इंटरनेट इतना महंगा, कैसे देखें डिजिटल इंडिया का सपना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी डिजिटल इंडिया प्रोग्राम की सफलता सुनिश्चित करने के लिए देश में इंटरनेट दरों का कम होना जरूरी है। इसके लिए केंद्र सरकार को तत्काल कदम उठाने होंगे और इन दूरसंचार कंपनियों की मनमानी रोकनी होगी

 हरि
पिछले दिनों 1.1 लाख करोड रुपये की 2जी व 3जी स्पेक्ट्रम नीलामी से सरकार का खजाना तो भर गया, लेकिन इसकी कीमत अब आम आदमी को अपनी जेब से चुकानी पड़ रही है। हाल में ही देश की सभी बड़ी दूरसंचार कंपनियों ने इंटरनेट पैक की दरें 40 से 100 फीसदी तक बढ़ा दी हैं। देश के नौ सर्किलों में स्पेक्ट्रम हासिल करने में सफल रही आइडिया सेलुलर ने तो दिल्ली-एनसीआर में 2जी प्लान पर दरों में 100 प्रतिशत की वृद्धि की है। वहीं 3जी डाटा प्लान पर दरें करीब 33 फीसदी बढ़ा दी है। दूसरे सभी सर्किलों में भी दरें बहुत जल्द बढऩे वाली हैं। एयरटेल और वोडाफोन सहित और भी दूरसंचार कंपनियों ने अपनी इंटरनेट डाटा दरें काफी बढ़ा दी है।
हालात ये हो गए हैं कि सभी प्रमुख कंपनियों ने पिछले सिर्फ एक साल में ही कई बार इंटरनेट डाटा पैक की दरें बढ़ाई हैं जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है और इनकी मनमानी चल रही है जिसे रोकने वाला कोई नहीं है। स्पेक्ट्रम नीलामी के बाद उद्योग संगठनों ने इस बात की संकेत दिए थे कि डाटा इस्तेमाल की दरों में बढ़ोतरी होगी, क्योंकि ऑपरेटरों को सरकार को करीब 1,09,874 करोड़ रुपये का भुगतान करना है, लेकिन सवाल यह है कि ये भुगतान क्या अब देश का आम आदमी खासकर युवा वर्ग अपनी जेब से करेगा?
एक तरफ सरकार देश में डिजिटल इंडिया का सपना देख रही है, वहीं दूसरी तरफ देश की लगभग सभी टेलीकॉम कंपनियां पिछले एक साल से उपभोक्ताओं के लिए 2जी और 3जी सेवाओं के लिए अपनी इंटरनेट पैक की दरें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि इंटरनेट के इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं के लगातार बढऩे से ये कीमतें कम होनी चाहिए। सरकार डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के तहत इंटरनेट की पहुंच गांव तक पहुंचाना चाहती है, लेकिन बढ़ती हुई कीमतें सभी के लिए परेशानी का सबब बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ यानी आईटीयू की रिपोर्ट के अनुसार भारत में इंटरनेट 60 से ज्यादा देशों से महंगा है। आईटीयू के अनुसार किफायती ब्रॉडबैंड देने वाले देशओं की सूची में भारत 93वें स्थान पर है, जबकि मोबाइल इंटरनेट पर 67वें स्थान पर है। अगर एशियाई देशों से ही तुलना करें तो पता चलता है कि भारत में इंटरनेट मॉरीशस, माल्टा और पड़ोसी देश र्शीलंका से भी महंगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी डिजिटल इंडिया प्रोग्राम की सफलता सुनिश्चित करने के लिए देश में इंटरनेट दरों का कम होना जरूरी है। इसके लिए केंद्र सरकार को तत्काल कदम उठाने होंगे और इन दूरसंचार कंपनियों की मनमानी रोकनी होगी। दुनिया में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को एक ताकत के रूप में देखा जाता है, लेकिन भारत में ही चीजें उतनी तेज गति से आगे नहीं बढ़ रहीं जितनी बढऩी चाहिए। एक तरफ देश में इंटरनेट इस्तेमाल करने की दरें बहुत ज्यादा महंगी हैं, वहीं दूसरी तरफ औसत इंटरनेट स्पीड बहुत कम है। मतलब टेलीकॉम कंपनियों द्वारा जितनी बताई जाती है उससे काफी कम उपभोक्ता को मिलती है। देश में इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड कहने को तो 24 एमबीपीएस तक पहुंच गई है, लेकिन इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले आम आदमी से पूछिए कि क्या उसे वाकई ये सेवाएं उसी रफ्तार से मिलती हैं, जिसके लिए वह भुगतान करता है? हमारा ब्रॉडबैंड तंत्र काफी अकुशल है और फिर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (आईएसपी) ढांचागत विकास पर उतना ध्यान नहीं दे रहे जितना कि मुनाफा बटोरने पर दे रहे हैं। दूरसंचार के ढांचे में कई कमियां मौजूद हैं। हाई स्पीड इंटरनेट और बेहतर सेवा के लिए 3जी जैसी तकनीक देश के हर हिस्से में अभी भी मौजूद नहीं है। इंटरनेट स्पीड और तकनीक के मामले में भारत दूसरे देशों की तुलना में अभी भी बहुत पीछे है। बिजली की उपलब्धता, सस्ती कीमतों पर कंप्यूटरों तथा डिजिटल युक्तियों की मौजूदगी, शिक्षा, इंटरनेट के इस्तेमाल संबंधी जागरूकता, आम आदमी के लिए उनकी भाषाओं में सेवाएं मुहैया कराने जैसे मोचरें पर भी सरकारी और गैर सरकारी पहल की तुरंत जरूरत है। दूसरी पीढ़ी की क्रांति से हम इंटरनेट तथा वेब के जरिए गवर्नेंस, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा दूसरी अन्य चीजों में बदलाव ला सकते हैं। इंटरनेट की उपयोगिता सिर्फ लोगों को तकनीकी आधार पर जोडऩे या सूचनाएं देने तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने हमारे जीवन को ज्यादा सुविधाजनक, सुव्यवस्थित और बेहतर बनाने में भी योगदान दिया है।

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