आरक्षण की मांग और हिंसा

गुजरात के मेहसाणा में आयोजित पटेल समुदाय की रैली की हिंसक भीड़ ने फिर से लोगों में खौफ पैदा कर दिया। दो सरकारी इमारतों में आग लगा दी गई। कई जगह बसें फूंक दी गर्इं। पुलिस की गाडिय़ों को नुकसान पहुंचाया गया। भीड़ के पथराव में दो प्रशासनिक अधिकारी और कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

sanjay sharma editor5पाटीदार अमानत आंदोलन समिति के आरक्षण की मांग पर शुरू से सवाल उठते रहे हैं। इस समिति ने जिस तरह आंदोलन के जरिए हिंसा को जन्म दिया वह किसी भी समाज के लिए चिंता का विषय है। समिति और सरदार पटेल गु्रप (एसपीजी) की मांग कि पाटीदारों को ओबीसी कोटे के तहत सरकारी नौकरियों तथा शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण दिया जाए। इसके साथ ही हार्दिक की रिहाई की मांग भी अब तेज हो गई है। हार्दिक पटेल को पिछले इसी साल अक्टूबर में देशद्रोह का मुकदमा दायर किया गया और जेल भेज दिया गया। ऐसे में एक बार फिर पाटीदार समाज अपनी मांग को लेकर सडक़ों पर था।
गुजरात के मेहसाणा में आयोजित पटेल समुदाय की रैली की हिंसक भीड़ ने फिर से लोगों में खौफ पैदा कर दिया। दो सरकारी इमारतों में आग लगा दी गई। कई जगह बसें फूंक दी गर्इं। पुलिस की गाडिय़ों को नुकसान पहुंचाया गया। भीड़ के पथराव में दो प्रशासनिक अधिकारी और कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। इस पर काबू पाने के लिए मेहसाणा में कफ्र्यू लगा दिया गया। मेहसाणा के साथ-साथ सूरत और राजकोट में भी इंटरनेट तथा मोबाइल सेवाएं रोकी गईं। कई जगह प्रदर्शन कर रहे लोगों को हिरासत में लिया गया। आंदोलन समिति और एसपीजी ने सोमवार को गुजरात बंद का आयोजन किया।
यह पहली बार नहीं हुआ कि आरक्षण के लिए पाटीदारों की रैली हिंसक भीड़ में बदल गयी। आंदोलन पिछले साल जुलाई में शुरू हुआ। एक महीना बीतने के बाद यह और हिंसक हो गया था। इसके बाद इससे निपटने के लिए सरकार को बल प्रयोग करना पड़ा। इसमें ग्यारह लोगों की जान गई। इसके बाद भी इस बार भी भीड़ का रुख शांति प्रदर्शन का नहीं रहा। वह हिंसक ही दिखी।
हरियाणा में भी जाट अपनी मांगों को लेकर पूरी तरह उग्र रहे और अंतत: सरकार को जाट आरक्षण का विधेयक पारित करना पड़ा। इसी को देखते हुए पाटीदार समाज अपने आंदोलन को आगे बढ़ाता दिखता है। जाटों को आरक्षण के लिए विधेयक पारित कराने से यह संदेश गया कि कोई ताकतवर समुदाय चाहे तो दबाव डालकर सरकार से कुछ भी करा सकता है। पाटीदार समाज ताकतवर हैं, संख्याबल और राजनीतिक, सामाजिक-आर्थिक रूप से भी। ऐसे में आरक्षण को लेकर गुजरात सरकार अब क्या रूख अपनाती है यह तो समय ही बतायेगा। लेकिन इतना तो तय है कि इस तरह से आरक्षण के लिए मांग कतई जायज नहीं ठहराई जा सकती। इसके साथ हिंसा का रुख अपनाया जाना बहुत ही निंदनीय है।

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