आतंकी हमले में भी राजनीति

“ऐसा नहीं है कि जब मोदी जी इंडिया टीवी के कार्यक्रम आपकी अदालत में बैठकर कह रहे थे कि आतंकी हमले का जवाब पाकिस्तान में जाकर देना चाहिए हम क्यों ओबामा-ओबामा रोते रहते हैं तो उन्हें पता न हो कि हम पाक पर सीधा हमला नहीं कर सकते। सारे हालात जानने के बाद भी उनका यह प्रलाप सिर्फ लोगों की सहानुभूति हासिल करने के लिए था। मोदी विरोधी भी उनकी इसी रणनीति का इस्तेमाल कर रहे हैं।”

sanjay sharma editor5पूरे देश में मानो मुंह जैसा माहौल बना हुआ है। उड़ी में हुए हमले के बाद टीवी चैनलों पर छिड़ी जंग ने लोगों का तापमान बढ़ा दिया है। ऐसा लग रहा है मानो जंग होकर रहेगी। यह कोई नया मामला नहीं है। देश में जब भी कोई बड़ा आतंकी हमला हुआ है लोगों की प्रतिक्रियाएं इसी तरह सामने आयी है। सत्ता पक्ष बचाव की मुद्रा में आया है तो विपक्ष हमले की। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सारा उन्माद सिर्फ वोटो की राजनीति के कारण हो रहा है।
कुछ साल पहले की बात है। मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था। सीमा पार से घुसे लोगों ने हमारे बहादुर सैनिक हेमराज का सर काट लिया था। इस बात ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। तब कांग्रेस की सरकार थी और नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनने के लिए हाथ पैर मार रहे थे। तब उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर इस मुद्दे को उठाया था और कांग्रेस को इसके लिए कसूरवार
ठहराया था।
तब कांग्रेस उसी हालत में थी जैसी अब भाजपा है। तब न मनमोहन सिंह को समझ आ रहा था कि वो क्या करें और न अब मोदी जी समझ पा रहे है कि वो क्या करें। कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष मोदी जी को उनके ही भाषण सुना रहा है और मोदी जी का समझ आ रहा है कि विपक्ष में रहकर वो कितनी बड़ी गलती कर गए।
ऐसा नहीं है कि जब मोदी जी इंडिया टीवी के कार्यक्रम आपकी अदालत में बैठकर कह रहे थे कि आतंकी हमले का जवाब पाकिस्तान में जाकर देना चाहिए हम क्यों ओबामा-ओबामा रोते रहते हैं तो उन्हें पता न हो कि हम पाक पर सीधा हमला नहीं कर सकते। सारे हालात जानने के बाद भी उनका यह प्रलाप सिर्फ लोगों की सहानुभूति हासिल करने के लिए था। मोदी विरोधी भी उनकी इसी रणनीति का इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे दुख की बात यह है कि आतंकी हमला होने के बाद भी हमारे राजनेता अपनी इस घिनौनी राजनीति से बाज नहीं आते। आतंकी हमले के बाद सभी राजनेताओं को चाहिए कि वो एकजुट होकर इस हमले के विरोध में देश के आम आदमी के साथ खड़े हो। उनकी भावनाओं व उनके दर्द को महसूस करें। यह देखें कि जो हालात देश के बने हैं वैसे हालात फिर न बनें।
अफसोस इस बात का है कि हमारे देश के राजनेता सुधरने को तैयार नहीं है। उनको हर वक्त हर घटना में अपना फायदा चाहिए। युद्ध के उन्माद का माहौल बनाना किसी भी रूप में उचित नहीं है।

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