आलोचना काफी नहीं, वैकल्पिक नीतियां भी सामने रखें राहुल

पछले वर्ष माह भर लंबे अवकाश से लौटने के बाद से राहुल लगातार जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरने में जुटे हैं। संभावना जताई जा रही है कि वह जल्द ही पार्टी अध्यक्ष पद भी संभालेंगे। इस लिहाज से चल रही उनकी तैयारियाँ तो ठीक हैं लेकिन कई बार बोलते वक्त वह जो नाहक बातें कह जाते हैं उससे सब चौपट हो जाता है। राहुल को गंभीर मुद्दों पर हल्की टिप्पणी करने से बचना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा पर राहुल का बयान सभी को याद होगा जब उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री देश की समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय जापान में ‘ढोल’ बजा रहे हैं।

नीरज कुमार दुबे
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का मुंबई दौरा पार्टी के लिए कितना हितकर रहा यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन उन्होंने यहाँ इस दौरान जो कुछ कहा उससे राष्ट्रीय राजनीति में उनकी अनुभवहीनता एक बार फिर उभर कर आई। देश में स्टार्टअप इंडिया योजना की शुरुआत से कुछ घंटों पहले राहुल ने कहा कि स्टार्टअप और असहिष्णुता साथ साथ नहीं चल सकते। यही नहीं उन्होंने यह कहकर भी चौंका दिया कि ‘सरकार जैसे ही कांग्रेस द्वारा रखी गई शर्तों को स्वीकार करती है उनकी पार्टी संसद में जीएसटी विधेयक का समर्थन करेगी और महज ‘15 मिनट’ में यह विधेयक पारित हो जाएगा’। गौरतलब है कि भाजपा कांग्रेस पर संसद को बंधक बनाने का जो आरोप लगाती रही है उसको राहुल के इस बयान से बल मिलता है। राहुल गांधी के बयान से एक बार फिर साफ हुआ कि जीएसटी पर कांग्रेस का विरोध नीतिगत नहीं बल्कि विरोध के लिए विरोध मात्र है। राहुल ने कहा, ‘‘यह कांग्रेस पार्टी ही थी जो जीएसटी विधेयक लेकर आई। तब भाजपा ने संसद में सात वर्षों तक इसे लटकाए रखा। तब जेटली ने इसे पारित नहीं होने दिया। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी ने भी जीएसटी पारित नहीं होने दिया।’’
साथ ही राहुल ने स्टार्टअप योजना का जिक्र तो किया लेकिन उसके अच्छे और बुरे पहलुओं पर प्रकाश डालने की बजाय असहिष्णुता के मुद्दे को साथ जोड़ दिया। असहिष्णुता का मुद्दा बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार के बाद से ठंडे बस्ते में पड़ा था। कई राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए संभवत: यह फिर तूल पकड़े। जब से मुद्दा ठंडे बस्ते में गया है तब से हालांकि कई ‘असहिष्णु’ घटनाएं हो चुकीं हैं लेकिन इन पर पुरस्कार लौटाने वाले बुद्धिजीवियों की नजरें नहीं गईं। राहुल ने अपने संबोधन में आरएसएस की ‘सोच’ पर भी हमला बोला। आजकल लगभग हर कार्यक्रम में राहुल संघ पर हमलावर रहते हैं शायद उन्हें लगता है कि संघ पर वार से ही भाजपा तिलमिलाएगी और आवेश में कोई गलत कदम उठाएगी। वैसे आरएसएस की ‘सोच’ पर हमला बोलने के साथ ही राहुल को कांग्रेस की ‘सोच’ पर भी ध्यान देना चाहिए कि क्या लोकतंत्र को बंधक बनाए रखना सही है? क्या जैसा उनके विरोधी दलों ने उनकी सरकार के साथ किया वैसा ही वे भी विरोधी दल के तौर पर करेंगे?
पिछले वर्ष माह भर लंबे अवकाश से लौटने के बाद से राहुल लगातार जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरने में जुटे हैं। संभावना जताई जा रही है कि वह जल्द ही पार्टी अध्यक्ष पद भी संभालेंगे। इस लिहाज से चल रही उनकी तैयारियाँ तो ठीक हैं लेकिन कई बार बोलते वक्त वह जो नाहक बातें कह जाते हैं उससे सब चौपट हो जाता है। राहुल को गंभीर मुद्दों पर हल्की टिप्पणी करने से बचना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा पर राहुल का बयान सभी को याद होगा जब उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री देश की समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय जापान में ‘ढोल’ बजा रहे हैं। तब सवाल उठा था कि प्रधानमंत्री की जापान यात्रा के दौरान हुए समझौतों और देश को मिले अन्य लाभों के बजाय क्या कांग्रेस नेता को सिर्फ ढोल ही नजर आया। ऐसी ही कुछ बचकानी हरकतें वह पहले भी कर चुके हैं। दागियों संबंधी अध्यादेश को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के विदेश में रहते फाड़ देने की बात कहकर उन्होंने पूरी सरकार को शर्मसार कर दिया था। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान भी उन्होंने समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र को फाड़ कर फेंक देने की बात कहकर अपने आलोचकों को हमले करने को आमंत्रित कर लिया था।
बहरहाल, राहुल आम जनता, किसानों और गरीबों की आवाज बन रहे हैं, यह अच्छा है लेकिन उन्हें वैकल्पिक नीतियां भी सामने रखनी चाहिए क्योंकि फिलहाल वह वही करते नजर आ रहे हैं जो वर्तमान में सत्तारुढ़ दल के नेता विपक्ष में रहते हुए किया करते थे।

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