आप सरकार को किया जा रहा डिसक्रेडिट

‘आप’ ने भाजपा के राष्ट्रवाद और कांग्रेस के सैकुलरवाद को नए सिरे से परिभाषित करने का काम किया है। वह भाजपा के राष्ट्रवादी और कांग्रेस के सैकुलरवादी तबके को अपनी तरफ खींचने में काफी हद तक कामयाब है। दोनों पाॢटयों को मालूम है कि ‘आप’ की अखिल भारतीय अपील है। उसके अखिल भारतीय प्रसार से इंकार नहीं किया जा सकता है।
-आशुतोष

67 सीटें जीत कर नया इतिहास रचने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार पहले दिन से ही भाजपा और कांग्रेस की आंख में खटक रही है। भाजपा ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि दिल्ली में उसकी इतनी बुरी गत होगी। 2013 में 32 सीटें लेकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने वाली और लोकसभा में सभी 7 सीटें जीतने वाली भाजपा को यह कतई भी उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली में उसका सूपड़ा साफ हो जाएगा।
मोदी और अमित शाह के रहते उसे यह आशा थी-भले ही भारी बहुमत से न सही लेकिन देश की राजधानी में उसकी सरकार तो बन ही जाएगी, पर यह हो न सका। कांग्रेस ने तो 15 साल दिल्ली पर शासन किया और वह सोच ही नहीं पा रही है कि महज 2 साल में एकदम नई पार्टी ने उसे दिल्ली में महत्वहीन कर दिया है। यही वजह है कि आज दिल्ली में एक नए तरह के षड्यंत्र अंजाम दिए जा रहे हैं। भाजपा को पता है कि ‘आप’ नाम का जादू अगर दिल्ली के बाहर भी चल गया तो 2019 में भारी मुसीबत हो जाएगी। आज मोदी और भाजपा ‘आप’ को हल्के में लेने की जुर्रत नहीं कर सकते। जिस मोदी को हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में कोई नहीं रोक सका, एक छोटी-सी पार्टी ने उसके हाथों के तोते उड़ा दिए। मोदी के बारे में यह कहा जाने लगा था कि वह अपराजेय हैं। दिल्ली की करारी हार के बाद यह एहसास पूरे देश में चला गया है कि मोदी को हराया जा सकता है। आज बिहार में भी भाजपा की हालत खराब है। नीतीश और लालू में भी नई ऊर्जा का संचार हुआ है। उधर, कांग्रेस को लगता है कि अखिल भारतीय स्तर पर ‘आप’ जितनी कामयाब होगी वह कांग्रेस को ही कमजोर करेगी। वह भी इस ताक में है कि ‘आप’ की छवि को किसी भी तरह से खराब किया जाए। ‘आप’ ने भाजपा के राष्ट्रवाद और कांग्रेस के सैकुलरवाद को नए सिरे से परिभाषित करने का काम किया है। वह भाजपा के राष्ट्रवादी और कांग्रेस के सैकुलरवादी तबके को अपनी तरफ खींचने में काफी हद तक कामयाब है। दोनों पाॢटयों को मालूम है कि ‘आप’ की अखिल भारतीय अपील है। उसके अखिल भारतीय प्रसार से इंकार नहीं किया जा सकता है। भाजपा के राष्ट्रवादी और कांग्रेस के सैकुलरवादी तबके का दोनों पाॢटयों से बुरी तरह से मोह भंग हो चुका है। ऐसे में ‘आप’ की भ्रष्टाचार विरोधी छवि, उदार राष्ट्रवादी तेवर और सकारात्मक सैकुलरवादी सोच देश को एक नया विकल्प देने में पूरी तरह से सक्षम है, दोनों पार्टियों की चिंता का मूल कारण है। ऐसे में आज यह कोशिश काफी तेज हो गई है कि ‘आप’ की सरकार को दिल्ली में डिसक्रैडिट किया जाए। पहले यह साबित करने का प्रयास किया गया कि ‘आप’ भगौड़ा है और अब यह बताने का प्रयत्न हो रहा है कि ‘आप’ को सरकार चलानी नहीं आती। इस खेल में केन्द्र की मोदी सरकार पूरी तरह से लगी है। सब को पता है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं है। यहां उपराज्यपाल बाकी राज्यों के राज्यपालों से ज्यादा अधिकार रखते हैं। पुलिस सीधे उनके अधीन है। उनके माध्यम से गृह मंत्रालय दिल्ली पुलिस पर अपनी पकड़ रखता है। फिर 2002 के एक फैसले के मुताबिक गृह मंत्रालय ने यह भी कह दिया है कि अर्थ से जुड़े कानून को बनाने के लिए भी दिल्ली की चुनी सरकार को केन्द्र की अनुमति लेनी होगी। इसका फायदा उठाकर केन्द्र सरकार दिल्ली सरकार के रास्ते में नित रोड़े अटका रही है। दिल्ली पुलिस आज ‘आप’ के किसी भी नेता और विधायक को झूठे मामलों में फंसाने का मौका नहीं खो रही है। पिछले दिनों जंतर-मंतर में किसान की आत्महत्या टाली जा सकती थी। पुलिस मौके पर मौजूद थी लेकिन उसने उसको नीचे उतारने का कोई काम नहीं किया। यहां तक कि दिल्ली सरकार की गुजारिश अनसुनी कर दी। हादसे के बाद दिल्ली पुलिस ने गजेन्द्र के परिवार पर दबाव बनाया कि वह आत्महत्या की जांच पुलिस से करवाने की मांग करे।
परिवार के पास दिल्ली से 2 झूठे गवाह भी भेजे गए। इन गवाहों ने परिवार को यह समझाने की कोशिश की कि कैसे मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास ने गजेन्द्र को दिल्ली बुलाकर पूरा ड्रामा करने के लिए उसे उकसाया था। पूरी साजिश थी कि आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला बना कर दोनों को जेल में ठूंस दिया जाए। परिवार टस से मस नहीं हुआ।

