आरटीआई पर राजनीतिक दलों की एकता के मायने

मिथिलेश कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 26 मई 2016 को अपना दो साल सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है और केंद्र सरकार सहित भारतीय जनता पार्टी के लिए यह निश्चित रूप से जश्न मनाने का समय है। इस बात पर खूब किन्तु-परन्तु किये जा सकते हैं कि नरेंद्र मोदी ने ये किया, ये नहीं किया, उनके कार्यों का ये प्रभाव पड़ा, वो नहीं पड़ा, किन्तु एक बात न केवल भारत में बल्कि विश्व भर में प्रसारित हो चुकी है कि भारत की केंद्रीय सरकार भ्रष्टाचार से मुक्त है। आप इसे कम बड़ी उपलब्धि मत समझिए, क्योंकि सन्देश से ही सन्देश आगे बढ़ता है और निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ न केवल सख्त सन्देश दिया है, बल्कि इसे दो साल तक कड़ाई से लागू भी किया है। हां, कुछेक बातें हैं जिनकी तरफ उनका ध्यान अवश्य ही जाना चाहिए और शायद आने वाले समय में जाए भी। भ्रष्टाचार की जो नदी पिछले दशकों में भारत में बही है, उसका ‘उद्ïगम और गंतव्य’ दोनों ही राजनीतिक पार्टियां ही हैं। कोई भी कमीशन हो, दलाली हो, उसकी स्वीकृति और उसका हिस्सा किसी न किसी राजनेता की जेब में या पार्टी फण्ड में जाता ही है, इस बात में दो राय नहीं। ऐसे में व्यक्तिगत रूप से बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पार्टी नेताओं और मंत्रियों को सख्त सन्देश दिया हो, लेकिन क्या उन्हें राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने पर कार्य शुरू नहीं करना चाहिए?
आज भारतीय जनता पार्टी भारत में चहुंओर फैल चुकी है और अगर उसने आरटीआई के दायरे में आना स्वीकार कर लिया तो कोई कारण नहीं कि भ्रष्टाचार की जड़ पर यह मजबूत प्रहार होगा और दूसरी तमाम पार्टियों पर भी इसके लिए बड़ा नैतिक दबाव बन जायेगा। प्रशासन में स्पष्टता निश्चित करने और प्रजातंत्र में जनता के भरोसे को ओजस्वी बनाने के लिए राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए, ऐसी चर्चा सालों से चल रही है, किन्तु दुर्भाग्य से इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है। चूंकि राजनीतिक दल हमारे जनतंत्र की लाइफलाइन हैं, इसलिए इन्हें आरटीआई के दायरे में लाने में कोई हर्ज भी नहीं है, लेकिन जाने क्यों इसे लेकर एक लम्बी राजनीतिक हिचकिचाहट दिखाई जाती रही है। आरटीआई निश्चित रूप से एक बेहद मजबूत कानून मिला है, जिसने पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आसानी से समझा जा सकता है कि टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले का प्रधानमंत्री कार्यालय से ताल्लुक रखने वाली सारी जानकारी सूचना के अधिकार कानून से ही तो मिली थी, जिसे बाद में मीडिया ने सामने किया था। ऐसे ही पिछली सरकार के तमाम बड़े घोटाले इस कानून की मदद से ही जनता की नजऱों में सामने आये थे। न केवल बड़े स्तर पर, बल्कि निचले स्तर पर भी इस कानून से काफी सहूलियत मिली है। ऐसे ही राजनीतिक दलों का सारा लेखा-जोखा भी आरटीआई की मदद से अगर सबके सामने आ जाए तो फिर हम वास्तविक रूप में अपने देश को ‘भ्रष्टाचार मुक्त बनाने’ की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा सकें!
राजनीतिक दलों में आरटीआई इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि दिनों दिन चुनाव महंगे होते जा रहे हैं और इसके लिए राजनीतिक पार्टियां जायज नाजायज, प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष खूब चंदे लेती हैं। ऐसे में, जब आरटीआई के दायरे में राजनीतिक पार्टियां आ जाएंगी तो उन्हें हर बात का हिसाब देना पड़ेगा तो पारदर्शिता का डर भी उनके मन में काफी होगा, जिससे व्यवस्था सुधरेगी ही। स्पष्टता की बात करने वाली भाजपा सरकार आखिर राजनीतिक दलों को आरटीआई के घेरे में क्यों नहीं लाना चाहती है, यह बात समझ से बाहर है! यह तर्क बेहद बचकाना है कि आरटीआई की दखलअंदाजी राजनीतिक दलों की मजबूती को कम कर सकती है, जिसके लिए हर का बात का राई का पहाड़ भी बनाया जा सकता है! आश्चर्य तो यह है कि भाजपा, कांग्रेस, बीएसपी, एनसीपी, माकपा और सीपीआई को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इस मामले में समन भी दिया गया था, किन्तु फिर भी इन दलों का रवैया जस का तस है! सुप्रीम कोर्ट साफ तौर पर कह रही है कि आखिर ये राजनीतिक दल अपनी आमदनी, व्यय, चंदे, पूंजी और देने वालों के बारे में बताने से क्यों हिचक रहे हैं?
राजनीतिक पार्टियां को जो अर्जी दी गई हैं, उसके अनुसार पार्टियां केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के 2013 और मार्च 2015 का नियम का उल्लंघन कर रही हैं। 2013 में सीआईसी के आदेशानुसार सभी राष्टï्रीय और प्रांतीय राजनीतिक दल सूचना के अधिकार के तहत आते हैं। इसी साल मार्च में सीआईसी के द्वारा एक बार फिर इस आदेश को दोहराया गया कि यही ‘अंतिम एवं बाध्यकारी’ नियम है। इसके उत्तर में केंद्र सरकार का यह कहना कम अजीब नहीं है कि सीआईसी ने आरटीआई एक्ट की धारा 2(एच) का बेहद लचीला अर्थ निकाला है, इसके चलते गलती से यह नतीजा निकाला जा रहा है कि आरटीआई एक्ट के तहत राजनीतिक दल सार्वजनिक संस्थाएं हैं। राजनीतिक दल पूरे देश पर शासन करें, किन्तु वह खुद सार्वजनिक नहीं हैं तो यह खुलकर क्यों नहीं कहा जा रहा है कि
राजनीतिक दल ‘प्राइवेट लिमिटिड’ कंपनियां हैं? यह ठीक है कि राजनीतिक दल संविधान द्वारा न तो स्थापित किये गए हैं, न ही संविधान या संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत आते हैं, किन्तु बावजूद इसके उनके पूरी जवाबदेही संविधान और जनता के प्रति है, इस बात में दो राय नहीं।

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