आपूर्ति विभाग के अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे हजारों कार्डधारक

राजधानी में आधी दुकानों पर नहीं पहुंचा एपीएल का राशन
तेल डिपो से भी मिट्टी के तेल की आपूर्ति में बरती जा रही लापरवाही

4Captureपीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। जिले में तय समय पर राशन और मिट्टी का तेल सस्ता गल्ला विक्रेताओं की दुकान पर पहुंचवाने में प्रशासन नाकाम रहा है। दिसंबर महीने में भी सस्ता गल्ला विक्रेता की 30 प्रतिशत दुकानों पर एपीएल और बीपीएल का अतिरिक्त राशन और मिट्टी का तेल नहीं पहुंच पाया। इसी बीच प्रशासन ने राशन और मिट्टी के तेल वितरण की तारीख घोषित कर दी। इससे बहुत से कार्ड धारकों के सामने माह के अंतिम तीन दिनों में राशन और मिट्टी का तेल लेने का संकट उत्पन्न हो गया है। वहीं तय समय पर राशन नहीं पहुंचा और समय से राशन का वितरण नहीं हो पाया तो कोटेदारों का भी नुकसान होना तय है।
राजधानी में कार्डधारकों की संख्या नौ लाख 92 है। इसमें एपीएल कार्डधारकों की संख्या आठ लाख 25 हजार 602, बीपीएल कार्डधारकों की संख्या 24 हजार 378 और अंत्योदय कार्ड धारकों की संख्या 50112 है। जिले में पिछले दो साल से राशन की दुकानों पर समय से गेहूं, चावल और मिट्टी का तेल नहीं पहुंच पा रहा है। इस संबंध में खाद्य आयुक्त और खाद्य एवं रसद मंत्री के आदेशों का भी पालन नहीं हो पा रहा है। राशन आपूर्ति मेें विलंब के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। इस कारण हर महीने आवश्यक वस्तु निगम और आपूर्ति विभाग के अधिकारियों की लापरवाही के कारण माह के अंतिम दिनों में राशन और मिट्टी के तेल का वितरण करवाया जाता है। यदि कोई कार्डधारक आवश्यक काम से शहर के दो-चार दिनों के लिए बाहर चला जाता है। तो उसको राशन और मिट्टी का तेल नहीं मिल पाता। जबकि रोस्टर के अनुसार राशन की दुकानों पर हर महीने बीपीएल कार्डधारकों के कोटे का राशन 4 तारीख को पहुंच जाना चाहिए। इसी प्रकार एपीएल कार्ड धारकों का राशन और मिट्टी का तेल 10 तारीख तक सस्ता गल्ला की दुकानों पर पहुंच जाना चाहिए लेकिन आïवश्यक वस्तु निगम के गोदामों पर तैनात सुपरवाइजर और राशन पहुंचाने वाले ठेकेदारों की लापरवाही के कारण हर महीने विलंब से राशन पहुंचता है। इस संबंध में कोटेदार और कार्डधारक लगातार शिकायत करते हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती है।

राशन वितरण में धांधली पर रोक की कवायद भी फेल
जिले में राशन वितरण के दौरान होने वाली धांधली पर रोक लगाने की कवायद भी फेल साबित हो रही है। कोटेदारोंका आरोप है कि आवश्यक वस्तु निगम के गोदाम से राशन की बोरियां भेजने से पहले कभी कभार ही वजन किया जाता है। यदि गोदाम पर वजन करते भी हैं, तो दुकान पहुंचने वाले राशन का वजन नहीं होता। जबकि गोदाम से दुकान पहुंचने वाली बहुत सी बोरियों में गेहूं और चावल की मात्रा मानक से कम होती है। उदाहरण के तौर पर 50 किग्रा की बोरी का वजन 45 या 46 किलोग्राम ही निकलता है। दुकानों पर राशन पहुंचाने वालों और गोदाम के लोगों की मिलीभगत से बोरियों में छेद करके राशन निकाल लिया जाता है। जबकि शासन की तरफ से राशन के उठान और वितरण की त्रिस्तरीय जांच का नियम है। इसमें एफसीआई से राशन भेजते समय राशन की बोरियों की जांच, आवश्यक वस्तु निगम के गोदाम से राशन भेजने से पहले राशन की बोरियों की जांच और दुकान पर राशन पहुंचने पर राशन की बोरियों की जांच की जानी चाहिए। इसके बाद पर्यवेक्षणीय अधिकारियों की निगरानी में राशन का वितरण किया जाना चाहिए। लेकिन यह सब मात्र कागजों में हो रहा है। आपूर्ति विभाग के अधिकारी गोदामों और राशन की आपूर्ति करने वाली गाडिय़ों की जांच करने में रुचि नहीं लेते हैं। इसके पीछे ठेकेदार और गोदाम प्रभारी से अधिकारियों की साठ-गांठ है। इसी वजह से मात्र खानापूर्ति के लिए कभी-कभार गोदामों का निरीक्षण और बोरियों की जांच होती है। इसी वजह से कार्डधारकों का हक मारा जा रहा है। इसमें अधिकारियों के फायदे की बात नहीं मानने वाले कोटेदार भी पिस रहे हैं। इस पर कब रोक लगेगी, इस संबंध में कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं।

वितरण की प्रक्रिया में भी पेंच

जिले में एपीएल कार्ड धारकों को हर महीने गेहूं और चावल वितरित किया जाता है। इसमें प्रथम आगत और प्रथम पावत का नियम लागू है। इस कारण उन्ही कार्डधारकों को राशन मिल पाता है, जो समय से राशन की दुकानों पर पहुंच पाते हैं। आलम ये है कि जिला प्रशासन पिछले कई महीने से माह की अन्तिम तिथियों में राशन वितरण की तिथि घोषित करता है। जिस वक्त राशन वितरण की तिथि घोषित की जाती है, उस तिथि से पूर्व सभी दुकानों पर राशन तक नहीं पहुंच पाता है। इसमें बीपीएल कोटे की दुकानों पर भी समय से राशन और मिट्टी का तेल नहीं पहुंचता है। इस कारण कार्ड धारकों और कोटेदारों के सामने असमंजस की स्थिति होती है। इस कारण कोटेदार मजबूरन दुकान पर उपलब्ध सामान का वितरण शुरू करवा देते हैं। यदि अंतिम तिथि तक राशन या मिट्टी का तेल नहीं पहुंचा तो विक्रेता के कोटे का राशन लैप्स हो जाता है। अब कोटेदार को कोटे में मिले राशन के बदले जमा धनराशि का समायोजन करवाने की बड़ी चुनौती होती है। जो शायद ही बिना लेन-देन के समायोजित हो पाती है। ऐसे में कोटेदार और कार्डधारक दोनों की भ्रष्टतंत्र और अधिकारियों की लेटलतीफी के शिकार बनते हैं।

Pin It