आधी आबादी का वर्चस्व

वर्तमान में शायद ही कोई फील्ड हो जिसमें आधी आबादी की दखल न हो। एक दौर था जब लड़कियों को शिक्षा से दूर रखा जाता था। घर की चहारदीवारी के अंदर ही उनकी दुनिया होना बताया जाता था। उनके लिए चूल्हा-चौका निर्धारित कर दिया गया था। मां-बाप के लिए बेटा ही सब कुछ होता था। सामाजिक बेडिय़ोंके चलते लड़किया पढ़ नहीं पाती थी, लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं।

sanjay sharma editor5यह सच है कि अगर आधी आबादी को मौका मिले तो वह बेहतरीन प्रदर्शन कर सकती हैं। ऐसा कई बार देखने को मिला है कि देश की बेटियों ने अपने अच्छे कार्य से अपने मां-बाप के साथ-साथ देश का सिर ऊंचा किया है। खेल का मैदान हो या अंतरिक्ष, महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। अब तो बहादुर बेटियां सेना में शामिल होकर देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार हैं। जिस क्षेत्र में महिलाओं को मौका मिल रहा है, वह वहां अपने झंडे गाड़ रही हैं। रविवार को प्रदेश में यूपी बोर्ड ने हाईस्कूल व इंटरमीडिएट के परीक्षा परिणाम घोषित किया तो दोनों कक्षाओं में लड़़कियों ने बाजी मारी। लडक़ों से ज्यादा लड़कियां परीक्षा पास हुईं और मेरिट में भी लड़कियों को ज्यादा जगह मिली। कुछ दिनों पहले ही देश की सबसे प्रतिष्ठिïत प्रतियोगी परीक्षा सिविल का परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो उसमें भी टॉप टेन में लड़कियों की संख्या ज्यादा थी। इस परीक्षा में दिल्ली की टीना डाबी ने टॉप किया। मात्र 22 साल की उम्र में आईएएस बनकर वह देश की सेवा करेंगी। पिछले साल भी सिविल सेवा परीक्षा में इरा सिंघल ने टॉप किया था।
वर्तमान में शायद ही कोई फील्ड हो जिसमें आधी आबादी की दखल न हो। एक दौर था जब लड़कियों को शिक्षा से दूर रखा जाता था। घर की चहारदीवारी के अंदर ही उनकी दुनिया होना बताया जाता था। उनके लिए चूल्हा-चौका निर्धारित कर दिया गया था। मां-बाप के लिए बेटा ही सब कुछ होता था। सामाजिक बेडिय़ोंके चलते लड़किया पढ़ नहीं पाती थी, लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं। जो माता-पिता अपनी बेटी को पढऩे के लिए प्रेरित कर रहे हैं बेटियां उन्हें निराश नहीं कर रही हैं। पहले बेटे, मां-बाप का नाम रौशन करते थे और आज बेटियां। जो बेटियां कभी मां-बाप पर बोझ समझी जाती थीं आज वही उन्हें फक्र करने का मौका दे रही हैं।
बेटियों के इतना आगे जाने व समाज में बराबर की भागीदारी निभाने वाले काम करने के बावजूज आज भी कुछ राज्यों में बेटियों को बोझ समझा जाता है। उन्हें वो आजादी नहीं दी जा रही है जिससे वो आगे बढ़ सकें। बेटियों के आगे बढऩे के बाद भी लिंगानुपात में अंतर चिंता का विषय है। जिन लोगों को बेटियां बोझ लगती हैं, उन्हें ऐसे मां-बाप से प्रेरणा लेनी चाहिए। बेटों की तरह बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने व सामाजिक सरोकारों में भागीदारी लेने की आजादी देनी चाहिए।

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