आस्था और अतिक्रमण

अक्सर चौराहों और गलियों में अतिक्रमण से हम दो-चार होते रहते हैं। हमारे महानगर और नगर दोनों अतिक्रमण का शिकार हैं। इसी तरह के मामले में साल 2006 में गुजरात हाईकोर्ट ने सडक़ों से अतिक्रमण हटाने का निर्र्देश दिया था। केंद्र सरकार ने उस समय इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। मामले सुप्रीम कोर्ट ने सडक़ों पर बने अवैध निर्माण को हटाने का निर्देश दिया था।

sanjay sharma editor5हमारे देश में सामूहिक जगहों पर अतिक्रमण एक आम बात है। लेकिन यह समस्या जब जरूरत से ज्यादा बड़ी हो जाती है तो कई तरह की परेशानियां पैदा करती है। कोर्ट के अनेक ऐसे आदेशों के बाद भी सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण का सिलसिला नहीं रुक रहा है। ऐसा कोई शहर या कस्बा है नहीं है जहां प्रशासनिक स्तर पर अतिक्रमण हटाने और रोकने के गंभीर प्रयास न हुए हों। इसके बाद भी अवैध कब्जे की समस्या हल नहीं होती। कई बार तो धार्मिक स्थल बनाकर भी कब्जे किए जाते है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के अतिक्रमण को ईश्वर के अपमान की संज्ञा दी है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमण को लेकर सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों पर उसके पूर्ववर्ती निर्देशों का पालन नहीं करने के लिए फटकार भी लगाई है।
अक्सर चौराहों और गलियों में अतिक्रमण से हम दो-चार होते रहते हैं। हमारे महानगर और नगर दोनों अतिक्रमण का शिकार हैं। इसी तरह के मामले में साल 2006 में गुजरात हाईकोर्ट ने सडक़ों से अतिक्रमण हटाने का निर्र्देश दिया था। केंद्र सरकार ने उस समय इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। मामले सुप्रीम कोर्ट ने सडक़ों पर बने अवैध निर्माण को हटाने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट नेे इस मामले का दायरा बढ़ाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। इस साल मार्च में छत्तीसगढ़ सरकार से इस आदेश का पालन न किये जाने की शिकायत मिलने के बाद राज्यों से पहले दिये गये निर्देशों पर अमल किये जाने की रिपोर्ट मांगी थी, पर किसी भी राज्य ने इसका अनुपालन नहीं किया। इस रवैये से नाराज कोर्ट ने यह टिप्पणी दी है कि उसके आदेश ठंडे बस्ते में डालने के लिए पारित नहीं किये जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह झल्लाहट स्वाभाविक है। सडक़ों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण किए जाने में राजनीतिक प्रश्रय भी शामिल होता है। इसी वजह से अतिक्रमण करने वालों के हौसले बुलंद होते रहते हैं। राजनेताओं के दबाव के कारण प्रशासन के हाथ भी बंधे होते हैं। चूंकि ये अतिक्रमण कमाई का जरिया भी होते हैं। इस वजह से अधिकारियों की भी इसमें मिलीभगत होती है। कई बार तो अतिक्रमण प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत से भी किया जाता है। धार्मिक स्थलों के अतिक्रमण के साथ मुश्किल यह है कि इन्हें हटाने के सवाल से फौरन धार्मिक भावनाएं भडक़ने का डर होता है। अतिक्रमण हटाने के इस मामले में अदालत की यह टिप्पणी काबिलेगौर है कि ईश्वर का इरादा किसी की राह में अवरोध खड़ा करने का नहीं होता है, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही इन अतिक्रमणों को हटाने के रास्ते की बाधा जरूर है। उम्मीद है कि न्यायालय के तल्ख निर्देश के बाद सरकारें अवैध कब्जों को हटाने के लिए तत्पर होंगी।

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