आधी आबादी की अस्मिता के साथ खिलवाड़

सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि पुलिस महिलाओं की शिकायत तक नहीं सुनना चाहती। एफआईआर दर्ज न करना पड़े इसके sanjay sharma editor5लिए पुलिस पीडि़त परिजनों को कोई न कोई पट्टïी पढ़ाकर थाने से टरकाने का काम कर रही है। किसी को बदनामी के डर की दुहाई देती है तो किसी को थाने से वैसे ही टरका देती है।

राजधानी में कानून व्यवस्था का डर शोहदों में नहीं बचा है। अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। शायद इसीलिए आधी आबादी की अस्मिता के साथ खिलवाड़ जारी है। प्रदेश में महिला हिंसा का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। कहीं न कहीं हर दिन लड़कियों के साथ छेड़खानी, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध हो रहे हैं। गांव से लेकर शहर, घर से लेकर थाने तक महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। एक बार फिर राजधानी में दिन-दहाड़े एक मासूम लडक़ी की इज्जत तार-तार हुई। लडक़ी को अगवा कर उसके साथ बलात्कार कर उसे फेंक कर अपराधी फरार हो गए और पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही।
प्रदेश में यह कोई पहली घटना नहीं है। दो दिन पहले हरदोई में शोहदों ने लडक़ी के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसकी आंखें निकाल ली। कानून व्यवस्था के लचर रवैये की वजह से ऐसा कृत्य करने से लोग डर नहीं रहे हैं। यह सच है कि जब पुलिस अपराधियों के प्रति सख्त रवैया अपनाती है तो भयमुक्त समाज बनता है। जब पुलिस खुद अपराधियों से साठ-गांठ कर मामला निपटाने में लगी रहेगी तो अपराधियों में कैसे डर पैदा होगा। अपराधी भी यह जान चुके हैं कि पैसे से कुछ भी मैनेज किया जा सकता है।
सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि पुलिस महिलाओं की शिकायत तक नहीं सुनना चाहती। एफआईआर दर्ज न करना पड़े इसके लिए पुलिस पीडि़त परिजनों को कोई न कोई पट्टïी पढ़ाकर थाने से टरकाने का काम कर रही है। किसी को बदनामी के डर की दुहाई देती है तो किसी को थाने से वैसे ही टरका देती है। जब पीडि़ताओं की सुनवाई नहीं होगी तो निश्चित ही शोहदों का मनोबल बढ़ेगा। जब तक मामला तिल का ताड़ न बने पुलिस हरकत में नहीं आती। छोटे-मोटे मामलों में तो पुलिस रुचि ही नहीं लेती। यदि छोटे-छोटे मामलों में ही पुलिस सख्ती दिखाए तो बड़े मामलों की नौबत ही न आए।
कोई भी परिवार अपनी बहू-बेटी को बाहर भेजता है तो वह पुलिस के भरोसे पर ही। लोगों को यह विश्वास होता है कि अपराधियों पर पुलिस का अंकुश है इसलिए उनका कुछ भी नहीं होगा। लेकिन वर्तमान में पुलिस पर से लोगों का भरोसा उठ चुका है। गांव तो दूर शहर में भी लोग शाम के बाद बेटी को घर से बाहर भेजने से डरने लगे हैं। अगर हादसा हो जाए तो भी पुलिस के पास जाने से डरते हैं। परिजन जानते हैं कि एक तो पुलिस पहले टरकाएगी, दूसरे यदि मुकदमा दर्ज करने के लिए तैयार हो भी गई तो बिना लिए-दिए मानेगी नहीं। पुलिस से भरोसा उठना न तो पुलिस के लिए ठीक है और न ही सरकार के लिए। पुलिस पर नियंत्रण सरकार के पास है तो सरकार बदलने का शक्ति जनता के पास है।

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