। राजधानी समेत पूरे प्रदेश में प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में लोग जापानी इंसेफ्लाइटिस का शिकार होते हैं। जिनमें से अधिकांश रोगियों को मौत हो जाती है, वहीं कुछ रोगी जिनकी जान बच जाती है उनमें ऐसी शारीरिक विकृतियां आ जाती हैं। जिससे उनका जीवनयापन कठिन हो जाता है। जापानी इंसेफ्लाइटिस के कहर के चलते राजधानी के केजीएमयू में प्रतिवर्ष जुलाई से अक्टूबर माह के बीच लगभग सैकड़ों मरीजों को भर्ती किया जाता है। इन मरीजों में बाल रोगियों की संख्या अधिक होती है। विशेषज्ञों की मानें तो ‘जेई’ के शिकार अधिकांश मरीजों की मौत हो जाती है लेकिन जो मरीज बच जाते हैं उनमें कई तरह से शारीरिक विकलांगता आ जाती है। इस बीमारी में रोगी के दिमाग का काफ ी हिस्सा प्रभावित हो जाता है, क्योंकि हर अंग दिमाग द्वारा ही संचालित होता है इसलिए शरीर के कई अंगों में एक साथ असमानता आ जाती है। इससे रोगी की आवाज चली जाती है, चलने की गति व तरीका प्रभावित होता है, हाथ पैरों में अकडऩ, मांसपेशियों की परेशानी व कई गंभीर विकृतियां हो जाती हैं। इनके इलाज के लिए रोगी को केजीएमयू के न्यूरोलॉजी, पीड्रियाटिक्स व लिंब सेन्टर में रिफ र किया जाता है। ऐसे रोगियों के लिए कुछ विशेष प्रकार की मशीनों की आवश्यकता पड़ती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जेई से प्रभावित रोगियों के इलाज में उनकी बीमारी व शरीरिक अक्षमता को पहचानना सबसे बड़ी चुनौती होती है जो अत्याधुनिक मशीनों से ही संभव है। इसके बावजूद लापरवाही बरती जा रही है।
पूरे देश में मौतों का अंाकड़ा
वर्ष 2012 में 1527 मामलों में से 309 की मौत
वर्ष 2011 में दर्ज 6297 मामलों में से करीब 500 की मौत
वर्ष 2005 में दर्ज 5581 मामलों में से 1387 की मौत
वर्ष 2010 में दर्ज 5149 मामलों में 677 की मौत
वहीं 2011,12,13 व 14 में भी सैकड़ों लोग इस बीमारी की चपेट में आकर मौत के शिकार हो चुके हैं।

बचाव
साफ -सफाई रखें।
पूरी बांह के कपड़े पहनें।
साफ -पानी पियें।
पानी का जमाव न होने दें।
नियमित टीकाकरण करायें।
खुले में शौच न जायें।
इंडिया मॉर्का हैंडपंप के पानी का प्रयोग करें।

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