इसी तरह से तिलक नगर के विधायक जरनैल सिंह के खिलाफ भी झूठा केस बना कर जेल में डालने का उपक्रम किया गया। इस मामले में आरोप यह लगा कि उन्होंने जूनियर इंजीनियर से मारपीट की जबकि इंजीनियर ने साफ कह दिया है कि उस पर भाजपा के लोगों ने दबाव बनाकर केस बनवाया। वह केस वापस भी लेना चाहता है पर पुलिस लेने नहीं दे रही है। उल्टे पुलिस कमिश्नर टी.वी. को बाइट दे रहे हैं कि वह भगौड़ा है। उनके बाइट देते ही खबर को पंख लग गए। बिल्कुल इसी तरह जैसे कि शराब पकडऩे के मामले में विधायक नरेश बालियान के खिलाफ आज तक कोई एफ.आई.आर. दर्ज नहीं हुई पर अनर्गल आरोप चलते रहे। उपराज्यपाल महोदय की पूरी कोशिश है कि चुनी हुई सरकार अपने अधिकारी नियुक्त न कर पाए।

वह सीधे वरिष्ठ अधिकारियों को आदेश दे रहे हैं। मुख्यमंत्री की बात न मानने के लिए उकसा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब मुख्यमंत्री की राय के खिलाफ जाकर कार्यकारी मुख्य सचिव की नियुक्ति उन्होंने की। यह संविधान के तहत मुख्यमंत्री से सारे अधिकार छीनने का प्रयास है। इसको रंग यह दिया जा रहा है कि मुख्यमंत्री किसी महिला को मुख्य सचिव बनने देने के विरुद्ध हैं। यह वही उपराज्यपाल हैं जिन्होंने पिछली बार बहुमत वाली सरकार की सिफारिश की अनदेखी कर विधानसभा भंग नहीं की थी और दिल्ली में पूरे एक साल राष्ट्रपति शासन लगा रहा ।

दुर्भाग्य से इस खेल में मीडिया का एक बड़ा तबका मोदी और भाजपा का साथ दे रहा है। वह ‘आप’ से जुड़ी किसी भी छोटी से छोटी खबर को सनसनीखेज बना कर पेश कर रहा है और भाजपा की बड़ी से बड़ी खबर को दबा रहा है। एक महिला के मामले में कुमार विश्वास को जिस तरह से फंसाया गया और उनकी छवि को धूमिल किया गया वह पीत पत्रकारिता का एक बड़ा उदाहरण है। मीडिया के मेरे मित्र क्षमा करें, मैं इसे पीत पत्रकारिता की जगह नरभक्षी पत्रकारिता कहता हूं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कभी भी आसान नहीं होगी, यह हमें पता है। व्यवस्था परिवर्तन की जंग में वक्त लगेगा और हम पर कीचड़ उछलेगा, दाग लगाए जाएंगे और कानून व न्याय व्यवस्था का सहारा लेकर हमको नाकारा साबित करने का प्रयास भी होगा पर हमें मजबूती से लडऩा होगा। हमें पता है कि जीत अंतत: हमारी ही होगी। आम आदमी ही अंत में जीतेगा।

 

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